श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 7
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ ।।7।।
हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है। ।।7।।
हमने देखा समझा है कि सब कुछ जड़ और चेतन, परा और अपरा, प्रकृति और पुरुष के विभिन्न संयोग से ही है। और ये दोनों प्रकृति ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत में जो कुछ है वह सब ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र है, सभी उसी के कारण है। ये एक ऐसा सत्य है जिसे समझ लेने के पश्चात व्यक्ति सम्पूर्ण जगत के प्रति भक्तिभाव, प्रेम भाव रखने लगता है, वह समस्त भेदों से परे हो जाता है क्योंकि जो कुछ है वह सब ईश्वर का स्वरूप मात्र है और उसी परम् ईश्वर के कारण है।
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