श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 8


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 8

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥ ।।8।।

जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है। ।।8।

श्रीकृष्ण ने पूर्व में भी ज्ञान प्राप्त स्थित प्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बता चुके हैं, विशेषकर द्वितीय अध्याय में। एक बार फिर हमारी नासमझी को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसी बात को दूसरे ढंग से कहा है। योगयुक्त व्यक्ति कौन होता है, योगी कौन है, ये प्रश्न तो बार बार मन में आता ही है न। 
          तो हम देखते हैं कि योगारूढ़ व्यक्ति की निम्न विशेषताएँ होती हैं।
1. यह व्यक्ति ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण उन्हीं में और उन्हीं से संतुष्ट हुआ रहता है। यँहा ज्ञान का अर्थ सांसारिक और भौतिक ज्ञान से नहीं है। संसार में रहने के लिए सांसारिक और भौतिक ज्ञान तो जरूरी है ही लेकिन इस जीवन को अर्थपूर्ण ढंग से जीने के लिए इंसांन को आत्मिक ज्ञान की जरूरत होती है। हम सांसारिक और भौतिक ज्ञान में पारंगत हो सकते हैं लेकिन इसके बावजूद हम एक इंसान भी अच्छे हों ये कतई जरूरी नहीं है।  इसके लिए तो हमें आत्मिक ज्ञान की शरण में ही जाना होता है। इसके बिना तो हम भौतिक ज्ञान का भी सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। 
       सो यँहा ज्ञान का अर्थ विवेक, मन और शरीर से परे आत्मा यानी अपने कॉन्सियसनेस को समझने जानने से है। हम यह आत्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं अपनी बुद्धि, म और शरीर का उपयोग कर्मयोग के अनुसार उपयोग कर के । हम समझ पाते हैं कि हम मात्र शरीर विशेष ही नहीं हैं। ये तो हमारा बाहरी आवरण भर है। शरीर से परे मन है, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा और ये आत्मा अथवा कॉन्सियसनेस्स अथवा सेल्फ सभी में एक ही है यानी हम सभी एक ही कॉन्सियसनेस्स हैं जो विस्तारित सत्य अथवा कॉन्सियसनेस का ही अंश है, सो सभी समान हैं चाहे रूप, स्वरूप, नाम भिन्न हों। जब समझ से आगे इस ज्ञान की अनुभूति प्रत्यक्ष होने लगती है तो यही आत्मा का ज्ञान हमारा विज्ञान हो जाता है। योगी व्यक्ति इसी ज्ञान -विज्ञान का ज्ञाता होता है और इसी में स्वयं को स्थिर भी रखता है।

2.योगी का खुद की इंद्रियों पर पूर्ण अधिपत्य होता है, उसके सेंस उसकी अनुमति के कुछ नहीं करते हैं।  इस तरह से योगी के सारे कर्म उसके अधीन ही सम्पादित होते हैं। यह व्यक्ति बाहरी तत्वों से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ उन बाहरी कारकों से नहीं बल्कि योगयुक्त व्यक्ति के अनुसार ही क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं। ऐसा होने से व्यक्ति सम और शांत होता है, उसके अंदर कोई भी अकुलाहट, उत्तेजना, कामना, क्रोध, लोभ , इक्षा, ईर्ष्या, मान, अपमान, आश्चर्य आदि नहीं होता है बल्कि वह तो प्रत्येक कारक एक भाव से देखता है।

3.आत्मज्ञान में स्थित जितेंद्रिय योगी के लिए संसार में कुछ भी भेद करने लायक नहीं होता है।  हमें सोना महँगा और कीचड़ सस्ती लगती है। क्यों? क्योंकि हमने अपनी कल्पना की दुनिया से कुछ चीजों और भावों को अधिक मूल्यवान और कुछ को कम मूल्यवान बना कर रखा है। ये सब हमारी इंद्रियों की परख है जो हमारी कामनाओं और इक्षाओं से नियमत्रित होती हैं। जब तक हम इनके प्रभाव में रहते हैं इनके अनुसार ही चीजों को और मूल्यों को देखते समझते हैं। ये समझ बाहरी संसार के प्रति हमारी इंद्रियों को प्रतिक्रिया मात्र हैं, विवेक का इनसे कोई लेना देना नहीं हैं। लेकिन जब व्यक्ति को आत्मा की समझ हो जाती है, उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष होने लगती है, इंद्रियों पर नियंत्रण हो जाता है तो व्यक्तो सम अवस्था में आ जाता है। तब उसे सभी कुछ एक समान और अपने समान ही प्रतीत होता है।
    इन तीनों अवस्था को प्राप्त व्यक्ति ही योगी है और यह योगी उसी परम् का अंश है , जिसके अंश हम सभी हैं। यदि हम भी इस तथ्य को समझ कर , क्रिया के स्तर पर आत्मसात कर अपना लें तो हम भी वही योगी हैं जो परम् है।

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