श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 4
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ ।।4।।
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है। ।।4।।
ध्यान की अवस्था प्राप्त करने के पूर्व हममें दो अनिवार्य योग्यताएँ होनी ही चाहिये, जिनके बिना हम योग/सन्यास/ध्यान में प्रवृत्त भी नहीं हो सकते हैं। ये दो अनिवार्य योग्यताएँ हैं
1.हमारे मन में इन्द्रियों के विषयों यानी "शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध" के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए अर्थात हमें मोह और लगाव से मुक्त होना चाहिए।
2. अपने कर्मों के प्रति और उन कर्मो के फल के प्रति कोई लगाव नहीं होना चाहिए। अर्थात हमें समस्त कामनाओं से मुक्त होना चाहिए क्योंकि कामनाओं की उपस्थिति में हम फिर से उनकी पूर्ति में भटकने लगते हैं।
ये दोनों अवस्थाएँ इसलिए जरूरी हैं क्योंकि इनके बिना हमारे मन में शांति नहीं होती और चंचल मन से हम खुद पर , अपनी आत्मा पर , अपने सेल्फ पर केंद्रित नहीं हो सकते हैं। इन दोनों योग्यताओं को पूरा किये हम कितना भी बैठें, कितना भी आँख बंद कर लें, हम ध्यान नहीं लगा सकते हैं। और ये जबरदस्ती नहीं हो सकता है बल्कि ये अवस्था निरन्तर प्रयास से , अभ्यास से मिल पाती है।
कामनाओं के अभाव और इन्द्रियों के विषयों से विरक्ति का अर्थ ये नहीं है कि हम कामनाओं और इन्द्रियों के विषयों से कोई घृणा करते हैं। घृणा का भाव आते ही स्पष्ट है कि हम उनसे जुड़ें हुए हैं। वस्तुतः इसका अर्थ ये है कि हमें कामनाएँ और इन्द्रियों के विषय यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध अपनी तरफ नहीं खींच पाती हैं, हमारे अंदर उनको पाने की कोई लालसा नहीं होती है। कामनाओं के कारक और इन्द्रियों के विषय तो बने ही रहेंगे लेकिन हमारे अंदर इतनी क्षमता होनी चाहिए कि हम इनकी तरफ खिंचे नहीं क्योंकि यदि ऐसा होता है तो फिर हम उनकी पूर्ति में ही लग जाते हैं और फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा जैसी चीजों में लग जाते हैं जिसका नतीजा ये निकलता है कि हम स्वयम के सेल्फ पर केंद्रित नहीं हो सकते हैं और ध्यान की अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
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