श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 25
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥ ।।25।।
अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है। ।।25।।
अब प्रश्न उठता है कि अधिकांश लोग ईश्वर की सत्यता को क्यों नहीं जान पाते हैं। दरअसल हमारे सत्य की समझ दृश्य तक ही सीमित होती है, जो दिखता है हमारी दृष्टि उतनी ही दूर तक देख पाती है। लेकिन जब ज्ञान के नेत्र खुलते हैं तो दृश्य के पार के सत्य भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। जब तक हम दृष्टि के पार नहीं देख पाते हैं हमारे लिए ईश्वरीय अनुभूति उनकी योगमाया से छुपी होती है। अधिकांश व्यक्तियों की नजर में पहचान की परिभाषा शरीर, मन, बुद्धि, दिख सकने वाले गुण, सामाजिक सम्बन्ध, सांसारिक उपलब्धियों आदि तक ही सीमित होते हैं और हम पहचान के इन्हीं कारकों में उलझे हुए होते हैं। तमोगुण और रजोगुण से युक्त हमारी दृष्टि में वह ईश्वर आता ही नहीं जो हमारी दृष्टि से ओझल हमारे आपके सबके अंदर विद्यमान होता है। हम उसे तृतीय पुरुष के रूप में स्त्री या पुरुष के रूप में पारलौकिक मान लेते हैं। लेकिन जब ज्ञान का विकास होता है हमारे अंदर तब उसे किसी अन्य में देखते हैं। लेकिन जब हमें ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तब हम खुद में ईश्वर को देख पाते हैं। जब तक ईश्वरीय अनुभूति का सत्वगुण हमारे अंदर विकसित नही हो जाता तब तक हमारे लिए ईश्वरीय उपस्थिति उनके ही योगमाया से हमारी समझ से परे होती है।
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