श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 28, 29, 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 28, 29, 30

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ .।।28।।

परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं। ।।28।।

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥ ।।29।।

जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। ।।29।।

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ ।।30।।

जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं। ।।30।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ।
    
       ईश्वरीय अनुभूति को प्राप्त करने हेतु ये अनिवार्य है कि हमारा आचरण कर्मयोग के अनुरूप हो अर्थात जब तक इक्षाओं के जाल से हम नहीं निकलते और निकल कर राग-द्वेष और मोह से मुक्त नहीं होते हैं तब तक ईश्वर की अनुभूति से वंचित ही रहते हैं। परंतु जिनको इस मार्ग का अभ्यास हो जाता है वे लोग हमेशा सभी के अस्तित्व में भी ईश्वर को ही देखते समझते हैं और अपने सभी कर्मों को भी उसी परम् आत्मा को जो सभी में समान है को समर्पित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पूरी तरह से ईश्वरीय अनुभूति के प्रति समर्पित होता है। और ऐसी स्थिति में वह सभी की उपस्थिति और सभी कर्मों में भी ईश्वर को ही पाता है। यँहा तक कि जीवन के अंत समय में भी उसे इस तथ्य का ज्ञान और भान बना रहता है सो उसके लिए जीवन और मरण भी बन्धनकारी नहीं हो पाते हैं।

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