श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 11

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥ 11 ।।

शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके। ।।11।।

(2)स्वक्ष एवं पवित्र स्थल
जब हम ध्यान प्रारम्भ करते हैं तो हमें ध्यान के लिए ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जँहा का वातावरण साफ सुथरा हो, जँहा भूमि गन्दी न हो, और जँहा बैठने में मन को अच्छा लगे, कोई कोलाहल न हो, और बाहरी वातावरण से मन और शरीर का विचलन न होता हो।

(3)आसन
ध्यान के लिए स्थल चयन के उपरांत आसन का चयन भी एक महत्वपूर्ण अंग है। आसन की तीन निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए
    *आसन ऊष्मा का कुचालक हो ताकि शरीर से पृथ्वी की गर्मी या नमी न मिले जिससे ध्यान में व्यवधान पड़ सकता है।
     * आसन न तो बहुत मुलायम हो और न ही बहुत कठोर।
     *आसन की ऊँचाई इतनी ही हो कि बैठने में कष्ट या असुविधा न हो।
        बैठने के तरीके को भी आसन कहते हैं। हमारे बैठने का आसन ऐसा होना चाहिए कि हमें कोई शारीरिक असुविधा न हो और हमारा ध्यान भटके नहीं ताकि हम शरीर से स्वतंत्र होकर ध्यान कर सकें।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय