श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 18

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है। ।।18।।

(10)योग अवस्था

ध्यान योग की विधि को अपना कर व्यक्ति योगयुक्त हो जाता है।  इस अवस्था में व्यक्ति का मन उसके पूर्ण नियंत्रण में होता है, इधर उधर भटकते नहीं रहता है। इन्द्रियाँ पूर्ण वश में होती हैं जिस कारण मन का भटकाव बंद हो जाता है और मन पूर्णतः अपनी ही आत्मा में लीन होता  है। कोई अन्य भाव में में नहीं रह जाता है। अन्य सभी जुड़ाव से मन मुक्त रहता है, कोई अन्य आकर्षण नहीं रह जाता है। व्यक्ति स्वयं की आत्मा में ही अवस्थित हो जाता है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति इंद्रियों की गतिविधियों से मुक्त, शांत मन से आत्मा/सेल्फ में ही विलीन हो चुका होता है। कोई अन्य इक्षा, भाव, कामना नहीं रह जाती, बस व्यक्ति खुद की सत्यता में विलीन हो जाता है।

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