8.विष्णुसहस्रनाम-9-भूतभावनः

8.विष्णुसहस्रनाम-9-भूतभावनः

ईश्वर ही सभी को रचते भी हैं और वही सभी के विकसित होने और उनकी वृद्धि के कारण भी होते हैं। 
         सम्पूर्ण संसार, दृश्य और अदृश्य, चर और अचर ईश्वर की रचना भर हैं। हम सभी उन्हीं विष्णु यानी ईश्वर के स्वरूप मात्र हैं, जड़ में भी और चेतन में भी। जब हम ईश्वर की ही रचना हैं, उन्हीं के जड़ और चेतन प्रकृति के संयोग मात्र हैं तो हम अपने जड़ और चेतन दोनों रूपों में ईश्वर ही हैं। अब यह हमारे संस्कारों की जो स्थिति है तय होता है कि हम कितने हद तक खुद के ईश्वरीय होने की समझ को समझ पाते हैं। 

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