श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 23

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ ।।23।।

परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।23।।

हर इक्षा की एक निश्चिय उम्र होती है। इक्षा पूर्ति हेतु हम उस इक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों की आराधना करते हैं , उनके प्रति समर्पित होते हैं यानी उस इक्षा के प्रतिनिधि देवी या देवता के प्रति श्रद्धा रखकर उस इक्षा की पूर्ति करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया के कुछ दोष भी हैं। पहला दोष तो यही है कि हर इक्षा पूर्ण होने के बाद समाप्त हो जाती है। दूसरा दोष है कि एक इक्षा  दूसरी इक्षा को जन्म देती है जिसके परिणाम स्वरूप हम इन इक्षाओं के जाल में फंस कर रह जाते हैं। सो ऐसे लोग अपनी श्रद्धा के बावजूद परम् लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं हो पाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति इन छोटी छोटी इक्षाओं से ऊपर उठ कर अपने सेल्फ को ढूँढने और पाने की इक्षा करता है यानी खुद को परम के साथ युक्त कर लेने की इक्षा रखता है वह व्यक्ति परमब्रह्म के प्रति अपनी श्रद्धा रखकर उनपर समर्पित होता है।
      वस्तुतः जीवन यापन के लिए छोटी इक्षाओं का अपना महत्व है हीं लेकिन जीवन का लक्ष्य मात्र  भौतिक इक्षाओं जो व्यक्ति से बाहर अपना अस्तित्व रखती हैं और अस्थाई चरित्र की होती हैं की पूर्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये व्यक्ति को सीमित कर देती हैं और उसे खुद के अंदर खुद को खोजने और पाने की फुर्सत नहीं देती हैं। नतीजा ये होता है कि व्यक्ति तमाम तरह के विकारों जैसे, मोह, लगाव, तृष्ना, क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा, अहंकार आदी का दास बन जाता है और इनके बल पर उन अस्थाई इक्षाओं की पूर्ति में लगे लगे समाप्त हो जाता है। किंतु जो व्यक्ति इस जाल से बाहर आने को इक्षुक होता है वह इन दोषों को त्याग देता है। लेकिन यह त्याग तभी सम्भव हो पाता है जब व्यक्ति का लक्ष्य परम् सत्य जो उसके भीतर है , जो स्थाई है उसे प्राप्त करने की श्रद्धा के साथ प्रयास प्रारम्भ करता है।

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