श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 15

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ ।।15।।

माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते हैं। ।।15।।

           ईश्वरीय अनुभूति से कौन लोग वंचित रह जाते हैं? ऐसे कौन लोग होते हैं जो ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं रखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर सीधा सा है। आपको कितना ज्ञान है, आप कितने पहुँचे हुए हैं यह मायने नही रखता है। प्रत्येक व्यक्ति  की बुद्धि पर प्रकृति यानी माया का प्रभाव पड़ता है लेकिन जो व्यक्ति मात्र और मात्र केवल इसी माया के वश में होकर अपनी चेतना को भूल जाता है उसकी  बुद्धि आसुरी सम्पदाओं से प्रभावित हो जाती है। ऐसे लोग आसुरी गुणों से जैसे, मोह, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, अहंकार, हिंसा, असत्य आदि से अधिक प्रभावित होते हैं और इन्हीं आसुरी गुणों के प्रभाव से अपने कर्म भी करते हैं। ऐसे लोग तमाम ज्ञान के बावजूद मूढ़ ही होते हैं क्योंकि इन आसुरी गुणों के अधीन कर्म करने वाले अपने सहित किसी का कल्याण नहीं सोच पाते हैं। ऐसे लोगों के जेहन में कभी भी ईश्वरीय अनुभूति के प्रति लगाव पनपता ही नहीं है और वे निरंतर नश्वर, और स्वार्थी हितों में लीन होकर ईश्वर से विमुख ही रहते हैं।

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