श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 22
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ ।।22।।
वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है। ।।22।।
श्रद्धा ही वह बीज है जिससे कामनाओं के फल फलित होते हैं। जब हम श्रद्धा व्यक्त करते हैं, जब हम श्रद्धा रखते हैं तो श्रद्धा का परिणाम भी हमें मिलता है।
यदि हम कुछ करें और बेमन से करें तो होने वाले काम भी बिगड़ जाते हैं। यह मात्र इसलिए क्योंकि अपने काम और काम करने के प्रयास पर हमारी श्रद्धा या तो नहीं होती है या फिर स्थिर नहीं होती है। इसके विपरीत यदि हमें अपने लक्ष्य पर और इक्षित लक्ष्य के प्रति अपने प्रयास पर भरोसा हो, उनपर श्रद्धा हो तो फल मिलते हैं।
ऐसा होता क्यों है? दरअसल हमारी श्रद्धा ही फल के रूप में हमें वापस मिलती है। जब हम मनोयोग से , पूरी श्रद्धा और भरोसे से कुछ करते हैं तो हमें उस मार्ग को पता करने की ललक होती है जिसपर चलकर हम इक्षित फल पा सकें। इसके लिए हम तरह तरह से अपने ज्ञान, अपनी जानकारी और अपनी समझ में विकास करते हैं, उस कर्म को पूरा करने की आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं। इस क्रम में हम जिन चीजों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं उनमें अपने प्रयास के तकनीकी पक्ष के अतिरिक्त ये भी शामिल होता है कि हम किस तरह योगकर्म की विधि को अवनाएँ यानी कैसे हम अपने स्वभाव से उतपन्न गुणों को पहचान कर उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि करें, कैसे फल से अनासक्त होकर कर्म करें, कैसे अपने कर्म में हम लक्ष्य के प्रति समर्पित हों, कैसे हम अपने प्रयास और लक्षित फल को कल्याणार्थ भाव से समझें इत्यादि। ये सभी प्रयास ईश्वर में यानी अपनी परम् सत्ता में हमारे विश्वास को दृढ़ करते हैं जिसके परिणाम में हमें फल मिलता है।
हमें लगता है कि ये फल मात्र हमारे प्रयास से मिलें, या फल किसी अच्छी, धनात्मक शक्ति जिसे हम देवी और देवता भी कहते हैं उनके कृपा से प्राप्त हुई। लेकिन सच्चाई ये होती है कि हम इस पूरी प्रक्रिया में अपनी श्रद्धा के कारण उस धनात्मक शक्ति के प्रति, उस अच्छाई के प्रतिरूप देवता के प्रति अपने समर्पण के कारण उन ईश्वरीय क्षमताओं को प्राप्त करने की तरफ अग्रसर होते हैं जो हमें परम् लक्ष्य की तरफ ले जाती हैं। सो ये श्रद्धायुक्त क्षमताएँ हमारे प्रयास को सफल बनाती हैं, भले हम मिट्टी की पूर्ति पूजें, या नदी , या पेड़ को पूजें, मूल में योगकर्म की परम चेतना ही हमारा संचालक बनती है।
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