श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 10
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ ।।10।।
हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। ।।10।।
सभी जीवों की चेतना का कारण ईश्वर ही हैं सो सभी जीवों की उतपत्ति भी उन्हीं के कारण है। ईश्वर विहीन जीवन जड़ है। जड़ जब चेतन से संयोग करता है तो जीवन का निर्माण होता है। इस प्रकार सभी जीवन का मूल ईश्वर है। ईश्वरीय चेतना के बिना जो जीवन्त है वह जड़ के समान ही है।
जीवन का उद्देश्य बुद्धि की परिपूर्णता से पूरी होता है। बुद्धि तीन प्रकार की होती है। शुद्ध, तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि। शुद्ध बुद्धि पवित्र मूल्यों की बुद्धि है जिसमें सत्य, अहिंसा, धर्म, दया आदि गुणों का महत्व होता है। तीक्ष्ण बुद्धि कुशाग्रता का परिचायक है और सूक्ष्म बुद्धि आध्यत्म की बुद्धि है। जब शुद्ध बुद्धि का प्रदर्शन किसी दबाव में होता है तो वह निरर्थक और समाज के लिए हानिकारक है। तीक्ष्ण बुद्धि को यदि शुद्ध बुद्धि का साथ नहीं मिला तो तीक्ष्ण बुद्धि अति घातक हो जाती है। सूक्ष्म बुद्धि शुद्ध बुद्धि का विस्तार है जिससे व्यक्ति स्वयं की आत्मा से साक्षात्कार के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग पर प्रशस्त होता है।
जो व्यक्ति तेजस्वी है उसका तेज ईश्वरीय होता है। यह तेज उसकी शुद्धता और ईश्वरीय बुद्धि का परिणाम वश होता है और उस तेज में हर अंधकार विलीन हो जाता है।
इस प्रकार ईश्वर का वास व्यक्ति के गुणों में होता है, उसके संस्कारों में होता है न कि किसी स्थान विशेष में। जिस किसी में ये गुण हैं वह ईश्वरीय विभूतियों से युक्त है।
Comments
Post a Comment