श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 13
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥ ।।13।।
गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता है। ।।13।।
हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं। दर्पण जितना साफ रहता है चेहरा भी उतना ही साफ दिखता है। यदि दर्पण पर धूल आदि जमा हो तो फिर प्रतिबिम्ब धुँधला हो जाता है जबकि चेहरा तो वही रहता है, यानी गंदे दर्पण में बढ़िया बिम्ब की भी खराब आकृति आती है। इसी प्रकार यदि दर्पण के शीशे में कोई दोष हो तो दर्पण साफ रहने के बावजूद एक बढ़िया, सुडौल चेहरे की आकृति विकृत नजर आती है। दोष शीशे में होता है, बिम्ब में नहीं। ठीक यही हालत ईश्वर की समझ के बारे में हमारी होती है। तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुणों से निर्मित प्रकृति में यदि कोई विकृति आती है तो फिर ईश्वर को समझना लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि इन तीन गुणों से निर्मित हमारी बुद्धि ईश्वर कोंसमझ ही नहीं पाती है। ये विकृतियाँ तरह तरह की हो सकती हैं जैसे मोह, लगाव, क्रोध, घृणा, हिंसा, असत, अहंकार आदि।
लेकिन जैसे ही हम अपनी प्रकृति को संस्कृत करते हैं यानी उसे अच्छे गुणों से प्रशिक्षित और परिपूर्ण करते हैं, प्रकृति में आई विकृति दूर होने लगती है और ईश्वर की समझ विकसित होने लगती है। इंसान मूलतः अच्छा होता है,और उसमें ईश्वरत्व की सभी सम्भावनाएँ मौजूद होती हैं, किंतु प्रकृति में आई विकृति उसे दानव बना देती है और प्रकृति में आई संस्कृति उसे ईश्वर बना देती है। अब ये हमारे हाथ में है कि हम किधर जाना चाहते हैं।
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