श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8


रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ ।।8।।


हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। ।।8।।


अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सांसारिक उदाहरणों से ईश्वर की अनुभूति का मार्ग बताते हैं। हम सभी ईश्वरत्व को समझ सकते हैं बशर्ते हम उनकी अनुभूति को समझने के योग्य हों। यह योग्यता व्यक्तियों को उस समझदारी से आती है जो उनको मौलिकता से परिचित कराती है।  इसी मौलिकता से हमें परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण ने उन वस्तुओं का सहारा लिया है जिन्हें हम देख, सुन,सकते हैं, जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व कुछ ऐसा नहीं है जो हमारी समझ से परे हो। 

           अब हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने किन किन माध्यमों से ईश्वरत्व से हमें परिचित कराया है। 

1.जल के  स्वाद में ईश्वरत्व है। जल का स्वाद न मीठा है, न तीता, न नमकीन ही। यह तो निरपेक्ष है। ईश्वर इसी निरपेक्षता में है जिसे हमारी  इन्द्रिय महसूस कर सकती है।

2. सूर्य और चंद्रमा में ईश्वरत्व उनके तेज में है। प्रकाश ही वह स्रोत है जिसके कारण हम कोई वस्तु देख सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व ही वह मूल है जो हमें सबकुछ देखने और उसके माध्यम से समझने के लिए क्षमता प्रदान करता है। 

3.ईश्वरत्व की अनुभूति ज्ञान की अनुभूति है। वेदों का मूल ॐ है, यानी ईश्वरत्व की अनुभूति ज्ञान से होती है ।

4. हम शब्दों से खुद को अभिव्यक्त करते हैं , बोलना और सुनना समझ विकसित करता है और इनके मूल में शब्द हैं जो ईश्वरत्व को व्यक्त कर सकने में सक्षम होते हैं।

5.मनुष्यों की मौलिकता मानवता में होती है और मौलिक मानवता ही ईश्वरत्व को व्यक्त करता है। मानवता ही ईश्वरत्व है।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि एक व्यक्ति में किस तरह से ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति मिलती है। सर्वप्रथम हम मनुष्य हैं और मनुष्य होने के नाते हमारा मौलिक गुण मानवता का है। हममें शब्दों को  सुनने की क्षमता है और उस क्षमता से हम ज्ञान को श्रवण के माध्यम से जानकर समझ पाते हैं। ज्ञान हमारे मन मस्तिष्क को, हमारी आँखों को प्रकाशित करता है, उन्हें मार्ग प्रशस्त करता है और इसके माध्यम से हम जीवन की  मौलिकता को जल के स्वाद की तरह समझ पाने में सक्षम हो पाते हैं। इस प्रकार से हम ईश्वरत्व को व्यक्ति खुद के अंदर अनुभव कर पाता है, समझ पाता है, उसे खुद में समाहित कर पाता है।

        

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