श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 19

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है। ।।19।।

             जब व्यक्ति ध्यानयोग की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि उसका सारा ध्यान अपनी आत्मा यानी अपने सेल्फ पर लगा होता है उस समय होता क्या है, इसे समझना आवश्यक है। आत्म में ध्यानरत योगी की समस्त बाहरी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं और उसकी इन्द्रियाँ सम्पूर्ण रूप से उनके वश में हुई निश्चेष्ट हुई होती हैं। ऐसी अवस्था में योगी मन की समस्त इक्षाओं से मुक्त हुआ रहता है, उसकी कोई कामना शेष नहीं होती है। मन हमेशा कामनाओं की पूर्ति के लिए ही भटकता है और जब जब उसकी कोई कामना पूरी होती है उसे प्रसन्नता का अनुभव होता है। लेकिन ध्यानरत योगी की तो कोई कामना शेष ही नहीं रह गई है तो उसका मन चिर प्रसन्न्ता में डूबा हुआ होता है। आत्मा -परमात्मा में लीन योगी को इंद्रियों से कोई सुख चाहिए ही नहीं, उसकी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं सो उसे परम् शांति परम् सुख मिल चुका होता है, सो उसका मन कँही भटकता नहीं बल्कि एक सीध में एकाग्र हुआ होता है, इधर उधर भटकता नहीं है। मन तो उसका भटकता है जिसका ध्यान अपनी आत्मा और परमात्मा पर नहीं टिका होता है बल्कि कामनाओं की पूर्ति के लिए मारे मारे फिरता है।

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