श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 44
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ 44।।
श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है। ।।44।।
जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है जब जीव जन्म और मरण के चक्र से मुक्त होकर अनंत सम्पूर्णता में मिल जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति योग के अंतिम परिणाम के रूप में आती है। किंतु जब योग के मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति अभ्यास करता हुआ बिना वैराग्य प्राप्त किये मृत्यु को प्राप्त हो गया होता है तो वह पुनः एक सम्पन्न परिवार में जन्म लेता है। इस जन्म में उसके पूर्व के संचित अभ्यास के फल उसे शीघ्र ही वैराग्य के मार्ग पर ले चलते हैं। उसके अंदर ज्ञान की जिज्ञासा उतपन्न हो उठती है और इस जिज्ञासा को शांत करने हेतु अभ्यास रत वह व्यक्ति वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर हो कर मोक्ष की दिशा में बढ़ता है। उसकी अधूरी कामनाओं के परिणाम में उसे ऐश्वर्य भी मिलता है लेकिन जल्द ही वह संचित अभ्यास के कारण जिज्ञासा वश ज्ञान प्राप्ति हेतु वैराग्य के पथ पर अग्रसर हो जाता है।
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