श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 16

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।16।।
(9) आहार विहार
    ध्यान योग के लिए आवश्यक है कि योगी अपने शरीर और मन से मुक्त रहे , उसे अपने शरीर और मन के स्तर पर किसी विचलन का सामना नहीं करना पड़े। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति जो ध्यान योग में लगना चाहता है न तो ज्यादा खाये न कम ही, न ज्यादा सोये , न  कम ही क्योंकि ये दोनों अति की अवस्थाएँ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर उसकी एकाग्रता को भंग कर ध्यान से विचलित कर देती हैं।

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