ध्यान की विधि: श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 26

ध्यान की विधि: श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ 10।।

मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए। ।।10।।

योगयुक्त कौन है ये तो हमने अबतक समझा है। व्यक्ति और समाज के उत्थान का मार्ग कर्मयोग के अनुपालन से शुरू होता है। फिर ज्ञान की प्राप्ति होती है और तब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर पाता है। जो व्यक्ति बिना इस क्रमिक यात्रा के ध्यान यानी मैडिटेशन करने का प्रयास करता है वह वास्तव में मैडिटेशन या ध्यान नहीं कर रहा होता है बल्कि वह एकाग्र होने का अभ्यास कर रहा हो सकता है या फिर उपासना कर रहा होता है।
    ध्यान की विधि तो वही शुरू कर सकता है जो कर्मयोग और ज्ञान योग की यात्रा पूरी कर चुका होता है। अब देखिए कि ध्यान किया कैसे जाता है। इसे हम क्रमवार समझते हैं।
(1) एकांत स्थल और शांत मन
(I) योगयुक्त व्यक्ति को एकांत स्थल का चुनाव करना चाहिए। यह स्थल।ऐसा हो कि योगी के ध्यान को भटकाने वाला कोई भी कारक मौजूद नहीं हो। योगी को बाहरी किसी कारक से व्यवधान नहीं हो , स्थल ऐसा होना चाहिए।
(ii) मन, इन्द्रियाँ और शरीर पर नियंत्रण होना अनिवार्य है अर्थात मन और इन्द्रियाँ निश्चेष्ट होने चाहिए जिससे भी निश्चेष्ट बना रहेगा। मन में कोई भाव न हो , इन्द्रियाँ कोई क्रिया न करें और शरीर एकदम गतिहीन हो। 
(iii) योगी के मन में न उसका अतीत हो , न भविष्य हो। भविष्य आशा का संचार करता है तो अतीत संस्मरणों की पोटली खोलता है। योगी जो ध्यान में प्रवृत्त होने जा रहा है उसका सारा ध्यान वर्तमान अवस्था पर होना चाहिए।  ये तभी सम्भव है जब इन्द्रियाँ और मन कुछ नहीं कर रहें हों।
(iv) योगी को ध्यान का अभ्यास नितांत अकेले होकर करना होता है, न कि किसी समूह में। ध्यान की क्रिया एक नितांत व्यक्तिगत अभ्यास की क्रिया है।
(v) योगी का ध्यान अवनी आत्मा पर हो, अपने सेल्फ पर हो। किसी भी अन्य की कल्पना, किसी भी अन्य का ध्यान योग की ध्यानावस्था नहीं है। जैसे ही योगी स्वयम के सेल्फ से अलग होकर किसी अन्य सत्ता का ध्यान करता है वह उपासना की अवस्था में चला जाता है। उसी प्रकार यदि किसी चीज पर केंद्रित होता है वह एकाग्रता का अभ्यास करने लगता है। उपासना और एकाग्रता अनुकरणीय तो हैं किंतु वे ध्यान की अवस्था नहीं हैं। योगी को मन, इन्द्रिय, शरीर, अतीत, और भविष्य से विलग होकर सिर्फ वर्तमान में अपने सेल्फ, अपनी आत्मा, अपने कॉन्सियसनेस पर टिकना होता है।
         इस तरह से कर्मयोग और ज्ञानयोग से परिपूर्ण योगी ध्यान की शुरुआत करता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लिक 11

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥ 11 ।।

शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके। ।।11।।

(2)स्वक्ष एवं पवित्र स्थल
जब हम ध्यान प्रारम्भ करते हैं तो हमें ध्यान के लिए ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जँहा का वातावरण साफ सुथरा हो, जँहा भूमि गन्दी न हो, और जँहा बैठने में मन को अच्छा लगे, कोई कोलाहल न हो, और बाहरी वातावरण से मन और शरीर का विचलन न होता हो।

