श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 20
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। ।।20।।
ध्यान और योग की प्रक्रिया मात्र इनके सम्बन्ध में सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त कर लेने से पूरी नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि कामनाओं के त्याग और इंद्रियों के वश में रहने से ही हमारा ध्यान अपनी आत्मा, अपने स्व पर टिक पाता है और यही परम् सुख की अवस्था दिला पाता है लेकिन इस जानकारी के बावजूद हम अंतिम सत्य यानी परम् सुख को छोड़कर खुद के बाहर अवस्थित वस्तुओं और कारणों कों ढूँढते रहते हैं और कभी सन्तुष्ट और खुश नहीं हो पाते हैं चिर काल तक के लिए। तो फिर उपाय क्या है। उपाय है इस सैद्धान्तिक ज्ञान के अनुरुप आचरण और इस आचरण का अनवरत लम्बे समय तक अभ्यास करना। ज्ञान के निरन्तर प्रायोगिक अभ्यास से ही यह ज्ञान आत्मसात हो पाता है और हम खुद को कामनाओं और अपनी इंद्रियों के लालच के प्रभाव से मुक्त कर अपनी आत्मा पर खुद को एकाग्र कर पाते हैं जिससे हमें अनंत काल तक का सुख मिल पाता है। आत्मा को, अपने सेल्फ को इस परम् सुख की प्राप्ति अपनी आत्मा में लीन होने से ही मिलता है लेकिन इस सुख की अनुभूति के लिए आवश्यक है कि हम कामनाओं और इंद्रियों की चेष्टाओं को त्याग कर स्वयम को अपनी आत्मा में ही केंद्रित करने का निरन्तर अभ्यास करें, बिना इस अभ्यास के हम कभी चिर सुखी हो ही नहीं सकते।
Comments
Post a Comment