श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 24
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ ।।24।।
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं। ।।24।।
जब मन इक्षाओं की पूर्ति और कामनाओं को साधने में ही व्यस्त रह जाता है तो दृष्टि का विस्तार नहीं हो पाता है । बुद्धि तो इन इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति और पूर्ति होने और नहीं होने के परिणामों में उलझी होती है, व्यक्ति उसके आगे नहीं देख पाता है। मजे की बात है कि जब सब कुछ मनोकुल चलते रहता है तब तो वे देवता भी स्मरण में नहीं आते हैं जिनकी शरण में व्यक्ति अपने कष्ट के समय भागा हुआ जाता है। इस अत्यंत संकुचित दृष्टि वाले व्यक्ति से ईश्वरत्व की समझ रखने की अपेक्षा करना मूर्खता है।
ईश्वरत्व का वास तो हर व्यक्ति तक में है किंतु संकुचित कामनाओं में उलझा व्यक्ति अपने अंदर झाँक कँहा पाता है। उसे फुर्सत भी नहीं मिलती कि वह कामनाओं के पार के जीवन को और उसके महत्व को समझ पाए और सच्चाई यह है कि बिना ये किये परमात्मा की उपस्थितों का ज्ञान सम्भव ही नहीं है। जब तक ये नहीं होता है लोग अपने अपने स्वार्थों की पूर्ति को ही अपने जीवन का ध्यय बनाकर चलते हैं। उनके लिए स्वार्थ की पुर्ति में ही जीवन का आनंद है सो स्वार्थ पूर्ति में थोड़ी बाधा आई नहीं कि वे बेचैन हो उठते हैं। ऐसे लोग न तो अपने अंदर के ईश्वरत्व को समझ पाते हैं न ही बाहर के।
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