श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 22
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 22
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ 22।।
परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता। ।।22।।
आत्मा में लीन, अपने सेल्फ को पहचानने वाले ध्यान योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार से बड़ा कोई सत्य नहीं रह जाता क्योंकि यही व्यक्ति जिसे अपने सेल्फ का ज्ञान हो चुका है वही आत्मा और परमात्मा को समझ जान पाता है। ध्यान रहे हम किसी चीज को उतना ही समझ पाते हैं जितना हम अपने सेल्फ को समझ पाते हैं। तथ्य/वस्तु की समझ सिर्फ उस तथ्य या वस्तु पर निर्भर नहीं करती बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारा ज्ञान कितना है। अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारी समझ के स्तर से ही निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि में जो है, उसे हम कितना समझ पाते हैं। संसार में इक्षाओं की कमी नहीं होती है। हम एक इक्षा की पूर्ति करने में लगे होते हैं कि उसी रास्ते में और नई इक्षाएँ पाल लेते हैं। नतीजा होता है कि हम निरन्तर व्याकुल होते हैं। लेकिन जब हमें अपने सेल्फ का ज्ञान होता है तो हमारी इक्षाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। ध्यान रहे कि इसका तात्पर्य निष्क्रियता से नहीं है। आत्मज्ञान युक्त व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है। वह विचारों और कर्मों से निरन्तर चलायमान तो होता है किंतु उसकी गति कामनाओं के वश में नहीं होती है। इसी कारण इस तरह से ज्ञान अर्जित ध्यानमग्न व्यक्ति संसार की गतिविधियों से ,संसार द्वारा, संसार द्वारा उतपन्न भारी से भारी दुखों से भी अछूता ही होता है।
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