श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 1

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ ।।1।।

श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन। ।।1।।

ईश्वरीय विभूतियों की अनुभूतियों की समझ को पाकर ही व्यक्ति उन ऐश्वर्यपूर्ण विभूतियों को अपने जीवन में उतारने का अभ्यास कर ईश्वरत्व की प्राप्ति कर पाता है सो श्रीकृष्ण अर्जुन को उन विभूतियों से अवगत कराने की शुरुआत करने जा रहें हैं। किंतु इस जानकारी को हम आप मात्र पढ़ सुन कर नहीं समझ सकते। इसके लिए जरूरी है कि हम श्रीकृष्ण में अनन्य प्रेम रखें, उनसे अनन्य लगाव रखें, उनमें एकाग्र होकर रहें, उनमें ध्यान पूर्वक रहें। अर्थात जब हम ज्ञान लेने की शुरुआत कर रहें हैं तो फिर दाता के प्रति कोई संशय न रखें, उनमें पूरी श्रद्धा रखें और उनपर पूरा भरोसा रखें, यानी उनसे जुड़कर उनमें एकाकार होकर समझें। 
     व्यस्तुतः सत्य का अन्वेषण का तरीका भी यही है कि हम सत्य के प्रति अटूट लगाव के साथ, उसपर प्रश्नातीत विश्वास के साथ बढ़ें। और प्रेम की भावना भी यही है। प्रेम की सबसे उद्यात स्थिति में प्रेमी अपने आराध्य से विलग नहीं रह जाता है। सत्य का प्रेमी भी तो यही करता है। सत्य से यानी अपने आराध्य से एकाकार हो जाता है, प्रेमी और आराध्य,अन्वेषक और सत्य, भक्त और भगवान अलग अलग कँहा रह जाते हैं। और यही चरम अथवा परम् स्थिति है जब हम पहचानते हैं कि हम भी वही हैं जिसे हम पाने की कोशिश कर रहे थे। उसके विस्तार के ही हम प्रतिरूप हैं।

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