(3)आसन
ध्यान के लिए स्थल चयन के उपरांत आसन का चयन भी एक महत्वपूर्ण अंग है। आसन की तीन निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए
    *आसन ऊष्मा का कुचालक हो ताकि शरीर से पृथ्वी की गर्मी या नमी न मिले जिससे ध्यान में व्यवधान पड़ सकता है।
     * आसन न तो बहुत मुलायम हो और न ही बहुत कठोर।
     *आसन की ऊँचाई इतनी ही हो कि बैठने में कष्ट या असुविधा न हो।
        बैठने के तरीके को भी आसन कहते हैं। हमारे बैठने का आसन ऐसा होना चाहिए कि हमें कोई शारीरिक असुविधा न हो और हमारा ध्यान भटके नहीं ताकि हम शरीर से स्वतंत्र होकर ध्यान कर सकें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 12

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥12।।

उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे। ।।12।।

(4) मन, इन्द्रिय, चित्त की एकाग्रता

   उचित आसन पर स्थिर होकर  बैठकरयोगी को योग्याभ्यास करना चाहिए। आसन पर स्थिर होने के उपरांत 
*इंद्रियों की सारी संवेदनाओं और सूचनाओं के प्रवाह को रोक देना है ताकि इन्द्रियाँ बाहरी संसार की अनुभूतियों को अंदर न आने दें।
*मन को निरुद्ध कर लेना है ताकि मन के अंदर से कोई प्रवाह न उठे।
*चित्त स्थिर हो अर्थात न कोई स्मरण हवन ही कोई भविष्य की योजना हो।
*इस प्रकार सभी वाह्य और अंदुरुनी संकल्पों से मन, बुद्धि, चित्त, और इंद्रियों को मुक्त कर मात्र श्वास की गति पर ध्यान केंद्रित करें।
(5)अभ्यास
इस अवस्था मेंआने के बाद व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं की आत्मा यानी सेल्फ पर ध्यान केंद्रित करें। यँहा दो मानसिक क्रियाओं का अंतर समझना जरूरी है। जब जब हम किसी चीज के बारे में ध्यान केंद्रित करते हैं तो उसके बारे में ध्यान पूर्वक सोचते हैं। यह अवस्था एकाग्रता की नहीं होती क्योंकिं तब हमारा ध्यान उस चीज के बारे में तरह तरह के ज्ञान और कल्पनाओं के सम्बंध में सोचता है। लेकिन यदि हम किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो उस चीज के प्रति जागरूक होते हैं और उसी पर टिके होते हैं , उस चीज के बारे में मन के अंदर कोई उथल पुथल नहीं होता बल्कि ध्यान एकाग्र होकर उसीपर लगा होता है। हमें अपनी आत्मा यानी सेल्फ पर इसी दूसरे भाव से एकाग्र होकर रहना होता है।
       इस अवस्था में हमारा ध्यान निरन्तर अपनी आत्मा के बारे में  जागरूक होकर उसी पर केंद्रित रहे। आत्मा यानी सेल्फ पर निरन्तर एकाग्र होने का परिणाम होता है कि हमारा अस्तित्व हमारे सेल्फ में विलीन होने लगता है। ध्यान अथवा मैडिटेशन की यही तो प्रक्रिया होती है जब व्यक्ति का अस्तित्व उसके सेल्फ में लीन हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 13

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥ 13।।

काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ, ।।13।।

(6) शरीर की अवस्था
आसन पर बैठे ध्यान का अभ्यास करते व्यक्ति का पूरा शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो और उसकी दृष्टि नाक के अग्र भाग यानी दोनों नाकों के बीच जँहा से नाक की शुरुआत होती है वँहा टिकी हो।
      जब शरीर स्थिर होता है और एक सीध में होता है , कोई गति नहीं होती तो मन शांत हो पाता है। इसी प्रकार जब आँखें भृकुटि पर टिकी हों इधर उधर नहीं भटकती हो तब मन भी स्थिर हो पाता है अन्यथा आँखें मन को बार बार चलायमान कर देती हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 14

