श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 9

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ 9।।

सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है। ।।9।।

इस प्रकार हमने देखा है कि जो योगी है वह आत्मा अथवा सेल्फ की सभी में समानता जानकर समत्व में स्थित होता है। किंतु ये भी सत्य है कि संसार में एक व्यक्ति के बहुत तरह के सम्पर्क भी होते हैं , जिनमें से कोई मित्र, कोई शत्रु, कोई उदासीन, कोई बीच बचाव करने वाला,  कोई सम्बन्धी, कोई अनिष्ट चाहने वाला तो कोई भला चाहने वाला भी होता है। कोई दूसरा व्यक्ति अत्यंत उच्च कोटि का हो सकता है तो कोई दुष्ट और पापी भी। हमें इस संसार में इन सभी से मिलना जुलना और व्यवहार करना होता है। तो भिन्न व्यक्तियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
       एक सामान्य व्यक्ति जिसे कर्मयोग का ज्ञान नहीं होता है, जिसे योग का अभ्यास नहीं होता है वह व्यक्ति इन भिन्न भिन्न सम्बंधों के साथ अपनी पसंद और नापसन्द के अनुसार ही व्यवहार करता है क्योंकि वह इन सभी को भिन्न भिन्न  मानता है। उसे मित्र से प्रेम और शत्रु से घृणा होती है, उसके व्यवहार में अहंकार निर्देशक होता है। लेकिन जो व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता हुआ योग युक्त हुआ है उसे इस बात की समझ होती है कि ये भिन्न भिन्न व्यक्तियो में मूल रूप में आपस में  कोई असमानता नहीं है बल्कि वे सभी भी उसी सम्पूर्ण सेल्फ के अंश हैं जिसका अंश वो खुद है। सो इस स्थिति में योगयुक्त व्यक्ति ऐसे मित्र और शत्रु आदि से अपने संव्यवहार में किसी पसन्द अथवा नापसन्द से नियंत्रित नहीं होता है बल्कि उन सभी से सांसारिक रिश्ते के अनुसार व्यवहार करता हुआ भी उनसे प्रेम या द्वेष नहीं करता है, उनसे अहंकार नहीं पालता है, उनसे क्रोध या ईर्ष्या नहीं करता है बल्कि उनको भी अपने ही सेल्फ का विस्तार मानकर  उनसे सत्य आधारित व्यवहार करता है जैसे यदि सामने वाला शत्रु है तो फिर वह भी शत्रुवत तो उससे व्यवहार करता है किंतु वह उस शत्रु विशेष के प्रति कोई अनादर नहीं रखता है। राम रावण में बड़ी भारी शत्रुता प्रतीत होता है। लेकिन फर्क है राम और रावण में। रावण को राम से द्वेष था किंतु राम ने रावण से कोई शत्रुता नहीं रखी थी बल्कि उनका संघर्ष रावण की बुराई से था। जो योगी है उसका भी चरित्र ऐसा ही होता है , वह व्यक्ति विशेष से प्रेम या द्वेष नहीं रखता है बल्कि उसके गुणों के अनुसार उससे व्यवहार बरतता है।

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