श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ 10।।

मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए। ।।10।।

योगयुक्त कौन है ये तो हमने अबतक समझा है। व्यक्ति और समाज के उत्थान का मार्ग कर्मयोग के अनुपालन से शुरू होता है। फिर ज्ञान की प्राप्ति होती है और तब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर पाता है। जो व्यक्ति बिना इस क्रमिक यात्रा के ध्यान यानी मैडिटेशन करने का प्रयास करता है वह वास्तव में मैडिटेशन या ध्यान नहीं कर रहा होता है बल्कि वह एकाग्र होने का अभ्यास कर रहा हो सकता है या फिर उपासना कर रहा होता है।
    ध्यान की विधि तो वही शुरू कर सकता है जो कर्मयोग और ज्ञान योग की यात्रा पूरी कर चुका होता है। अब देखिए कि ध्यान किया कैसे जाता है। इसे हम क्रमवार समझते हैं।
(1) एकांत स्थल और शांत मन
(I) योगयुक्त व्यक्ति को एकांत स्थल का चुनाव करना चाहिए। यह स्थल।ऐसा हो कि योगी के ध्यान को भटकाने वाला कोई भी कारक मौजूद नहीं हो। योगी को बाहरी किसी कारक से व्यवधान नहीं हो , स्थल ऐसा होना चाहिए।
(ii) मन, इन्द्रियाँ और शरीर पर नियंत्रण होना अनिवार्य है अर्थात मन और इन्द्रियाँ निश्चेष्ट होने चाहिए जिससे भी निश्चेष्ट बना रहेगा। मन में कोई भाव न हो , इन्द्रियाँ कोई क्रिया न करें और शरीर एकदम गतिहीन हो। 
(iii) योगी के मन में न उसका अतीत हो , न भविष्य हो। भविष्य आशा का संचार करता है तो अतीत संस्मरणों की पोटली खोलता है। योगी जो ध्यान में प्रवृत्त होने जा रहा है उसका सारा ध्यान वर्तमान अवस्था पर होना चाहिए।  ये तभी सम्भव है जब इन्द्रियाँ और मन कुछ नहीं कर रहें हों।
(iv) योगी को ध्यान का अभ्यास नितांत अकेले होकर करना होता है, न कि किसी समूह में। ध्यान की क्रिया एक नितांत व्यक्तिगत अभ्यास की क्रिया है।
(v) योगी का ध्यान अवनी आत्मा पर हो, अपने सेल्फ पर हो। किसी भी अन्य की कल्पना, किसी भी अन्य का ध्यान योग की ध्यानावस्था नहीं है। जैसे ही योगी स्वयम के सेल्फ से अलग होकर किसी अन्य सत्ता का ध्यान करता है वह उपासना की अवस्था में चला जाता है। उसी प्रकार यदि किसी चीज पर केंद्रित होता है वह एकाग्रता का अभ्यास करने लगता है। उपासना और एकाग्रता अनुकरणीय तो हैं किंतु वे ध्यान की अवस्था नहीं हैं। योगी को मन, इन्द्रिय, शरीर, अतीत, और भविष्य से विलग होकर सिर्फ वर्तमान में अपने सेल्फ, अपनी आत्मा, अपने कॉन्सियसनेस पर टिकना होता है।
         इस तरह से कर्मयोग और ज्ञानयोग से परिपूर्ण योगी ध्यान की शुरुआत करता है।

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