श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 10

प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌। ।।10।।

वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है। ।।10।।

अर्जुन का प्रश्न है कि मृत्यु के समय हम परमात्मा को कैसे प्राप्त कर पाते हैं। दरअसल परमात्मा की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व को प्राप्त करने की कोई क्रिया नहीं है जिसे हम प्राप्त करते हैं। परमात्मा की प्राप्ति का अर्थ है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा को प्राप्त करना जिसे प्राप्त कर हम स्वयं के वास्तविकता को समझ सकते हैं। एक घड़ा है। उस धड़ा के अंदर कुछ स्थान है जिसे घड़े का बाहरी आवरण घेरे रहता है। घड़े के अंदर का स्थान सीमित होता है जो बाहरी स्पेस से घड़े के शरीर से विलग होकर अपना एक अलग अस्तित्व बनाता है। किंतु घड़ा जैसे ही फूटता है उसके अंदर का स्पेस बाहरी स्पेस से मिलकर एक हो जाता है।अपने सेल्फ पर  इसी बाहरी आवरण का हटना ही मृत्यु है और अपने सेल्फ को वृहत्तर सेल्फ से मिलाना ही परमात्मा की प्राप्ति है जो जरूरी नहीं कि शारीरिक मृत्यु से प्राप्त हो ही जाए बल्कि सत्य तो यही है कि व्यक्ति द्वारा अपने बाहरी आवरण यानी ईगो को हटाकर , उसे नष्ट कर आत्मसाक्षसत्कार करना ही ईश्वरत्व की प्राप्ति का मार्ग है।
    इसके लिए आवश्यक है कि
1. व्यक्ति निरंतर कर्मयोग के अनुसार ही आचरण करे।
2. मन में पूर्ण समर्पण की भावना अनिवार्य है। संशय युक्त मन से आस्था जागृत नहीं होती है और आस्था के बिना श्रद्धा नहीं आती और श्रद्धा के अभाव में समर्पण नहीं होता । ऐसी स्थिति में परमात्मा से युक्त होने की श्रद्धा में कमी आती है।
3.श्रद्धा युक्त एकाग्रता होनी चाहिए। मन में भटकाव नहीं आना चाहिए। मन का संतुलित और एकनिष्ठ नहीं  होने से भटकाव का आना तय है और उस स्थिति में आत्मसाक्षात्कार सम्भव ही नहीं है । अतः श्रद्धायुक्त एकाग्रता यानी ध्यान की अवस्था होनी अनिवार्य है।
4.मन में, भाव में, बुद्धि में, विवेक में, सभी कर्मों में ईश्वर की निरन्तर अनुभूति के सत्य का अभ्यास ही व्यक्ति के ईगो को उसके सेल्फ के साथ मिला देता है।
       इसी निरन्तर प्रक्रिया से ही व्यक्ति हर समय ईश चिंतन में युक्त हुआ रह सकता है। वह सब कुछ करते हुए भी सभी कर्मों से विलग उन कर्मों को परम आत्मा को समर्पित कर सन्यास भाव से सब के कल्याणार्थ जीता हुआ ईश्वर और ईश्वरत्व को प्राप्त होता है। इसके लिए भौतिक मृत्यु नहीं बल्कि ईगो की मृत्यु की आवश्यकता होती है।
    

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