श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए। ।।14।।
जब हम ध्यान करते हैं तो उस समय मन एकदम शांत अवस्था में हो। ये कैसे सम्भव है? इसके लिए हमें भूत, भविष्य और वर्तमान से अपने मन को अलग करना होता है। यह तभी सम्भव है जब हमें हमारी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण हो और हमारी इन्द्रियाँ हमारे निर्देशों को मानकर भूत की स्मृतियों , भविष्य की आकांक्षाओं और वर्तमान के उत्प्रेरकों से मुक्त हो। जब इस तरह मन भूत, भविष्य और वर्तमान से मुक्त हो जाता है तो मन शांत होता है। यह शांति ध्यान की अनिवार्य शर्त होती है। कोई बाहरी संकल्प मन में प्रवेश नहीं करता, अंदर कोई संकल्प नहीं उठता।
इस तरह से शांत मन भय रहित हो ,ये भी अनिवार्य है। भय हमारे ईगो का, हमारे छद्म पहचान का अविभाज्य अंग होता है। जब हम खुद को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं तो उसके साथ कई अपेक्षाएँ जुड़ जाती हैं जिनके खोने का भय हमेशा बना रहता है। यह भय मन को अशांत करते रहता है। तो इससे कैसे निजात पाएं? तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने ईगो से मुक्त हों। ईगो की समाप्ति से ही भय खत्म होता है। कोई अन्य रास्ता नहीं है भय को मारने का। ये भय अस्तित्व पर संकट की आशंका है, सो अस्तित्व से मुक्ति ही भय से मुक्ति का मार्ग है। कल कोई महत्वपूर्ण घटना आपके साथ होने वाली है तो आप बराबर उसी कि अपेक्षा और आशंका में डूबते उतराते रह जाते हैं, या कुछ हो चुका है तो आप उससे भि उत्साहित या आशंकित होते रहते हैं। बस तब आप वर्तमान में इन सब से आतंकित होकर जीते हैं, शांत नहीं होते । सो ईगो से मुक्ति ही भय से मुक्ति दिलाता है। भय क्यों होता है?भय द्वैत(duality) के कारण होता है। जब हमारा ईगो हमारे सेल्फ से भिन्न होता है तो खोने का भय होता है लेकिन जब ईगो नष्ट हो जाता है तो मात्र सेल्फ बचत है जो अपरिवर्तनीय और नाश रहित है। ईगो का सम्बंध हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य कि कामनाओं और आकांक्षाओं से होता है। इन कामनाओं को वश में करें, कामनाओं के स्रोत इंद्रियों को वश में करें तो ईगो को जीवन मिलना बंद हो जाता है और द्वैत से मुक्ति मिलने लगती है और हम ईगो से धीरे धीरे मुक्त होकर सेल्फ में ही घुलने मिलने लगते हैं । तब भय भी समाप्त हो जाता है। यह ध्यान के लिए अनिवार्य शर्त है।
इसके अलावे हमें ब्रह्मचारी होना चाहिए तभी हम ध्यान कर सकते हैं। ब्रह्मचारी का लोकप्रिय अर्थ लोग सेक्स से मुक्ति का लगाते हैं, वासनाओं से दूरी, स्त्री से दूरी को ब्रह्मचारी पथ मानते हैं। परंतु ब्रह्मचारी का अर्थ है ब्रह्म के मार्ग पर चलना जिससे अंतिम सत्य यानी ब्रह्म की प्राप्ति हो। इसका सम्बन्ध हमारे समग्र आचरण से है न कि मात्र सेक्स या वासना से। जब हम ये तय करते हैं कि हमको परम् सत्य को प्राप्त करना है तो हम उस मार्ग पर चलते हैं। यदि ये व्रत न लें, ये निश्चय न करें तो फिर सेक्स, और वासना से दूर हैं कि नजदीक कोई अर्थ नहीं रखता।
इस तरह से शांत मन से हमें अपनी आत्मा में, अपने सेल्फ में लीन होना ही ध्यान है। आत्मा ही कॉन्सियसनेस्स है। जब हम सिर्फ अपने प्रति जागरूक होते हैं तो हम जीव के प्रति कॉन्सियसनेस्स रखते हैं लेकिन जैसे ही ये समझते हैं कि आत्मा या सेल्फ समस्त से जुड़ा हुआ है यह कॉन्सिउओसनेस ही ईश्वर हो जाता है, जीव से ईश्वर की यह यात्रा conciousness की यात्रा होती है। किंतु यदि इसे समझने में दिक्कत है तो आप परम् पिता परमेश्वर में लीन हों, आपको धीरे धीरे अपनी आत्मा का बोध होने लगता है। जब तक हम अपने प्रति जागरूक होते हैं तब तक इसका भान नहीं होता है लेकिन जैसे जैसे हम अपने दायरे से बाहर निकल कर ये समझने लगते हैं कि यही आत्मा, यही सेल्फ सभी में समान है हम जीव से ईश्वर की तरफ प्रस्थान करने लगते हैं। इसी ईश्वर , इसी व्यापक, इसी आत्मा में लीन होकर इसी को लक्ष्य बनाकर ध्यान करें तो ध्यान सम्भव बन पड़ता है।
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