व्यवहारिक प्रशिक्षण-श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7
व्यवहारिक प्रशिक्षण-श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7
परिचय
अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझाया है कि कैसे हम अपने को पहचान पाते हैं, कैसे हम समझ पाते हैं कि हम मात्र शरीर, मन और बुद्धि नही हैं, बल्कि उनसे भी आगे हम वास्तविक रुप से आत्म स्वरुप आत्मा हैं जो सभी में एकमान है और जो सम्पूर्ण विस्तार का ही एक रूप है। इस तरह श्री कृष्ण ने हमें समझाया है कि अपने वास्तविक रूप में हम सब एक हैं और हम सब परम आत्मा के ही स्वरूप हैं। हम कोई अलग इकाई नहीं बल्कि सम्पूर्णता के ही एक प्रतिरूप हैं। अपने स्व यानी सेल्फ को , अपनी आत्मा को हम कैसे पहचाने, तो इसके लिए श्रीकृष्ण ने योग का मार्ग समझाया है जिसमें व्यक्ति अपने गुणों के स्तर में उत्तरोत्तर वृद्धि करता हुआ गुणातीत होकर ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है और इसके लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग के मार्ग बताएं हैं। लेकिन इतना सब कर लेने के बाद भी ये कतई आवश्यक नहीं है कि हम खुद के अंदर के ईश्वरत्व को पहचान सकें । ईश्वरत्व की ये विभूतियाँ ही वो सम्पदा हैं जो हमें अहसास दिलाती हैं कि हम मूल रूप से ईश्वर से अलग हैं ही नहीं। लेकिन इसे हम समझें तो कैसे समझे? क्योंकि इसे समझे बिना तो ईश्वरत्व की विभूतियों का मोल ही नहीं समझ सकते। सो इस सत्य को समझाने और मनुष्य के ईश्वरत्व को जागृत करने के लिए श्रीकृष्ण भक्ति योग का मार्ग समझाने की शुरुआत कर रहें हैं। भक्ति का अर्थ है आराध्य के साथ एकीकरण और यह एकीकरण तभी सम्भव है जब भक्त और आराध्य समान गुणधर्म के हो जाएं। तो आईये हम समझें कि कैसे ईश्वरत्व को समझने के लिए उन विभूतियों के प्रति हम अनुरागी हो जाएं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 1
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ ।।1।।
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन। ।।1।।
ईश्वरीय विभूतियों की अनुभूतियों की समझ को पाकर ही व्यक्ति उन ऐश्वर्यपूर्ण विभूतियों को अपने जीवन में उतारने का अभ्यास कर ईश्वरत्व की प्राप्ति कर पाता है सो श्रीकृष्ण अर्जुन को उन विभूतियों से अवगत कराने की शुरुआत करने जा रहें हैं। किंतु इस जानकारी को हम आप मात्र पढ़ सुन कर नहीं समझ सकते। इसके लिए जरूरी है कि हम श्रीकृष्ण में अनन्य प्रेम रखें, उनसे अनन्य लगाव रखें, उनमें एकाग्र होकर रहें, उनमें ध्यान पूर्वक रहें। अर्थात जब हम ज्ञान लेने की शुरुआत कर रहें हैं तो फिर दाता के प्रति कोई संशय न रखें, उनमें पूरी श्रद्धा रखें और उनपर पूरा भरोसा रखें, यानी उनसे जुड़कर उनमें एकाकार होकर समझें।
व्यस्तुतः सत्य के अन्वेषण का तरीका भी यही है कि हम सत्य के प्रति अटूट लगाव के साथ, उसपर प्रश्नातीत विश्वास के साथ बढ़ें। और प्रेम की भावना भी यही है। प्रेम की सबसे उद्यात स्थिति में प्रेमी अपने आराध्य से विलग नहीं रह जाता है। सत्य का प्रेमी भी तो यही करता है। सत्य से यानी अपने आराध्य से एकाकार हो जाता है, प्रेमी और आराध्य,अन्वेषक और सत्य, भक्त और भगवान अलग अलग कँहा रह जाते हैं। और यही चरम अथवा परम् स्थिति है जब हम पहचानते हैं कि हम भी वही हैं जिसे हम पाने की कोशिश कर रहे थे। उसके विस्तार के ही हम प्रतिरूप हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 2
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ ।।2।।
मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता है। ।।2।।
जब हम ईश्वर से असीम श्रद्धा के साथ और अतिशय प्रेम के साथ जुड़ जाते हैं तो हमें न केवल ईश्वरोय विभूतियों का ज्ञान मिलता है बल्कि उन विभूतियों को प्राप्त करने का प्रत्यक्ष मार्ग भी मिलता है जिसके अनुसार हमें उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी होती है। हम सिर्फ ये नहीं जानते हैं कि ईश्वर क्या है , कौन है बल्कि हम उस ईश्वर को खुद के अंदर अनुभव भी करने लगते हैं। ईश्वरत्व की समझ प्राप्त करना जँहा ज्ञान है वंही उसकी अनुभूति कर लेना विशेष ज्ञान यानी विज्ञान है। जब हम ईश्वरत्व को समझ कर उसकी अनुभूति खुद के अंदर कर लेते हैं तो फिर जानने के लिए कुछ और शेष नहीं रह जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ ।।3।।
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। ।।3।।
