श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 24, 25
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 24, 25
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर ।।24।।
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। ।।25।।
ध्यान के द्वारा व्यक्ति अपने सेल्फ/आत्मा को प्राप्त कर पाता है। किंतु ध्यान की इस अवस्था को पाने के लिए ये आवश्यक है कि
1.व्यक्ति अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करे
2.उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में हों
3.मन को और शांत करे, और ऐसा धैर्य से करे, बुद्धि और विवेक से करे,
4.ध्यान में सिर्फ अपनी आत्मा हो, अपना सेल्फ हो, और कुछ भी न हो।
यह प्रक्रिया धीरे धीरे होती है और बारम्बार अभ्यास से होती है। ध्यान की यह अवस्था उपासना से भिन्न होती है, पूर्णतः वर्तमान में टिकी होती है, किसी का कोई स्वरूप, कोई शब्द, कोई कामना, कोई स्वर, कोई अनुभूति नहीं होती है मन में, मन पूरी तरह से अपने प्रति सजग, अपने में , अपनी वर्तमान अवस्था(यानी ध्यान की अवस्था के प्रति ) पूरी तरह से जागरूक होता है। अपनी साँसों पर टिके रहें, उनकी गति में अपनी गति मिलाए रखें, और सजग रहें कि सजगता के साथ आप अपनी आत्मा से जुड़ रहें हैं।
यह क्षमता एक दिन में नहीं आती है सो अधीर न हो, रोज के अभ्यास से ये सम्भव हो पाता है । आप सभी कामनाओं का त्याग कर, इंद्रियों को अपने मन और बुद्धि के अधीन कर अपने, भूत, वर्तमान, अतीत से मुक्त होकर, अपनी आत्मा को पाते हैं और इसके लिए निरन्तर अभ्यास की जरूरत होती है, धैर्य की जरूरत होती है।
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