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए। ।।14।।
(7) मन कि अवस्था
जब हम ध्यान करते हैं तो उस समय मन एकदम शांत अवस्था में हो। ये कैसे सम्भव है? इसके लिए हमें भूत, भविष्य और वर्तमान से अपने मन को अलग करना होता है। यह तभी सम्भव है जब हमें हमारी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण हो और हमारी इन्द्रियाँ हमारे निर्देशों को मानकर भूत की स्मृतियों , भविष्य की आकांक्षाओं और वर्तमान के उत्प्रेरकों से मुक्त हो। जब इस तरह मन भूत, भविष्य और वर्तमान से मुक्त हो जाता है तो  मन शांत होता है। यह शांति ध्यान की अनिवार्य शर्त होती है। कोई बाहरी संकल्प मन में प्रवेश नहीं करता, अंदर  कोई संकल्प नहीं उठता।
     इस तरह से शांत मन भय रहित हो ,ये भी अनिवार्य है। भय हमारे ईगो का, हमारे छद्म पहचान का अविभाज्य अंग होता है। जब हम खुद को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं तो उसके साथ कई अपेक्षाएँ जुड़ जाती हैं जिनके खोने का भय हमेशा बना रहता है। यह भय मन को अशांत करते रहता है। तो इससे कैसे निजात पाएं? तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने ईगो से मुक्त हों। ईगो की समाप्ति से ही भय खत्म होता है। कोई अन्य रास्ता नहीं है भय को मारने का। ये  भय अस्तित्व पर संकट की आशंका है, सो अस्तित्व से मुक्ति ही भय से मुक्ति का मार्ग है। कल कोई महत्वपूर्ण घटना आपके साथ होने वाली है तो आप बराबर उसी कि अपेक्षा और आशंका में डूबते उतराते रह जाते हैं, या कुछ हो चुका है तो आप उससे भि उत्साहित या आशंकित होते रहते हैं। बस तब आप वर्तमान में इन सब से आतंकित होकर जीते हैं, शांत नहीं होते । सो ईगो से मुक्ति ही भय से मुक्ति दिलाता है। भय क्यों होता है?भय द्वैत(duality) के कारण होता  है। जब हमारा ईगो हमारे सेल्फ से भिन्न होता है तो खोने का भय होता है लेकिन जब ईगो नष्ट हो जाता है  तो मात्र सेल्फ बचत है जो अपरिवर्तनीय और नाश रहित है। ईगो का सम्बंध हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य कि कामनाओं और आकांक्षाओं से होता है। इन कामनाओं को वश में करें, कामनाओं के स्रोत इंद्रियों को वश में करें तो ईगो को जीवन मिलना बंद हो जाता है और द्वैत से मुक्ति मिलने लगती है और हम ईगो से धीरे धीरे मुक्त होकर सेल्फ में ही घुलने मिलने लगते हैं । तब भय भी समाप्त हो जाता है। यह ध्यान के लिए अनिवार्य शर्त है।
  इसके अलावे हमें ब्रह्मचारी होना चाहिए तभी हम ध्यान कर सकते हैं। ब्रह्मचारी का लोकप्रिय अर्थ लोग सेक्स से मुक्ति का लगाते हैं, वासनाओं से दूरी, स्त्री से दूरी को ब्रह्मचारी पथ मानते हैं। परंतु ब्रह्मचारी का अर्थ है ब्रह्म के मार्ग पर चलना जिससे अंतिम सत्य यानी ब्रह्म की प्राप्ति हो। इसका सम्बन्ध हमारे समग्र आचरण से है न कि मात्र सेक्स या वासना से। जब हम ये तय करते हैं कि हमको परम् सत्य को प्राप्त करना है तो हम उस मार्ग पर चलते हैं। यदि ये व्रत न लें, ये निश्चय न करें तो फिर सेक्स, और वासना से दूर हैं कि नजदीक कोई अर्थ नहीं रखता।
   इस तरह से शांत मन से हमें अपनी आत्मा में, अपने सेल्फ में लीन होना ही ध्यान है। आत्मा ही कॉन्सियसनेस्स है। जब  हम सिर्फ अपने प्रति जागरूक होते हैं तो हम जीव के प्रति कॉन्सियसनेस्स रखते हैं लेकिन जैसे ही ये समझते हैं कि आत्मा या सेल्फ समस्त से जुड़ा हुआ है यह कॉन्सिउओसनेस ही ईश्वर हो जाता है, जीव से ईश्वर की यह यात्रा conciousness की यात्रा होती है। किंतु यदि इसे समझने में दिक्कत है तो आप परम् पिता परमेश्वर में लीन हों, आपको धीरे धीरे अपनी आत्मा का बोध होने लगता है। जब तक हम अपने प्रति जागरूक होते हैं तब तक इसका भान नहीं होता है लेकिन जैसे जैसे हम अपने दायरे से बाहर निकल कर ये समझने लगते हैं कि यही आत्मा, यही सेल्फ सभी में समान है हम जीव से ईश्वर की तरफ प्रस्थान करने लगते हैं। इसी ईश्वर , इसी व्यापक, इसी आत्मा में लीन होकर इसी को लक्ष्य बनाकर ध्यान करें तो ध्यान सम्भव बन पड़ता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 15