हम सभी आत्मान्वेषण के महत्व को सुनते और जानते तो हैं, पढ़ते और चर्चा भी करते हैं किंतु इस मार्ग पर चलने का प्रयास करने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प होती है। मूर्ति के समक्ष स्तुति पढ़ना, धूप अगरबत्ती दीया दिखाना अपने आत्मा का साक्षात्कार करना नहीं होता है। बल्कि वह तो कतिपय इक्षाओं की पूर्ति का प्रयास मात्र है। हममे से अधिकांश व्यक्ति मात्र अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं, जी रहें हैं इसी से खुश हो लेते हैं तो कुछ लोग इससे आगे बढ़कर सांसारिक सुखों को भोगने के लिए जीवन जीते हैं। कुछेक का उद्देश्य इससे आगे के सुख सुविधाओं को पाना होता है सो कुछ दान पुण्य करते हैं। किंतु बहुत कम लोग ही आत्मसाक्षात्कार के पथ पर चलते हैं जो योगमार्ग पर चलकर अपने सत्य को पहचानना चाहते हैं और खुद को वृहत्तर सत्य के साथ एकीकृत करना चाहते हैं। लेकिन इस मार्ग पर चलते हुए थोड़ी प्रसिद्धि मिली नहीं कि वे भी दिग्भ्रामित होकर संतुष्ट होकर आगे की यात्रा छोड़ संतुष्ट हो जाते हैं। इन अत्यल्प व्यक्तियों में से कुछ ही ऐसे होते हैं जो परम् सत्य को पाए बिना यात्रा नहीं छोड़ते, और योगमार्ग से चलकर अंतिम सत्य तक पहुंच कर खुद के अस्तित्व को परम के साथ एकीकृत कर लेना ही उनका लक्ष्य होता है। वे खुद के शरीर के लिए नहीं जीवन जीते हैं बल्कि उनका उद्देश्य परम आत्मा के साथ अपने स्व को मिला कर उस परम पद को पाना होता है जिसे हम मोक्ष कहते हैं जिसके आगे कोई जीवन शेष नहीं रह जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 4 एवं 5
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ ।।4।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है। ।।4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ ।।5।।
हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान। ।।5।।
श्रीकृष्ण उस परम ब्रह्म यानी परमात्मा का स्वरूप बताते हैं जिससे से सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। समस्त ब्रह्मांड का कारण ईश्वर है और ईश्वर को समझने के लिए उसके सूक्ष्म और अदृश्य रूप जो चेतन है को समझने के साथ साथ उसके स्थूल स्वरूप जो जड़ है को भी समझना अनिवार्य है।
समस्त चर, अचर, दृश्य और अदृश्य प्रकृति यानी जड़ यानी अपरा प्रकृति और पुरुष यानी चेतन के युग्म के परिणाम हैं और यह पुरुष(चेतन) और प्रकृति(जड़) ईश्वर के स्वरूप हैं ,उनकी अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति के रूप में ईश्वर की जो अभिव्यक्ति है वह अष्टधा प्रकृति कहलाती है जो अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी सहित मन, बुद्धि और अहंकार से मिलकर बनती है। ये स्थूल रूप हैं जिनकी सम्वेदनाओं को ज्ञानेन्द्रियाँ मन तक पहुँचाती हैं और मन में इनका वर्गीकरण, ज्ञान और अधिष्ठापन बुद्धि करती है। इंद्रियों के द्वारा विषयों का ग्रहण, मन के द्वारा इनका वर्गीकरण और बुद्धि के द्वारा इनका विनिश्चय होने के पीछे जो वृत्ति होती है वह अहंकार है। ये अष्टधा प्रकृति ईश्वर का जड़ रूप है जो चेतन के साथ संयोग करती है।
जड़ और चेतन के इस सहयोग को समझना मनुष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है क्योंकि ईश्वर के इस अनात्मा-आत्मा के संयोग को समझ कर ही व्यक्ति जीवन की उपयोगिता को भी समझता है और समझता है कि उसका स्थूल स्वरूप उसके चेतन स्वरूप से कैसे भिन्न है। ईश्वर के जड़ और चेतन के इस स्वरूप को समझ कर ही व्यक्ति यह भी समझता है कि जड़ और चेतन दोनों ही अवस्था में वह ईश्वर का प्रतिरूप है और इस समझ से उसे अपने दायित्वों का बोध भी होता है।
परम् की दुसरी प्रकृति को परा प्रकृति कहते हैं जो चेतना है। इसे ही पुरुष का नाम भी देते हैं। यँहा पुरुष शब्द सामान्य बोल चाल की भाषा अर्थ से भिन्न चेतना को अभिव्यक्त करता है।
जब जड़ यानी प्रकृति यानी अपरा से चेतन यानी पुरुष यानी परा का संयोग होता है तो जीव का आविर्भाव होता है। यही चेतना स्थूल शरीर की आत्मा है जो सबों में समान रूप से विद्यमान है, इसमें कोई फर्क नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 6
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ ।।6।।
हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात् सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ। ।।6।।
ये संसार, ये सम्पूर्ण कॉसमॉस क्या है? ये क्यों हैं? ये सभी जड़ और चेतन के संयोग मात्र हैं। सम्पूर्ण जीवन और सम्पूर्ण विनाश इन्ही जड़ और चेतन के संयोग के विभिन्न रूप हैं। और ये जड़ और चेतन क्यों हैं, कँहा से आते हैं? ये दोनों ईश्वर के प्रकृति हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत ही ईश्वर का स्वरूप मात्र है। सम्पूर्ण जगत ईश्वर की प्रकृति का स्वरूप मात्र हैं। वह जन्म भी लेता है ईश्वर से और फिर ईश्वर में ही विलीन हो जाता है। इस प्रकार हम , आप, अन्य, चर, अचर, दृश्य, अदृश्य कुछ भी ईश्वर से भिन्न नहीं है। और यही सगुण और निर्गुण है, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप ईश्वर के किंस स्वरूप को समझ पाते हैं लेकिन ईश्वर को समझने का और इस माध्यम से अपने अस्तित्व के महत्व को समझने का सबसे सरल तरीका यही है कि आप सभी को ईश्वर का रूप समझ कर सभी से प्रेम में रहें, स्वयं से प्रेम में रहें। न तो सृजन ईश्वर से भिन्न है, न ही विनाश सो ईश्वर के सभी अभिव्यक्ति से प्रेम और उन्ही की भक्ति में आपके होने का महत्व है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ ।।7।।
हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है। ।।7।।
