श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 17
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ ।।17।।
उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है। ।।17।।
जो चार प्रकार के लोग ईश्वर की आराधना करते हैं उनमें से कुछ कामनाओं की पूर्ति के लिए, कुछ दुख दर्द के खात्मे के लिए तो कुछ ईश्वर को समझने के लिए आराधना करते हैं जो अस्थाई होता है क्योंकि वह कारण वश की गई आराधना है, स्वार्थवश की गई आराधना है जो कारण की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है। लेकिन जो ईश्वर को स्वयम के सेल्फ के विस्तार के रूप में देखता है वह बिना किसी कारण के ही ईश्वर से लगाव रखता है। सो ईश्वर सभी की मदद करते हैं किंतु जिसे खुद में ईश्वर का ही विस्तार दिखता है, जिसके लिए इशभक्ति किसी कारण से प्रेरित नहीं है वह ईश्वर को विशेष प्रिय होता है।
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