श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 19

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ ।।19।।

बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ।।19।।

जब ईश्वर का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, जब यह मन, वचन कर्म से, इन्द्रिय और बुद्धि से इस तथ्य को व्यक्ति आत्मसात कर लेता है कि उसके स्वरूप और ईश्वर में कोई भिन्नता नहीं है बल्कि वह भी आत्मिक स्तर पर, अन्य सभी भी अपने आत्मिक स्तर पर सर्वव्यापी ईश्वर के ही स्वरूप भर हैं उनका अपना निजी ईगो नहीं है तब भी उस व्यक्ति को रुकना नहीं होता है बल्कि उसे निरन्तर उसी ज्ञान का अनुभव करते हुए ईश वंदन में लीन होना होता है। यह अवस्था समर्पण की चरम अवस्था है। इस तरह का व्यक्ति निरन्तर यह समझता है कि सब में देव का वास है, अर्थात सब वासुदेव ही हैं। ऐसा व्यक्ति मन से, शरीर से, बुद्धि से निरन्तर सभी की सेवा, सभी के कल्याण में लगा होता है क्योंकि उसकी नजर में तो ये संसार ही भगवान हैं , भगवान से इतर कुछ है ही नही तो फिर कैसी हिंसा, कैसा असत्य, कैसा अहंकार, कैसी माया! 
यह व्यक्ति वास्तव में महान आत्मा का पुजारी होता है और महात्मा कहलाता है। निश्चित ही ऐसा व्यक्ति दुर्लभ होता है पर जो ऐसे हैं वे वंदनीय हैं।

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