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥

वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है। ।।15।।

(8) मोक्ष की प्राप्ति
       जब व्यक्ति ध्यान (मैडिटेशन) की ऊपर वर्णित विधि को अपना कर ध्यान करता है तब वह जिस अवस्था में होता है उस अवस्था में वह अपने सेल्फ/आत्मा के सम्बंध में सोचता(थिंकिंग) नहीं है बल्कि उस आत्मा अथवा सेल्फ के प्रति उसका एकाग्र ध्यान(अटेंशन) लगा होता है। किसी चीज के सम्बन्ध में एकटक होकर सोचना और उस चीज पर एकटक होकर ध्यान लगाना दोनों दो भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। सोचने की अवस्था में व्यक्ति की इन्द्रियाँ जागृत हो कर उसके मन को भटकाने लगती हैं भले व्यक्ति बाहर से शांत दिखता हो, किंतु एकाग्र ध्यान की अवस्था में व्यक्ति उस चीज से अलग किसी भी अन्य के प्रति जागरूक नहीं रह जाता है और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उसी एक में विलीन होने लगता है। किसी चीज के अस्तित्व के सम्बंध में सोचना और उसी चीज के प्रति बिना सोचते हुए मात्र जागरूक (अवेयर) होना ,दो भिन्न अवस्था हैं और ध्यान की अवस्था में मात्र अवेर्नेस यानी उस चीज के प्रति मात्र जागरूकता रह जाती है। मन और इन्द्रियाँ इस अवस्था में एकदम निष्क्रिय हो जाते हैं। इस अवस्था में ही व्यक्ति अपनी आत्मा को महसूस कर पाता है। तब  व्यक्ति सारे बन्धनों से मुक्त होकर एकदम शांत हो जाता है, परम् शांति को प्राप्त करता है और इसी  शांति की प्राप्ति को परमात्मा की प्राप्ति कहा जाता है और सभी द्वैत (दुआलिटी) समाप्त हो जाता है। यही कैवल्य या मोक्ष की अवस्था होती है जब जीव अपना अस्तित्व भूलकर अपनी ही  आत्मा में विलीन हो जाता है और परम् शांति को प्राप्त करता है बिना किसी अन्य विचलन के।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 16

