श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 6
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 6
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥ ।।6।।
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है। ।।6।।
कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति के लिए यह आवश्यक है कि वह समझे कि व्यक्ति खुद ही अपना मित्र है और शत्रु भी। ये हम पर निर्भर करता है कि हम खुद के मित्र बने या शत्रु। खुद के मित्र होने का सामान्य अर्थ इतना भर है कि हमारी इन्द्रियाँ, मन , शरीर और विवेक एक दूसरे के साथ सामंजन में रहें और हमारी इन्द्रियाँ, मन और शरीर हमारे विवेक के अधीन रहे। विवेक के अधीन होने का तातपर्य ये नहीं है कि हम जबरन अपनी इंद्रियों और मन और शरीर को हाँके बल्कि इनका परस्पर सामंजन इस प्रकार से हो कि ये एक इकाई के रूप में हमारे निष्काम कर्म की यात्रा को सुगम बनाएँ। यदि विवेक, मन इन्द्रियाँ और शरीर सामंजन में नहीं होते हैं, इन्द्रियाँ बार बार अपने सुख की तरफ भागेंगी, तो शरीर भी वही कर्म करेगा जिससे उसकी इंद्रियों को सुख मील सके। इस अवस्था में हमारे कर्म वाह्य संसार की तरफ , उसके आकर्षण की तरफ अधिक झुकेंगे, कर्मों में और उनके परिणामों में हमारी अभिरुचि बढ़ती जाएगी जिसका नतीजा ये होता है कि हम मन की शांति गँवा कर उन्हीं में रमे होते हैं। ऐसी स्थिति में हम आगे नहीं बढ़ पाते हैं।
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