श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 6

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ ।।6।।

हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ। ।।6।।

ये संसार, ये सम्पूर्ण कॉसमॉस क्या है? ये क्यों हैं? ये सभी जड़ और चेतन के संयोग मात्र हैं। सम्पूर्ण जीवन और सम्पूर्ण विनाश इन्ही जड़ और चेतन के संयोग के विभिन्न रूप हैं। और ये जड़ और चेतन क्यों हैं, कँहा से आते हैं? ये दोनों ईश्वर के प्रकृति हैं।  इस प्रकार सम्पूर्ण जगत ही ईश्वर का स्वरूप मात्र है। सम्पूर्ण जगत ईश्वर की प्रकृति का स्वरूप मात्र हैं। वह जन्म भी लेता है ईश्वर से और फिर ईश्वर में ही विलीन हो जाता है। इस प्रकार हम , आप, अन्य, चर, अचर, दृश्य, अदृश्य कुछ भी ईश्वर से भिन्न नहीं है। और यही सगुण और निर्गुण है, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप ईश्वर के किंस स्वरूप को समझ पाते हैं लेकिन ईश्वर को समझने का और इस माध्यम से अपने अस्तित्व के महत्व को समझने का सबसे सरल तरीका यही है कि आप सभी को ईश्वर का रूप समझ कर सभी से प्रेम में रहें, स्वयं से प्रेम में रहें। न तो सृजन ईश्वर से भिन्न है, न ही विनाश सो ईश्वर के सभी अभिव्यक्ति से प्रेम और उन्ही की भक्ति में आपके होने का महत्व है।

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