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।16।।
(9) आहार-विहार
    ध्यान योग के लिए आवश्यक है कि योगी अपने शरीर और मन से मुक्त रहे , उसे अपने शरीर और मन के स्तर पर किसी विचलन का सामना नहीं करना पड़े। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति जो ध्यान योग में लगना चाहता है न तो ज्यादा खाये न कम ही, न ज्यादा सोये , न  कम ही क्योंकि ये दोनों अति की अवस्थाएँ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर उसकी एकाग्रता को भंग कर ध्यान से विचलित कर देती हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 17

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।17।।

(9) आहार -विहार

सफलता पूर्वक ध्यान योग में प्रवृत्त होने हेतु आवश्यक है कि व्यक्ति का शरीर और मन स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे और इसके लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति युक्तायुक्त संयमित जीवन जिये, निम्न चीजें शामिल हों उसके जीवन में
1.संयमित और आवश्यक मात्रा में भोजन करे,
2.उसके जीवन में विहार यानी मनोरंजन का संयमित समावेश हो,
3.वह नियमित संयमित ढंग से कर्म करे, तथा
4.बहुत अधिक या बहुत कम न सोये।
        ये क्रियाएँ व्यक्ति विशेष की शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए, सभी के लिए एक तरह की मात्रा का निर्धारण नहीं हो सकता है, लेकिन खान-पान, नींद, मनोरंजन और कर्मों में व्यक्ति की अपनी निजी क्षमता के अनुसार एक संयमित अनुशासन का होना अनिवार्य है, तभी व्यक्ति बाहरी विचलनों से मुक्त होकर ध्यान योग में प्रवृत्त हो सकता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 18

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है। ।।18।।

(10)योग अवस्था

ध्यान योग की विधि को अपना कर व्यक्ति योगयुक्त हो जाता है।  इस अवस्था में व्यक्ति का मन उसके पूर्ण नियंत्रण में होता है, इधर उधर भटकते नहीं रहता है। इन्द्रियाँ पूर्ण वश में होती हैं जिस कारण मन का भटकाव बंद हो जाता है और मन पूर्णतः अपनी ही आत्मा में लीन होता  है। कोई अन्य भाव में में नहीं रह जाता है। अन्य सभी जुड़ाव से मन मुक्त रहता है, कोई अन्य आकर्षण नहीं रह जाता है। व्यक्ति स्वयं की आत्मा में ही अवस्थित हो जाता है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति इंद्रियों की गतिविधियों से मुक्त, शांत मन से आत्मा/सेल्फ में ही विलीन हो चुका होता है। कोई अन्य इक्षा, भाव, कामना नहीं रह जाती, बस व्यक्ति खुद की सत्यता में विलीन हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 19

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है। ।।19।।

             जब व्यक्ति ध्यानयोग की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि उसका सारा ध्यान अपनी आत्मा यानी अपने सेल्फ पर लगा होता है उस समय होता क्या है, इसे समझना आवश्यक है। आत्म में ध्यानरत योगी की समस्त बाहरी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं और उसकी इन्द्रियाँ सम्पूर्ण रूप से उनके वश में हुई निश्चेष्ट हुई होती हैं। ऐसी अवस्था में योगी मन की समस्त इक्षाओं से मुक्त हुआ रहता है, उसकी कोई कामना शेष नहीं होती है। मन हमेशा कामनाओं की पूर्ति के लिए ही भटकता है और जब जब उसकी कोई कामना पूरी होती है उसे प्रसन्नता का अनुभव होता है। लेकिन ध्यानरत योगी की तो कोई कामना शेष ही नहीं रह गई है तो उसका मन चिर प्रसन्न्ता में डूबा हुआ होता है। आत्मा -परमात्मा में लीन योगी को इंद्रियों से कोई सुख चाहिए ही नहीं, उसकी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं सो उसे परम् शांति परम् सुख मिल चुका होता है, सो उसका मन कँही भटकता नहीं बल्कि एक सीध में एकाग्र हुआ होता है, इधर उधर भटकता नहीं है। मन तो उसका भटकता है जिसका ध्यान अपनी आत्मा और परमात्मा पर नहीं टिका होता है बल्कि कामनाओं की पूर्ति के लिए मारे मारे फिरता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 20