हमने देखा समझा है कि सब कुछ जड़ और चेतन, परा और अपरा, प्रकृति और पुरुष के विभिन्न संयोग से ही है। और ये दोनों प्रकृति ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत में जो कुछ है वह सब ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र है, सभी उसी के कारण है। ये एक ऐसा सत्य है जिसे समझ लेने के पश्चात व्यक्ति सम्पूर्ण जगत के प्रति भक्तिभाव, प्रेम भाव रखने लगता है, वह समस्त भेदों से परे हो जाता है क्योंकि जो कुछ है वह सब ईश्वर का स्वरूप मात्र है और उसी परम् ईश्वर के कारण है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ ।।8।।
हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। ।।8।।
अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सांसारिक उदाहरणों से ईश्वर की अनुभूति का मार्ग बताते हैं। हम सभी ईश्वरत्व को समझ सकते हैं बशर्ते हम उनकी अनुभूति को समझने के योग्य हों। यह योग्यता व्यक्तियों को उस समझदारी से आती है जो उनको मौलिकता से परिचित कराती है। इसी मौलिकता से हमें परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण ने उन वस्तुओं का सहारा लिया है जिन्हें हम देख, सुन,सकते हैं, जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व कुछ ऐसा नहीं है जो हमारी समझ से परे हो।
अब हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने किन किन माध्यमों से ईश्वरत्व से हमें परिचित कराया है।
1.जल के स्वाद में ईश्वरत्व है। जल का स्वाद न मीठा है, न तीता, न नमकीन ही। यह तो निरपेक्ष है। ईश्वर इसी निरपेक्षता में है जिसे हमारी इन्द्रिय महसूस कर सकती है।
2. सूर्य और चंद्रमा में ईश्वरत्व उनके तेज में है। प्रकाश ही वह स्रोत है जिसके कारण हम कोई वस्तु देख सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व ही वह मूल है जो हमें सबकुछ देखने और उसके माध्यम से समझने के लिए क्षमता प्रदान करता है।
3.ईश्वरत्व की अनुभूति ज्ञान की अनुभूति है। वेदों का मूल ॐ है, यानी ईश्वरत्व की अनुभूति ज्ञान से होती है ।
4. हम शब्दों से खुद को अभिव्यक्त करते हैं , बोलना और सुनना समझ विकसित करता है और इनके मूल में शब्द हैं जो ईश्वरत्व को व्यक्त कर सकने में सक्षम होते हैं।
5.मनुष्यों की मौलिकता मानवता में होती है और मौलिक मानवता ही ईश्वरत्व को व्यक्त करता है। मानवता ही ईश्वरत्व है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि एक व्यक्ति में किस तरह से ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति मिलती है। सर्वप्रथम हम मनुष्य हैं और मनुष्य होने के नाते हमारा मौलिक गुण मानवता का है। हममें शब्दों को सुनने की क्षमता है और उस क्षमता से हम ज्ञान को श्रवण के माध्यम से जानकर समझ पाते हैं। ज्ञान हमारे मन मस्तिष्क को, हमारी आँखों को प्रकाशित करता है, उन्हें मार्ग प्रशस्त करता है और इसके माध्यम से हम जीवन की मौलिकता को जल के स्वाद की तरह समझ पाने में सक्षम हो पाते हैं। इस प्रकार से हम ईश्वरत्व को व्यक्ति खुद के अंदर अनुभव कर पाता है, समझ पाता है, उसे खुद में समाहित कर पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 9
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ।।9।।
मैं पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ। ।।9।।
ईश्वर की अनुभूति को समझने के लिए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि धरती में जो पवित्र गंध होता है वह भी ईश्वरीय स्वरूप ही है। इसकी वास्तविक अनुभूति तब होती है जब हम पृथ्वी को उसके सबसे पवित्र रूप में पाते हैं अर्थात जब उसे हम किसी भी तरह से प्रदूषित नहीं किये होते हैं। अग्नि में उस अग्नि का तेज ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति है जिसके कारण हम अग्नि को उसके ताप के साथ अनुभव कर पाते हैं।
सभी प्राणियों में ईश्वरत्व उन प्राणियों का जीवन है जिसकी उपस्थिति मात्र से जीव चैतन्य होता है । इसी प्रकार जब व्यक्ति एक बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से जब प्रयत्नशील होता है अर्थात जब व्यक्ति तपस्वी होता है तो उसका वह प्रयास अर्थात तप ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति है।
उक्त उद्धरणों से ये स्पष्ट होता है कि ईश्वर कोई ऐसी अनुभूति नहीं जिसे किसी स्थल विशेष में खोजा जा सके। बल्कि ईश्वर जीवन में, इसी संसार में हर तरफ अभिव्यक्ति में है। जरूरत है सिर्फ अपनी दृष्टि को साफ करने की। जब अपनी दृष्टि साफ हो तो ईश्वर की अनुभूति हर दृश्य और अदृष्य में स्वतः होने लगती है, उसे खोजना नहीं पड़ता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ ।।10।।
हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। ।।10।।
सभी जीवों की चेतना का कारण ईश्वर ही हैं सो सभी जीवों की उतपत्ति भी उन्हीं के कारण है। ईश्वर विहीन जीवन जड़ है। जड़ जब चेतन से संयोग करता है तो जीवन का निर्माण होता है। इस प्रकार सभी जीवन का मूल ईश्वर है। ईश्वरीय चेतना के बिना जो जीवन्त है वह जड़ के समान ही है।
