श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 5
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 5
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ ।।5।।
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। ।।5।।
ध्यान देने वाली बात है कि व्यक्ति विशेष का उत्थान और पतन उस व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का उत्थान तभी सम्भव हो पाता है जब वह व्यक्ति खुद इसकी इक्षा करता है और इसके लिए प्रयास करता है। किसी व्यक्ति विशेष का उत्थान कोई अन्य नहीं कर सकता है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि यदि भूख हमें लगी है तो यह भूख तभी मिटेगी जब हम खाएंगे। किसी अन्य के खाने से हमारी भूख नहीं मिटने वाली है।
अपने उत्थान के लिए हमें गुरु की शरण में तो जाना होता है जिनकी मदद से हमारा उत्थान होता है किंतु यदि हम खुद नहीं चाहें तो गुरु भी हमारा उत्थान नहीं कर सकते। यँहा पर श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के खुद के प्रयास को महत्व दिया है और स्पष्ट कर दिया है कि हमारे बदले कोई और प्रयास कर हमें नहीं उठा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम ही अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी हैं। यदि हम अच्छा करेंगे तो अच्छा होगा हमारे साथ और यदि हम बुरा करेंगे तो बुरा होगा हमारे साथ। कोई अन्य मित्र न तो हमारा अच्छा कर सकता है और न ही कोई अन्य शत्रु हमारा बुरा ही कर सकता है जब तक हम खुद के साथ अच्छा या बुरा न करें और इस प्रकार हम ही अपने सबसे अच्छे मित्र और शत्रु दोनों हैं। ये हमपर निर्भर करता है कि हम खुद के मित्र बनना चाहते हैं कि शत्रु। यदि हम चाहते है कि हम उद्धार के मार्ग पर बढ़ सकें तो ये हमारा दायित्व है कि हम कर्मयोग के मार्ग पर चलें और उसपर चलकर हम खुद के अंदर अच्छे दैवी गुणों की वृद्धि करें, उनके बल पर हम अपने अवगुणों को खत्म कर सकें और खुद का कल्याण कर सकें।
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