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥

योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। ।।20।।

ध्यान और योग की प्रक्रिया मात्र इनके सम्बन्ध में सैद्धान्तिक  ज्ञान प्राप्त कर लेने से पूरी नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि कामनाओं के त्याग और इंद्रियों के वश में रहने से ही हमारा ध्यान अपनी आत्मा, अपने स्व पर टिक पाता है और यही परम् सुख की अवस्था दिला पाता है लेकिन इस जानकारी के बावजूद हम अंतिम सत्य यानी परम् सुख को छोड़कर खुद के बाहर अवस्थित वस्तुओं और कारणों कों ढूँढते रहते हैं और कभी सन्तुष्ट और खुश नहीं हो पाते हैं चिर काल तक के लिए। तो फिर उपाय क्या है। उपाय है इस सैद्धान्तिक ज्ञान के अनुरुप आचरण और इस आचरण का अनवरत लम्बे समय तक अभ्यास करना। ज्ञान के निरन्तर प्रायोगिक अभ्यास से ही यह ज्ञान आत्मसात हो पाता है और हम खुद को कामनाओं और अपनी इंद्रियों के लालच के प्रभाव से मुक्त कर अपनी आत्मा पर खुद को एकाग्र कर पाते हैं जिससे हमें अनंत काल तक का सुख मिल पाता है। आत्मा को, अपने सेल्फ को इस परम् सुख की प्राप्ति अपनी आत्मा में लीन होने से ही मिलता है लेकिन इस सुख की अनुभूति के लिए आवश्यक है कि हम कामनाओं और इंद्रियों की चेष्टाओं को त्याग कर स्वयम को अपनी आत्मा में ही केंद्रित करने का निरन्तर अभ्यास करें, बिना इस  अभ्यास के हम कभी चिर सुखी हो ही नहीं सकते।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 21

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥

इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं। ।।21।।

योगयुक्त ध्यान की अवस्था में व्यक्ति को अंतहीन सुख की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति ध्यान के लिए सभी आवश्यक अवस्थाओं को प्राप्त कर अपने आत्मा /अपने सेल्फ यानी स्व में केंद्रित होकर उसी में लीन हो जाता है तो उस समय व्यक्ति को जो सुख मिलता है वह सुख इंद्रियों पर निर्भर सुख नहीं होता है। जब हमारे सुख इंद्रियों पर निर्भर होते हैं तब हम इंद्रियों के माध्यम से बाहरी कारकों से सुख प्राप्त करते हैं। यह सुख हमेशा युग्म में होता है, हमेशा इसके साथ दुख भी लगा होता है। यह सुख हम पर नहीं हमारी कामना और कामना की पूर्ति करने वाले बाहरी कारक और उसकी अनुभूति देने वाली हमारी इंद्रियों पर आधारित होता है। लेकिन जब व्यक्ति इंद्रियों से मुक्त अपनी ही आत्मा में लीन ध्यान में रहने लगता है तो उसके सुख इंद्रियों से परे उसकी बुद्धि के ,उसकी चेतना के अंग बन जाते हैं जिसके कारण उसे सुख चाहिए नहीं होता है बल्कि वो खुद सुख बन जाता है। यह सुख अंतहीन होता है क्योंकि इसकी पूर्ति के लिए किसी कामना का पूरा होना जरूरी नहीं होता है और न ही उसकी अनुभूति इंद्रियों से होनी जरूरी होती है। व्यक्ति खुद ही सुख है। उसका कोई दुख शेष नहीं रह जाता है। इस अवस्था में उसकी बुद्धि इसी अवस्था में विलीन हो जाती है , वह विचलित नहीं होता है। सो जब व्यक्ति अपने ईगो से मुक्त अपने स्व में लीन होता है , उसके गुण समाप्त हो जाते हैं और वह अंतहीन सुख बन सुखी रहता हुआ दूसरों को भी आनंदमयी करते रहता है, उसके सानिध्य में दूसरे भी सुख पाते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 22