जीवन का उद्देश्य बुद्धि की परिपूर्णता से पूरी होता है। बुद्धि तीन प्रकार की होती है। शुद्ध, तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि। शुद्ध बुद्धि पवित्र मूल्यों की बुद्धि है जिसमें सत्य, अहिंसा, धर्म, दया आदि गुणों का महत्व होता है। तीक्ष्ण बुद्धि कुशाग्रता का परिचायक है और सूक्ष्म बुद्धि आध्यत्म की बुद्धि है। जब शुद्ध बुद्धि का प्रदर्शन किसी दबाव में होता है तो वह निरर्थक और समाज के लिए हानिकारक है। तीक्ष्ण बुद्धि को यदि शुद्ध बुद्धि का साथ नहीं मिला तो तीक्ष्ण बुद्धि अति घातक हो जाती है। सूक्ष्म बुद्धि शुद्ध बुद्धि का विस्तार है जिससे व्यक्ति स्वयं की आत्मा से साक्षात्कार के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग पर प्रशस्त होता है।
जो व्यक्ति तेजस्वी है उसका तेज ईश्वरीय होता है। यह तेज उसकी शुद्धता और ईश्वरीय बुद्धि का परिणाम वश होता है और उस तेज में हर अंधकार विलीन हो जाता है।
इस प्रकार ईश्वर का वास व्यक्ति के गुणों में होता है, उसके संस्कारों में होता है न कि किसी स्थान विशेष में। जिस किसी में ये गुण हैं वह ईश्वरीय विभूतियों से युक्त है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 11
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ ।।11।।
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ। ।।11।।
ईश्वर का वास हर रूप में , प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूपों में होता है , जरूरत होती है इसे समझने की। तभी तो श्रीकृष्ण समझाते हुए कहते हैं कि व्यक्तियों में कामना और मोह मुक्त जो बल होता है वह बल भी ईश्वर ही हैं। यँहा बल का अर्थ मात्र शारीरिक बल से नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, चरित्र, सोच, आदि हर स्तर पर जो बल होता है वह सभी इस बल में सम्मिलित हैं। बल अर्थात मामर्थ्य ईश्वर का ही रूप है लेकिन यह सामर्थ्य ईश्वर तब है जब इसमें कामना और मोह का अभाव होता है क्योंकि काम और मोह युक्त बल हमें गलत मार्ग पर ले जाने में सक्षम होते हैं।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सभी इक्षाएँ वर्जित ही हों। कुछ इक्षाएँ ऐसी भी होती हैं जो धर्म सम्मत होती हैं, जिनमें ईश्वर की कामना होती है, उनसे लगाव होता है और जिनका उद्देश्य खुद को चुस्त दुरुस्त रखना और जन कल्याण होता है। ये कामनाएँ भी ईश्वर ही हैं।
इस प्रकार ईश्वरत्व हमारी उन भावनाओं में बसता है जिन भावनाओं का लक्ष्य जगत के कल्याण में निहित होता है। कामनाओं की उपस्थिति तभी ईश्वरीय होती हैं जब वे निहित स्वार्थ से आगे जाकर समष्टि कल्याण से जुड़ी होती हैं। इसी प्रकार वही सामर्थ्य ईश्वरीय स्वरूप को व्यक्त करता है जो सामर्थ्य क्षुद्र स्वार्थपरक इक्षाओं और उनको बाँधने वाले मोह से मुक्त होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ ।।12।।
और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं। ।।12।।
हमने देखा जाना है कि प्रकृति के तीन गुण होते हैं, सत्वगुण(पवित्रता, विवेक), रजोगुण (गति) और तमोगुण(जड़त्व) और ये तीनों गुण प्रकृति के सभी दृश्य और अदृश्य रूपों में व्यक्त हैं। किंतु इन गुणों का उद्गम ईश्वर है जिनसे ये तीनों गुण प्रवाहित होते हैं। लेकिन ईश्वर इन गुणों से मुक्त है। अर्थात गुणों का अस्तित्व भले ही ईश्वर पर निर्भर है किंतु ईश्वर के उपस्थिति के लिए ये तीनों गुण महत्वहीन हैं अर्थात ईश्वर तीनों गुणों का उद्गम होने के बावजूद इन तीनों गुणों से मुक्त होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ ।।13।।
गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता है। ।।13।।
हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं। दर्पण जितना साफ रहता है चेहरा भी उतना ही साफ दिखता है। यदि दर्पण पर धूल आदि जमा हो तो फिर प्रतिबिम्ब धुँधला हो जाता है जबकि चेहरा तो वही रहता है, यानी गंदे दर्पण में बढ़िया बिम्ब की भी खराब आकृति आती है। इसी प्रकार यदि दर्पण के शीशे में कोई दोष हो तो दर्पण साफ रहने के बावजूद एक बढ़िया, सुडौल चेहरे की आकृति विकृत नजर आती है। दोष शीशे में होता है, बिम्ब में नहीं। ठीक यही हालत ईश्वर की समझ के बारे में हमारी होती है। तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुणों से निर्मित प्रकृति में यदि कोई विकृति आती है तो फिर ईश्वर को समझना लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि इन तीन गुणों से निर्मित हमारी बुद्धि ईश्वर कोंसमझ ही नहीं पाती है। ये विकृतियाँ तरह तरह की हो सकती हैं जैसे मोह, लगाव, क्रोध, घृणा, हिंसा, असत, अहंकार आदि।
लेकिन जैसे ही हम अपनी प्रकृति को संस्कृत करते हैं यानी उसे अच्छे गुणों से प्रशिक्षित और परिपूर्ण करते हैं, प्रकृति में आई विकृति दूर होने लगती है और ईश्वर की समझ विकसित होने लगती है। इंसान मूलतः अच्छा होता है,और उसमें ईश्वरत्व की सभी सम्भावनाएँ मौजूद होती हैं, किंतु प्रकृति में आई विकृति उसे दानव बना देती है और प्रकृति में आई संस्कृति उसे ईश्वर बना देती है। अब ये हमारे हाथ में है कि हम किधर जाना चाहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ ।।14।।
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं। ।।14।।
