श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 15
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 15
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है। ।।15।।
(8)मोक्ष की प्राप्ति
जब व्यक्ति ध्यान (मैडिटेशन) की ऊपर वर्णित विधि को अपना कर ध्यान करता है तब वह जिस अवस्था में होता है उस अवस्था में वह अपने सेल्फ/आत्मा के सम्बंध में सोचता(थिंकिंग) नहीं है बल्कि उस आत्मा अथवा सेल्फ के प्रति उसका एकाग्र ध्यान(अटेंशन) लगा होता है। किसी चीज के सम्बन्ध में एकटक होकर सोचना और उस चीज पर एकटक होकर ध्यान लगाना दोनों दो भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। सोचने की अवस्था में व्यक्ति की इन्द्रियाँ जागृत हो कर उसके मन को भटकाने लगती हैं भले व्यक्ति बाहर से शांत दिखता हो, किंतु एकाग्र ध्यान की अवस्था में व्यक्ति उस चीज से अलग किसी भी अन्य के प्रति जागरूक नहीं रह जाता है और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उसी एक में विलीन होने लगता है। किसी चीज के अस्तित्व के सम्बंध में सोचना और उसी चीज के प्रति बिना सोचते हुए मात्र जागरूक (अवेयर) होना ,दो भिन्न अवस्था हैं और ध्यान की अवस्था में मात्र अवेर्नेस यानी उस चीज के प्रति मात्र जागरूकता रह जाती है। मन और इन्द्रियाँ इस अवस्था में एकदम निष्क्रिय हो जाते हैं। इस अवस्था में ही व्यक्ति अपनी आत्मा को महसूस कर पाता है। तब व्यक्ति सारे बन्धनों से मुक्त होकर एकदम शांत हो जाता है, परम् शांति को प्राप्त करता है और इसी शांति की प्राप्ति को परमात्मा की प्राप्ति कहा जाता है और सभी द्वैत (दुआलिटी) समाप्त हो जाता है। यही कैवल्य या मोक्ष की अवस्था होती है जब जीव अपना अस्तित्व भूलकर अपनी ही आत्मा में विलीन हो जाता है और परम् शांति को प्राप्त करता है बिना किसी अन्य विचलन के।
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