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ 22।।

परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता। ।।22।।

आत्मा में लीन, अपने सेल्फ को पहचानने वाले ध्यान योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार से बड़ा कोई सत्य नहीं रह जाता क्योंकि यही व्यक्ति जिसे अपने सेल्फ का ज्ञान हो चुका है वही आत्मा और परमात्मा को समझ जान पाता है। ध्यान रहे हम किसी चीज को उतना ही समझ पाते हैं जितना हम अपने सेल्फ को समझ पाते हैं। तथ्य/वस्तु की समझ सिर्फ उस तथ्य या वस्तु पर निर्भर नहीं करती बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारा ज्ञान कितना है। अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारी समझ के स्तर से ही निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि में जो है, उसे हम कितना समझ पाते हैं। संसार में इक्षाओं की कमी नहीं होती है। हम एक इक्षा की पूर्ति करने में लगे होते हैं कि उसी रास्ते में और नई इक्षाएँ पाल लेते हैं। नतीजा होता है कि हम निरन्तर व्याकुल होते हैं। लेकिन जब हमें अपने सेल्फ का ज्ञान होता है तो हमारी इक्षाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। ध्यान रहे कि इसका तात्पर्य निष्क्रियता से नहीं है। आत्मज्ञान युक्त व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है। वह  विचारों और कर्मों से निरन्तर चलायमान तो होता है किंतु उसकी गति कामनाओं के वश में नहीं होती है। इसी कारण इस तरह से ज्ञान अर्जित ध्यानमग्न व्यक्ति संसार की गतिविधियों से ,संसार द्वारा, संसार द्वारा उतपन्न भारी से भारी दुखों से भी अछूता ही होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 23

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥

जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है। ।।23।।

जब व्यक्ति  ऊपर वर्णित तरीके से ध्यान करता है तो वह अपने भ्रम से मुक्त होते जाता है। अभ्यास से व्यक्ति अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े उस आवरण को हटा पाने में सक्षम हो पाता है जिस आवरण के कारण वह स्वयं से बाहर के सुख-दुख और कामनाओं के संसार को ही अपना वास्तविक संसार समझने की भूल करते रहता है और इन्द्रिय और इन्द्रिय जनित सुख और दुख, कामनाओं में लीन होता है, उसी में अपनी बुद्धि, अपना विवेक और अपने शरीर को लगाए रखता है। इस भ्रम से मुक्ति ही योग है और योग की इस अवस्था में व्यक्ति द्वारा अपना परिचय अपने सेल्फ में , अपनी आत्मा में मिलता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह बिना अधीर हुए, बिना अकुताये, अभ्यास पूर्वक  अपने भ्रम को काट कर अपनी आत्मा को प्राप्त करे यानी योग को प्राप्त करे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 24, 25