ईश्वर को जानना और खुद के वास्तविक स्वरूप को जानना दोनों एक ही है। जो साक्षात है वह प्रकृति है, जिसके तीन गुण हैं, तमो, रजो और सत्व गुण। यह साक्षात प्रकृति इन्हीं तीन गुणों का प्रदर्शन है। और यही माया भी कहलाती है। इस प्रकृति अथवा माया के साक्षात स्वरूप से परे जो दिखता नहीं है वह चेतना है। जब प्रकृति चेतना से मिलती है तो अनुभव की जा सकती है। और ये दोनों, प्रकृति और चेतना, माया और पुरुष एक ही स्रोत से आते हैं जो इन दोनों से परे है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। सो ईश्वर को जानने के लिए इस पकृति और इसकी चेतना से आगे जाना होता है। जो इस प्रकृति में ही उलझा रह जायेगा वो भला कैसे उद्गम तक पहुंच पायेगा। ये बहुत ही सामान्य समझ की बात है कि यात्रा के छोटे छोटे पड़ाव पर रुककर ही यदि हम अपना समय व्यतीत कर देते हैं तो मंजिल पर कैसे पहुँच पाएंगे। सो जरूरी है कि हम इस यात्रा में ठहर न जायें, बल्कि मंजिल की तरफ अग्रसर हों। मंजिल पहुंचने के लिए ये भी आवश्यक है कि हम यात्रा के हर पड़ाव को पार करें। यानी प्रकृति के तीनों गुणों को एक एक कर पार करें, उनसे आगे बढ़ें क्योंकि इन गुणों से उतपन्न कोई भी भाव या वस्तु हमारी मंजिल नहीं है, हमें उनसे आगे जाकर प्रकृति की चेतना को पाना है और फिर उस चेतना को भी पार कर प्रकृति और चेतना के मूल उद्गम में समाहित हो जाना है। यदि अति सरल ढंग से समझें तो हमको इतना ही ध्यान देना है कि प्रकृति/माया हमारा लक्ष्य नहीं है सो हम इनमें उलझे नहीं बल्कि मूल उद्गम यानी ईश्वर में लीन हों , भले ही शरीर से हम प्रकृति में अवस्थित रहें। लेकिन ये ध्यान रहे कि अंतिम।मंजिल पर पहुंचने के पूर्व यात्रा का प्रत्येक पड़ाव महत्वपूर्ण है। प्रकृति और इसके गुण निरर्थक नहीं है। बिना इन गुणों में क्रमशः आगे बढ़े कोई भी परम की यात्रा नहीं कर सकता है। हमें प्रकृति के गुणों में उत्तरोत्तर बढ़ते हुए ही पहले चेतना और फिर परम् ब्रह्म की यात्रा करनी होती है। सो प्रकृति/माया में उलझे नहीं बल्कि उसे ही सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ पा सकते हैं । लेकिन जो उसमें उलझ जाते हैं वही रुक जाते हैं और प्रकृति की नश्वरता में ही समाप्त होकर रह जाते हैं। उनका उद्धार नहीं हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 15
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ ।।15।।
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते हैं। ।।15।।
ईश्वरीय अनुभूति से कौन लोग वंचित रह जाते हैं? ऐसे कौन लोग होते हैं जो ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं रखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर सीधा सा है। आपको कितना ज्ञान है, आप कितने पहुँचे हुए हैं यह मायने नही रखता है। प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि पर प्रकृति यानी माया का प्रभाव पड़ता है लेकिन जो व्यक्ति मात्र और मात्र केवल इसी माया के वश में होकर अपनी चेतना को भूल जाता है उसकी बुद्धि आसुरी सम्पदाओं से प्रभावित हो जाती है। ऐसे लोग आसुरी गुणों से जैसे, मोह, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, अहंकार, हिंसा, असत्य आदि से अधिक प्रभावित होते हैं और इन्हीं आसुरी गुणों के प्रभाव से अपने कर्म भी करते हैं। ऐसे लोग तमाम ज्ञान के बावजूद मूढ़ ही होते हैं क्योंकि इन आसुरी गुणों के अधीन कर्म करने वाले अपने सहित किसी का कल्याण नहीं सोच पाते हैं। ऐसे लोगों के जेहन में कभी भी ईश्वरीय अनुभूति के प्रति लगाव पनपता ही नहीं है और वे निरंतर नश्वर, और स्वार्थी हितों में लीन होकर ईश्वर से विमुख ही रहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 16
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ ।।16।।
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी- ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं। ।।16।।
ईश्वर की आराधना वही करता है जो स्वयम योगकर्म करता है। जिसकी ईश्वर में कोई आस्था ही नहीं , जो योगमार्ग से कर्म ही नहीं करता वह भला ईश्वर की आराधना क्या कर सकता है। ईश्वर की आराधना ऐसे लोग चार कारणों से करते हैं।
1.कुछ लोग ईश्वर की आराधना सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए करते हैं। 2. तो कुछ लोग अपने जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए ईश्वर को भजते हैं। 3. कुछ लोगों के मन में ईश्वर को जानने की जिज्ञासा होती है, सो ईश्वर की आराधना करते हैं। 4.जो योगकर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं वे ईश्वर को साक्षात प्राप्त करने हेतु ईश्वर की आराधना किया करते हैं
इस प्रकार हर वो व्यक्ति जिसकी अनुरक्ति ईश्वर में होती है वह अनेकानेक कारणों से प्रेरित होकर ईश्वर की आराधना करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ ।।17।।
उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है। ।।17।।
जो चार प्रकार के लोग ईश्वर की आराधना करते हैं उनमें से कुछ कामनाओं की पूर्ति के लिए, कुछ दुख दर्द के खात्मे के लिए तो कुछ ईश्वर को समझने के लिए आराधना करते हैं जो अस्थाई होता है क्योंकि वह कारण वश की गई आराधना है, स्वार्थवश की गई आराधना है जो कारण की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है। लेकिन जो ईश्वर को स्वयम के सेल्फ के विस्तार के रूप में देखता है वह बिना किसी कारण के ही ईश्वर से लगाव रखता है। सो ईश्वर सभी की मदद करते हैं किंतु जिसे खुद में ईश्वर का ही विस्तार दिखता है, जिसके लिए इशभक्ति किसी कारण से प्रेरित नहीं है वह ईश्वर को विशेष प्रिय होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥ ।।18।।
ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है। ।।18।।
जो चार तरह के लोग ईश्वर की भक्ति करते हैं उनमें कुछ सांसारिक सुख की प्राप्ति हेतु, कुछ अपने दुखों को दूर करने हेतु, और कुछ ईश्वर के प्रति अपनी जिज्ञासा के कारण इशभक्ति करते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ और सिर्फ इसलिए इशभक्ति में लीन होते हैं क्योंकि वे अपनी आत्मा के स्तर पर स्वयम को ईश्वर का ही अंश मानते हैं। यह मानना हठात नहीं हो पाता है बल्कि कर्मयोग के मार्ग पर चलकर विभिन्न सोपानों से गुजरते हुए व्यक्ति अनुभूति को प्राप्त करता है। यही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता , इसे हो योगारूढ़ भी कहते हैं और यही ज्ञानी भी है और यही ज्ञानी ईश्वर के सबसे समीप है। अन्य भक्त अभी यात्रा के विभिन्न चरणों में हैं और उन्हें भी चाहिए कि अपनी यात्रा को कार्योग के मार्ग पर आगे बढाते हुए ज्ञानी बन ईश्वरत्व को प्राप्त करें। सभी ईश्वर के ही अंश हैं किंतु इसका भान तब तक नहीं होता है जब तक आप योगकर्म नहीं करते हैं और जब करते हैं तो ऐसे सभी की परिणति ईश्वरत्व की प्राप्ति में ही होती है, भेद मिट जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 19
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ ।।19।।
बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ।।19।।
जब ईश्वर का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, जब यह मन, वचन कर्म से, इन्द्रिय और बुद्धि से इस तथ्य को व्यक्ति आत्मसात कर लेता है कि उसके स्वरूप और ईश्वर में कोई भिन्नता नहीं है बल्कि वह भी आत्मिक स्तर पर, अन्य सभी भी अपने आत्मिक स्तर पर सर्वव्यापी ईश्वर के ही स्वरूप भर हैं उनका अपना निजी ईगो नहीं है तब भी उस व्यक्ति को रुकना नहीं होता है बल्कि उसे निरन्तर उसी ज्ञान का अनुभव करते हुए ईश वंदन में लीन होना होता है। यह अवस्था समर्पण की चरम अवस्था है। इस तरह का व्यक्ति निरन्तर यह समझता है कि सब में देव का वास है, अर्थात सब वासुदेव ही हैं। ऐसा व्यक्ति मन से, शरीर से, बुद्धि से निरन्तर सभी की सेवा, सभी के कल्याण में लगा होता है क्योंकि उसकी नजर में तो ये संसार ही भगवान हैं , भगवान से इतर कुछ है ही नही तो फिर कैसी हिंसा, कैसा असत्य, कैसा अहंकार, कैसी माया!
यह व्यक्ति वास्तव में महान आत्मा का पुजारी होता है और महात्मा कहलाता है। निश्चित ही ऐसा व्यक्ति दुर्लभ होता है पर जो ऐसे हैं वे वंदनीय हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 20
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ ।।20।।
उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। ।।20।।
प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान और समर्पण के उच्चतम सीमा पर तो नहीं पहुँचा होता है, बल्कि सामान्य इंसान के रूप में अपना जीवन व्यतीत करता है और उसके मन में जीवन के लिए कई कामनाएं भी होती हैं जो मुख्यतः शरीर से सम्बंधित, सम्पन्नता और ऐशवर्य से सम्बंधित, ऐशो आराम से समन्धित होती हैं और इनकी पूर्ति हेतु अपनी आस्था के अनुसार उन कामनाओं से जुड़े विभिन्न देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा भी व्यक्त करता है और उनकी पूजा भी करता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रति समर्पित होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 21
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ ।।21।।
जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ। ।।21।।
समर्पण श्रद्धा पर निर्भर करता है। जब कामनाओं की पूर्ति हेतु वयक्ति किसी देवता विशेष के प्रति समर्पित होता है तो इसकी सफलता के लिए आवश्यक होता है कि उसके प्रति उसे श्रद्धा हो। श्रद्धा विहीन समर्पण निष्फल होता है। लेकिन यदि उस समर्पण में श्रद्धा हो यानी उस पर भरोसा हो, भरोसे के साथ समर्पण हो तो व्यक्ति अपनी इक्षित कामनाओं की पूर्ति में सक्षम होता है। उसकी श्रद्धा उसे बल देती है, हिम्मत देती है , भरोसा देती है और इसके कारण उसकी पूजा उसे ही समर्थवान बनाती है। यंही से उसकी यात्रा आगे बढ़ती है ।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 22
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥ ।।22।।
वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है। ।।22।।
श्रद्धा ही वह बीज है जिससे कामनाओं के फल फलित होते हैं। जब हम श्रद्धा व्यक्त करते हैं, जब हम श्रद्धा रखते हैं तो श्रद्धा का परिणाम भी हमें मिलता है।
यदि हम कुछ करें और बेमन से करें तो होने वाले काम भी बिगड़ जाते हैं। यह मात्र इसलिए क्योंकि अपने काम और काम करने के प्रयास पर हमारी श्रद्धा या तो नहीं होती है या फिर स्थिर नहीं होती है। इसके विपरीत यदि हमें अपने लक्ष्य पर और इक्षित लक्ष्य के प्रति अपने प्रयास पर भरोसा हो, उनपर श्रद्धा हो तो फल मिलते हैं।
