श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 3
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ ।।3।।
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। ।।3।।
हम सभी आत्मान्वेषण के महत्व को सुनते और जानते तो हैं, पढ़ते और चर्चा भी करते हैं किंतु इस मार्ग पर चलने का प्रयास करने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प होती है। मूर्ति के समक्ष स्तुति पढ़ना, धूप अगरबत्ती दीया दिखाना अपने आत्मा का साक्षात्कार करना नहीं होता है। बल्कि वह तो कतिपय इक्षाओं की पूर्ति का प्रयास मात्र है। हममे से अधिकांश व्यक्ति मात्र अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं, जी रहें हैं इसी से खुश हो लेते हैं तो कुछ लोग इससे आगे बढ़कर सांसारिक सुखों को भोगने के लिए जीवन जीते हैं। कुछेक का उद्देश्य इससे आगे के सुख सुविधाओं को पाना होता है सो कुछ दान पुण्य करते हैं। किंतु बहुत कम लोग ही आत्मसाक्षात्कार के पथ पर चलते हैं जो योगमार्ग पर चलकर अपने सत्य को पहचानना चाहते हैं और खुद को वृहत्तर सत्य के साथ एकीकृत करना चाहते हैं। लेकिन इस मार्ग पर चलते हुए थोड़ी प्रसिद्धि मिली नहीं कि वे भी दिग्भ्रामित होकर संतुष्ट होकर आगे की यात्रा छोड़ संतुष्ट हो जाते हैं। इन अत्यल्प व्यक्तियों में से कुछ ही ऐसे होते हैं जो परम् सत्य को पाए बिना यात्रा नहीं छोड़ते, और योगमार्ग से चलकर अंतिम सत्य तक पहुंच कर खुद के अस्तित्व को परम के साथ एकीकृत कर लेना ही उनका लक्ष्य होता है। वे खुद के शरीर के लिए नहीं जीवन जीते हैं बल्कि उनका उद्देश्य परम आत्मा के साथ अपने स्व को मिला कर उस परम पद को पाना होता है जिसे हम मोक्ष कहते हैं जिसके आगे कोई जीवन शेष नहीं रह जाता है।
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