श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 14
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ ।।14।।
क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं। ।।14।।
ईश्वर को जानना और खुद के वास्तविक स्वरूप को जानना दोनों एक ही है। जो साक्षात है वह प्रकृति है, जिसके तीन गुण हैं, तमो, रजो और सत्व गुण। यह साक्षात प्रकृति इन्हीं तीन गुणों का प्रदर्शन है। और यही माया भी कहलाती है। इस प्रकृति अथवा माया के साक्षात स्वरूप से परे जो दिखता नहीं है वह चेतना है। जब प्रकृति चेतना से मिलती है तो अनुभव की जा सकती है। और ये दोनों, प्रकृति और चेतना, माया और पुरुष एक ही स्रोत से आते हैं जो इन दोनों से परे है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। सो ईश्वर को जानने के लिए इस पकृति और इसकी चेतना से आगे जाना होता है। जो इस प्रकृति में ही उलझा रह जायेगा वो भला कैसे उद्गम तक पहुंच पायेगा। ये बहुत ही सामान्य समझ की बात है कि यात्रा के छोटे छोटे पड़ाव पर रुककर ही यदि हम अपना समय व्यतीत कर देते हैं तो मंजिल पर कैसे पहुँच पाएंगे। सो जरूरी है कि हम इस यात्रा में ठहर न जायें, बल्कि मंजिल की तरफ अग्रसर हों। मंजिल पहुंचने के लिए ये भी आवश्यक है कि हम यात्रा के हर पड़ाव को पार करें। यानी प्रकृति के तीनों गुणों को एक एक कर पार करें, उनसे आगे बढ़ें क्योंकि इन गुणों से उतपन्न कोई भी भाव या वस्तु हमारी मंजिल नहीं है, हमें उनसे आगे जाकर प्रकृति की चेतना को पाना है और फिर उस चेतना को भी पार कर प्रकृति और चेतना के मूल उद्गम में समाहित हो जाना है। यदि अति सरल ढंग से समझें तो हमको इतना ही ध्यान देना है कि प्रकृति/माया हमारा लक्ष्य नहीं है सो हम इनमें उलझे नहीं बल्कि मूल उद्गम यानी ईश्वर में लीन हों , भले ही शरीर से हम प्रकृति में अवस्थित रहें। लेकिन ये ध्यान रहे कि अंतिम।मंजिल पर पहुंचने के पूर्व यात्रा का प्रत्येक पड़ाव महत्वपूर्ण है। प्रकृति और इसके गुण निरर्थक नहीं है। बिना इन गुणों में क्रमशः आगे बढ़े कोई भी परम की यात्रा नहीं कर सकता है। हमें प्रकृति के गुणों में उत्तरोत्तर बढ़ते हुए ही पहले चेतना और फिर परम् ब्रह्म की यात्रा करनी होती है। सो प्रकृति/माया में उलझे नहीं बल्कि उसे ही सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ पा सकते हैं । लेकिन जो उसमें उलझ जाते हैं वही रुक जाते हैं और प्रकृति की नश्वरता में ही समाप्त होकर रह जाते हैं। उनका उद्धार नहीं हो पाता है।
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