ऐसा होता क्यों है? दरअसल हमारी श्रद्धा ही फल के रूप में हमें वापस मिलती है। जब हम मनोयोग से , पूरी श्रद्धा और भरोसे से कुछ करते हैं तो हमें उस मार्ग को पता करने की ललक होती है जिसपर चलकर हम इक्षित फल पा सकें। इसके लिए हम तरह तरह से अपने ज्ञान, अपनी जानकारी और अपनी समझ में विकास करते हैं, उस कर्म को पूरा करने की आवश्यक शर्तों को पूरा करते हैं। इस क्रम में हम जिन चीजों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं उनमें अपने प्रयास के तकनीकी पक्ष के अतिरिक्त ये भी शामिल होता है कि हम किस तरह योगकर्म की विधि को अवनाएँ यानी कैसे हम अपने स्वभाव से उतपन्न गुणों को पहचान कर उनमें उत्तरोत्तर वृद्धि करें, कैसे फल से अनासक्त होकर कर्म करें, कैसे अपने कर्म में हम लक्ष्य के प्रति समर्पित हों, कैसे हम अपने प्रयास और लक्षित फल को कल्याणार्थ भाव से समझें इत्यादि। ये सभी प्रयास ईश्वर में यानी अपनी परम् सत्ता में हमारे विश्वास को दृढ़ करते हैं जिसके परिणाम में हमें फल मिलता है।
हमें लगता है कि ये फल मात्र हमारे प्रयास से मिलें, या फल किसी अच्छी, धनात्मक शक्ति जिसे हम देवी और देवता भी कहते हैं उनके कृपा से प्राप्त हुई। लेकिन सच्चाई ये होती है कि हम इस पूरी प्रक्रिया में अपनी श्रद्धा के कारण उस धनात्मक शक्ति के प्रति, उस अच्छाई के प्रतिरूप देवता के प्रति अपने समर्पण के कारण उन ईश्वरीय क्षमताओं को प्राप्त करने की तरफ अग्रसर होते हैं जो हमें परम् लक्ष्य की तरफ ले जाती हैं। सो ये श्रद्धायुक्त क्षमताएँ हमारे प्रयास को सफल बनाती हैं, भले हम मिट्टी की पूर्ति पूजें, या नदी , या पेड़ को पूजें, मूल में योगकर्म की परम चेतना ही हमारा संचालक बनती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 23
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ ।।23।।
परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।23।।
हर इक्षा की एक निश्चिय उम्र होती है। इक्षा पूर्ति हेतु हम उस इक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों की आराधना करते हैं , उनके प्रति समर्पित होते हैं यानी उस इक्षा के प्रतिनिधि देवी या देवता के प्रति श्रद्धा रखकर उस इक्षा की पूर्ति करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया के कुछ दोष भी हैं। पहला दोष तो यही है कि हर इक्षा पूर्ण होने के बाद समाप्त हो जाती है। दूसरा दोष है कि एक इक्षा दूसरी इक्षा को जन्म देती है जिसके परिणाम स्वरूप हम इन इक्षाओं के जाल में फंस कर रह जाते हैं। सो ऐसे लोग अपनी श्रद्धा के बावजूद परम् लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं हो पाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति इन छोटी छोटी इक्षाओं से ऊपर उठ कर अपने सेल्फ को ढूँढने और पाने की इक्षा करता है यानी खुद को परम के साथ युक्त कर लेने की इक्षा रखता है वह व्यक्ति परमब्रह्म के प्रति अपनी श्रद्धा रखकर उनपर समर्पित होता है।
वस्तुतः जीवन यापन के लिए छोटी इक्षाओं का अपना महत्व है हीं लेकिन जीवन का लक्ष्य मात्र भौतिक इक्षाओं जो व्यक्ति से बाहर अपना अस्तित्व रखती हैं और अस्थाई चरित्र की होती हैं की पूर्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये व्यक्ति को सीमित कर देती हैं और उसे खुद के अंदर खुद को खोजने और पाने की फुर्सत नहीं देती हैं। नतीजा ये होता है कि व्यक्ति तमाम तरह के विकारों जैसे, मोह, लगाव, तृष्ना, क्रोध, ईर्ष्या, हिंसा, अहंकार आदी का दास बन जाता है और इनके बल पर उन अस्थाई इक्षाओं की पूर्ति में लगे लगे समाप्त हो जाता है। किंतु जो व्यक्ति इस जाल से बाहर आने को इक्षुक होता है वह इन दोषों को त्याग देता है। लेकिन यह त्याग तभी सम्भव हो पाता है जब व्यक्ति का लक्ष्य परम् सत्य जो उसके भीतर है , जो स्थाई है उसे प्राप्त करने की श्रद्धा के साथ प्रयास प्रारम्भ करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 24
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥ ।।24।।
बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं। ।।24।।
जब मन इक्षाओं की पूर्ति और कामनाओं को साधने में ही व्यस्त रह जाता है तो दृष्टि का विस्तार नहीं हो पाता है । बुद्धि तो इन इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति और पूर्ति होने और नहीं होने के परिणामों में उलझी होती है, व्यक्ति उसके आगे नहीं देख पाता है। मजे की बात है कि जब सब कुछ मनोकुल चलते रहता है तब तो वे देवता भी स्मरण में नहीं आते हैं जिनकी शरण में व्यक्ति अपने कष्ट के समय भागा हुआ जाता है। इस अत्यंत संकुचित दृष्टि वाले व्यक्ति से ईश्वरत्व की समझ रखने की अपेक्षा करना मूर्खता है।
ईश्वरत्व का वास तो हर व्यक्ति तक में है किंतु संकुचित कामनाओं में उलझा व्यक्ति अपने अंदर झाँक कँहा पाता है। उसे फुर्सत भी नहीं मिलती कि वह कामनाओं के पार के जीवन को और उसके महत्व को समझ पाए और सच्चाई यह है कि बिना ये किये परमात्मा की उपस्थितों का ज्ञान सम्भव ही नहीं है। जब तक ये नहीं होता है लोग अपने अपने स्वार्थों की पूर्ति को ही अपने जीवन का ध्यय बनाकर चलते हैं। उनके लिए स्वार्थ की पुर्ति में ही जीवन का आनंद है सो स्वार्थ पूर्ति में थोड़ी बाधा आई नहीं कि वे बेचैन हो उठते हैं। ऐसे लोग न तो अपने अंदर के ईश्वरत्व को समझ पाते हैं न ही बाहर के।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥ ।।25।।
अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है। ।।25।।
अब प्रश्न उठता है कि अधिकांश लोग ईश्वर की सत्यता को क्यों नहीं जान पाते हैं। दरअसल हमारे सत्य की समझ दृश्य तक ही सीमित होती है, जो दिखता है हमारी दृष्टि उतनी ही दूर तक देख पाती है। लेकिन जब ज्ञान के नेत्र खुलते हैं तो दृश्य के पार के सत्य भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। जब तक हम दृष्टि के पार नहीं देख पाते हैं हमारे लिए ईश्वरीय अनुभूति उनकी योगमाया से छुपी होती है। अधिकांश व्यक्तियों की नजर में पहचान की परिभाषा शरीर, मन, बुद्धि, दिख सकने वाले गुण, सामाजिक सम्बन्ध, सांसारिक उपलब्धियों आदि तक ही सीमित होते हैं और हम पहचान के इन्हीं कारकों में उलझे हुए होते हैं। तमोगुण और रजोगुण से युक्त हमारी दृष्टि में वह ईश्वर आता ही नहीं जो हमारी दृष्टि से ओझल हमारे आपके सबके अंदर विद्यमान होता है। हम उसे तृतीय पुरुष के रूप में स्त्री या पुरुष के रूप में पारलौकिक मान लेते हैं। लेकिन जब ज्ञान का विकास होता है हमारे अंदर तब उसे किसी अन्य में देखते हैं। लेकिन जब हमें ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है तब हम खुद में ईश्वर को देख पाते हैं। जब तक ईश्वरीय अनुभूति का सत्वगुण हमारे अंदर विकसित नही हो जाता तब तक हमारे लिए ईश्वरीय उपस्थिति उनके ही योगमाया से हमारी समझ से परे होती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 26
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ ।।26।।
हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता। ।।26।।
ईश्वर तो सब कुछ जानता है, फिर चाहे वह अतीत हो, वर्तमान हो या भविष्य लेकिन बिना श्रद्धा और भक्ति के व्यक्ति ईश्वर को नहीं जान पाता है। जब तक बिना शर्त समर्पण न हो, जब तक बिना किसी कामना के समर्पण न हो, जब तक व्यक्ति के मन में अटूट भरोसा न हो तब तक उस व्यक्ति के लिए ईश्वर को जान समझ पाना सम्भव नहीं होता है। श्रद्धा है तभी ज्ञान है, बिना श्रद्धा के यदि हम आप कुछ जानते हैं तो फिर जो ज्ञान अल्पजीवी होता है, जल्द ही हम विस्मृत भी हो जाते हैं क्योंकि बिना श्रद्धा के हम ज्ञान के पथ का अनुसरण नहीं कर पाते और जब तक ईश्वरीय पथ का हम अनुसरण नहीं करते तब तक मात्र पढ़, सुनकर हम उस ज्ञान को नहीं पा सकते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 27
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ ।।27।।
हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं। ।।27।।
लोगों के साथ समस्या यह होती है कि वे इक्षा और द्वेष यानी राग -द्वेष, पसन्द-नापसन्द के द्वंद्व में जीवन भर फँसे रहते हैं। वे इक्षा, राग और पसन्द की पूर्ति करने में लगे रहते हैं और इसी क्रम में अनिक्षित से, अर्थात जिससे उनको दुराव होता है, जिसके प्रति उनकी इन्द्रियाँ नापसन्दगी रखती हैं उनसे द्वेष यानी घृणा करने अपना सारा जीवन व्यतीत कर देता है। राग-द्वेष के द्वंदात्मक युग्म से निकले लाभ-हानि, मोह-ईर्ष्या, प्रेम-घृणा, लोभ आदि को पूरा करते करते लोगों का जीवन व्यतीत हो जाता है । उनको इन सब में उलझे उलझे समय ही नहीं मिलता कि वे खुद के आत्मावलोकन और आत्मसाक्षात्कार की कोशिश भी करें। नतीजा ये होता है कि उनमें वह श्रद्धा और समर्पण जागृत ही नहीं हो पाता जिससे वे ईश्वरत्व का अनुभव करें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 28, 29, 30
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ .।।28।।
परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं। ।।28।।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥ ।।29।।
जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। ।।29।।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ ।।30।।
जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं। ।।30।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ।
ईश्वरीय अनुभूति को प्राप्त करने हेतु ये अनिवार्य है कि हमारा आचरण कर्मयोग के अनुरूप हो अर्थात जब तक इक्षाओं के जाल से हम नहीं निकलते और निकल कर राग-द्वेष और मोह से मुक्त नहीं होते हैं तब तक ईश्वर की अनुभूति से वंचित ही रहते हैं। परंतु जिनको इस मार्ग का अभ्यास हो जाता है वे लोग हमेशा सभी के अस्तित्व में भी ईश्वर को ही देखते समझते हैं और अपने सभी कर्मों को भी उसी परम् आत्मा को जो सभी में समान है को समर्पित भी करते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति पूरी तरह से ईश्वरीय अनुभूति के प्रति समर्पित होता है। और ऐसी स्थिति में वह सभी की उपस्थिति और सभी कर्मों में भी ईश्वर को ही पाता है। यँहा तक कि जीवन के अंत समय में भी उसे इस तथ्य का ज्ञान और भान बना रहता है सो उसके लिए जीवन और मरण भी बन्धनकारी नहीं हो पाते हैं।
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