श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 23
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 23
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है। ।।23।।
जब व्यक्ति ऊपर वर्णित तरीके से ध्यान करता है तो वह अपने भ्रम से मुक्त होते जाता है। अभ्यास से व्यक्ति अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े उस आवरण को हटा पाने में सक्षम हो पाता है जिस आवरण के कारण वह स्वयं से बाहर के सुख-दुख और कामनाओं के संसार को ही अपना वास्तविक संसार समझने की भूल करते रहता है और इन्द्रिय और इन्द्रिय जनित सुख और दुख, कामनाओं में लीन होता है, उसी में अपनी बुद्धि, अपना विवेक और अपने शरीर को लगाए रखता है। इस भ्रम से मुक्ति ही योग है और योग की इस अवस्था में व्यक्ति द्वारा अपना परिचय अपने सेल्फ में , अपनी आत्मा में मिलता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह बिना अधीर हुए, बिना अकुताये, अभ्यास पूर्वक अपने भ्रम को काट कर अपनी आत्मा को प्राप्त करे यानी योग को प्राप्त करे।
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