श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 45
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 45
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्॥ 45।।
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है। ।।45।।
जो व्यक्ति निरंतर वैराग्य भाव से अभ्यासरत रहता है एक समय वह मोक्ष को प्राप्त हो ही जाता है। यह प्रक्रिया एक जन्म में भी पूरी हो सकती है अथवा एकाधिक जन्म भी लग सकते हैं क्योंकी अभ्यास और वैराग्य से संचित संस्कार जब तक व्यक्ति को मोक्ष नहीं दिला देते तब तक ठहरते नहीं है। योग का परिणाम निकलना ही होता है, व्यक्ति का दायित्व इतना भर है कि वह योगमार्ग पर दृढ़ता से चलता रहे क्योंकि योगमार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य कभी समाप्त नहीं होता है।
मोक्ष की प्राप्ति जीते जी होतो है, न कि मृत्यु के पश्चात। मोक्ष प्राप्त व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने सेल्फ यानी आत्मा को वास्तविक रूप से प्राप्त कर परम् आत्मा से मिल जाता है और तब उसके कर्म मात्र और मात्र दूसरों के कल्याणार्थ रह जाते हैं।
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