श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 7

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ ।।7।।

सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं है। ।।7।।

जब व्यक्ति कर्मयोग का साधन अपनाए जीवन पथ पर चलता है तब उसके मन से कर्म और कर्मफल के प्रति अनुराग और लिप्सा समाप्त हो जाती है, । ऐसा तब ही हो सकता है जब हमारी वाह्य वृत्तियाँ पूर्णतः हमारे नियंत्रण में हों। ये वाह्य वृत्तियाँ क्या हैं? ये हमारी इंद्रियों की चेष्टाएँ हैं जो हमें बाहरी संसार की तरफ खींचती हैं, उनमें रमने के लिए उकसाती हैं। इस अवस्था में हमारे अंदर दैवी गुणों का अभाव होता है और आसुरी गुणों की बहुलता होती जाती है। हमारे कर्म इंद्रियों से निर्धारित होने लगते है क्योंकि इन्द्रियाँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम ये समझें कि हमारे सुख इंद्रियों के सुख को भोगने में हैं। किंतु इस स्थिति में में मन इंद्रियों से नियंत्रित होकर भटकता है , इधर उधर भागता है जिसका नतीजा निकलता है कि हमें शांति नहीं मिलती है और हम खुद के स्वरूप यानी अपने सेल्फ /अपनी आत्मा पर केंद्रित नहीं होते हैं।
     किंतु इसके विपरीत जब हम कर्मयोग का आचरण करते हैं , योग में प्रवृत्त होते हैं तो हमारा मन, इन्द्रिय और शरीर हमारे विवेक के अधीन होते हैं। मन, इन्द्रिय और शरीर पर बलात नियंत्रण नहीं हो सकता है क्योंकि वह नियंत्रण इन्द्रिय के सुखों के साधन पा कर खत्म हो जाता है, लेकिन यदि विवेक का नियंत्रण इन्द्रिय पर हो तो इन्द्रियाँ बाह्य संसार यानी कर्म और कर्म फल से उत्तेजित नहीं होती हैं और मन चंचल होकर भटकता नहीं है। तब हमारे अंदर दैवी गुणों की बहुलता होती है और ये अवस्था हमें अनायास ही नहीं मिलती है बल्कि इसके लिए प्रयास करना होता है, खुद को अंदर से जागृत रखना होता है, समझना होता है कि हमें फल में नहीं अनुरक्त होना चाहिए। जब कामना, लगाव, मोह, और माया का नाश कर पाने हम सक्षम हो पाते हैं तब हम स्वयं के साथ मित्रता निभा पाते हैं क्योंकि तब हमारे अंदर से आसुरी वृत्तियाँ यथा कामना और  मोह जनित सुख, दुख, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध आदि का नाश हो पाता है, हमारे अंदर से मान और अपमान की छद्म प्रवृत्तियों का विनाश हो पाता है और हम तब वास्तविक रूप से स्वतंत्र हो पाते हैं। सामान्य तौर पर हम अपनी इंद्रियों यानी अपने सेंस के अधीन होते हैं और वही स्थिति में स्वाभाविक लगती है जो हमारा भ्रम है। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। आप एक गाय को रस्सी से बाँधें कँही ले जा रहें हैं कि सहसा रस्सी छूट या टूट जाती है। अब आप देखिए कि आप क्या कर रहें हैं और गाय क्या कर रही है। गाय इधर उधर भागने लगती है और आप उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे भागते हैं। गाय आपके पीछे नहीं भाग रही है बल्कि आप उसके पीछे भाग रहें हैं। अब सोचिए कि कौन किसके अधीन है। इसी प्रकार जब तक मन में लगाव और कामनाएँ हैं हम कामनाओं के पीछे भाग रहें होते हैं , हम बेचैन हुए रहते हैं सो जब हम खुद को अपने मन से कामनाओं की अधीनता से आजाद कर लेते हैं तो हम शांत चित्त हो पाते हैं जो योग की अवस्था में ले जाता हमको। इस समय हम समझ पाने की स्थिति में होते है कि हमारे अंदर जो सेल्फ है, आत्मा है वही तो दूसरे में भी है, हम तो वृहत्तर अस्तित्व के एक अंश हैं, ठीक वैसे ही जैसे अन्य हैं और तब हम परम् का सामीप्य महसूस कर पाने की स्थिति में होते हैं। हमारे मन से , हमारी कामना से, हमारी चेष्टाओं से अन्य सभी चीज लुप्त हो जाते हैं और हम खुद को वृहत्तर अस्तित्व में स्थित हुआ पाते है।

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