श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 12
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 12
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥12।।
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे। ।।12।।
(4) मन, इन्द्रिय, चित्त की एकाग्रता
उचित आसन पर स्थिर होकर बैठकरयोगी को योग्याभ्यास करना चाहिए। आसन पर स्थिर होने के उपरांत
*इंद्रियों की सारी संवेदनाओं और सूचनाओं के प्रवाह को रोक देना है ताकि इन्द्रियाँ बाहरी संसार की अनुभूतियों को अंदर न आने दें।
*मन को निरुद्ध कर लेना है ताकि मन के अंदर से कोई प्रवाह न उठे।
*चित्त स्थिर हो अर्थात न कोई स्मरण हवन ही कोई भविष्य की योजना हो।
*इस प्रकार सभी वाह्य और अंदुरुनी संकल्पों से मन, बुद्धि, चित्त, और इंद्रियों को मुक्त कर मात्र श्वास की गति पर ध्यान केंद्रित करें।
(5)अभ्यास
इस अवस्था मेंआने के बाद व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं की आत्मा यानी सेल्फ पर ध्यान केंद्रित करें। यँहा दो मानसिक क्रियाओं का अंतर समझना जरूरी है। जब जब हम किसी चीज के बारे में ध्यान केंद्रित करते हैं तो उसके बारे में ध्यान पूर्वक सोचते हैं। यह अवस्था एकाग्रता की नहीं होती क्योंकिं तब हमारा ध्यान उस चीज के बारे में तरह तरह के ज्ञान और कल्पनाओं के सम्बंध में सोचता है। लेकिन यदि हम किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो उस चीज के प्रति जागरूक होते हैं और उसी पर टिके होते हैं , उस चीज के बारे में मन के अंदर कोई उथल पुथल नहीं होता बल्कि ध्यान एकाग्र होकर उसीपर लगा होता है। हमें अपनी आत्मा यानी सेल्फ पर इसी दूसरे भाव से एकाग्र होकर रहना होता है।
इस अवस्था में हमारा ध्यान निरन्तर अपनी आत्मा के बारे में जागरूक होकर उसी पर केंद्रित रहे। आत्मा यानी सेल्फ पर निरन्तर एकाग्र होने का परिणाम होता है कि हमारा अस्तित्व हमारे सेल्फ में विलीन होने लगता है। ध्यान अथवा मैडिटेशन की यही तो प्रक्रिया होती है जब व्यक्ति का अस्तित्व उसके सेल्फ में लीन हो जाता है।
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