श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 12

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ ।।12।।

और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं। ।।12।।

हमने देखा जाना है कि प्रकृति के तीन गुण होते हैं, सत्वगुण(पवित्रता, विवेक), रजोगुण (गति) और तमोगुण(जड़त्व) और ये तीनों गुण प्रकृति के सभी दृश्य और अदृश्य रूपों में व्यक्त हैं। किंतु इन गुणों का उद्गम ईश्वर है जिनसे ये तीनों गुण प्रवाहित होते हैं। लेकिन ईश्वर इन गुणों से मुक्त है। अर्थात गुणों का अस्तित्व भले ही ईश्वर पर निर्भर है किंतु ईश्वर के उपस्थिति के लिए ये तीनों गुण महत्वहीन हैं अर्थात ईश्वर तीनों गुणों का उद्गम होने के बावजूद इन तीनों गुणों से मुक्त होता है।

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