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌॥

संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर ।।24।।

क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। ।।25।।

ध्यान के द्वारा व्यक्ति अपने सेल्फ/आत्मा को प्राप्त कर पाता है। किंतु ध्यान की इस अवस्था को पाने के लिए ये आवश्यक है कि
1.व्यक्ति अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करे
2.उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में हों
3.मन को और शांत करे,  और ऐसा धैर्य से करे, बुद्धि और विवेक से करे,
4.ध्यान में सिर्फ अपनी आत्मा हो, अपना सेल्फ हो, और कुछ भी न हो।
    यह प्रक्रिया धीरे धीरे होती है और बारम्बार अभ्यास से होती है। ध्यान की यह अवस्था उपासना से भिन्न होती है, पूर्णतः वर्तमान में टिकी होती है, किसी का कोई स्वरूप, कोई शब्द, कोई कामना, कोई स्वर, कोई अनुभूति नहीं होती है मन में, मन पूरी तरह से अपने प्रति सजग, अपने में , अपनी वर्तमान अवस्था(यानी ध्यान की अवस्था के प्रति ) पूरी तरह से जागरूक होता है। अपनी साँसों पर टिके रहें, उनकी गति में अपनी गति मिलाए रखें, और सजग रहें कि सजगता के साथ आप अपनी आत्मा से जुड़ रहें हैं।
   यह क्षमता एक दिन में नहीं आती है सो अधीर न हो, रोज के अभ्यास से ये सम्भव हो पाता है । आप सभी कामनाओं का त्याग कर, इंद्रियों को अपने मन और बुद्धि के अधीन कर अपने, भूत, वर्तमान, अतीत से मुक्त होकर, अपनी आत्मा को पाते हैं और इसके लिए निरन्तर अभ्यास की जरूरत होती है, धैर्य की जरूरत होती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 26

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌॥ 26।।

यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे। ।।26।।
ध्यान की विधि जान लेने के बाद भी व्यक्ति इस विधि से ध्यान में लग नहीं पता है। इसका कारण होता है मन की चंचलता और विषयों से हमारी अनुरक्ति।
   मन काफी चंचल होता है जिस कारण मन किसी एक स्थान पर  लम्बे समय तक के लिए एकाग्र नहीं हो पाता है। जब व्यक्ति ध्यान में लीन होता तो अचानक मन व्यक्ति के सेल्फ से हट कर अन्य चीजों की तरफ चल देता है। मन जाता किधर है? मन जाता है उस ओर जिधर के विषयों में हमारी अनुरक्ति राग या द्वेष के कारण अधिक होती है।
    तो इससे बचने का क्या उपाय है? व्यस्तुतः ध्यान की गुणवत्ता इसपर निर्भर करती है कि हमने अपनी इंद्रियों से कितना विराग पाया है; अपनी कामनाओं से कितनी मुक्ति पाई है। यह विराग एक झटके में नहीं आता है। धीरे धीरे अभ्यास करते करते हम अपनी कामनाओं और इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होते हैं। जब तक पूर्णतः मुक्त नहीं होते मन की चंचलता बनी रहती है जो हमारी एकाग्रता को अपने रुचि और अरुचि के अनुसार भटकाती ही रहती है। सो हमारा दायित्व होता है कि हम खुद को अपने कामनाओं और रागों से, इन्द्रिय के विषयों से मुक्त करें और मन के भटकाव के प्रति जागरूक रहें। ध्यान रखें कि मन भागेगा, और जैसे मन आत्मा से /अपने सेल्फ से भागता है उसे पकड़ें, पकड़ कर वापस लाएँ। 
   विचारों का जन्म मन के धरातल पर होता है। जब तक मन पर नियंत्रण नहीं होगा विचार जन्म लेते ही रहेंगे और वे विचार मन को भटकाते ही रहेंगे। मन में ये विचार तब आते हैं जब मन में कामनाएँ बसी होती हैं और इन्द्रियाँ मन के ऊपर हावी हुई रहती हैं, बुद्धि पीछे रह गई होती है। 
   सो मन की एकाग्रता को अपने सेल्फ पर बनाये रखकर ध्यान करने के लिए जरूरी है कि-
      मन से कामनाओं का परित्याग करें,
     मन पर इंद्रियों के वश को समाप्त करें,
    मन की चंचलता के प्रति सावधान बने रहें, और
     मन को बार बार अभ्यास कर
स्वयम के सेल्फ पर लाते रहें।
तभी हम ध्यान यानी मैडिटेशन की अवस्था को पा सकते हैं।



















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