श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 17

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।17।।

(9) आहार -विहार

सफलता पूर्वक ध्यान योग में प्रवृत्त होने हेतु आवश्यक है कि व्यक्ति का शरीर और मन स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे और इसके लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति युक्तायुक्त संयमित जीवन जिये, निम्न चीजें शामिल हों उसके जीवन में
1.संयमित और आवश्यक मात्रा में भोजन करे,
2.उसके जीवन में विहार यानी मनोरंजन का संयमित समावेश हो,
3.वह नियमित संयमित ढंग से कर्म करे, तथा
4.बहुत अधिक या बहुत कम न सोये।
        ये क्रियाएँ व्यक्ति विशेष की शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए, सभी के लिए एक तरह की मात्रा का निर्धारण नहीं हो सकता है, लेकिन खान-पान, नींद, मनोरंजन और कर्मों में व्यक्ति की अपनी निजी क्षमता के अनुसार एक संयमित अनुशासन का होना अनिवार्य है, तभी व्यक्ति बाहरी विचलनों से मुक्त होकर ध्यान योग में प्रवृत्त हो सकता है।

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