श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 3

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ ।।3।।

योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है। ।।3।।

योग में प्रवृत्त होने के लिए यानी ध्यान निष्ठ होने के लिए पूर्व शर्त क्या है? हम ध्यान/योग/सन्यास के मार्ग पर तभी चल सकते हैं जब हमने कर्मयोग के मार्ग से यात्रा की हो यानी योग/ध्यान/सन्यास की पूर्वशर्त है कार्योग के अनुसार कर्मों का सम्पादन। और एकमात्र साधना मन की शांति है। यह शांति कैसे आती है? मन की शांति  आती है कामनाओं के परित्याग से और कामनाओं का यही परित्याग वैराग्य है। सारे कर्मों को करते हुए भी मन से कर्मफल से /कामनाओं से मुक्ति पा लेना ही वैराग्य है जिसके कारण मन में कोई उथल पुथल नहीं रह जाता है, मन शांत होता है, साधना में लीन होता है और तब हम योग/ध्यान/सन्यास में डूबे हुए होते हैं। इस मन की शांति अवस्था में हम खुद की आत्मा को समझ पाने की स्थिति में रहते हैं। मन की इस शांति अवस्था में आत्मा के करीब रहकर हम खुद के अंदर देख पाते हैं और इस अवस्था में जिज्ञासा उतपन्न होती है जिससे हम ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं। हम खुद का अन्वेषण करते हैं। बाहरी तत्वों से निर्लेप मन, बुद्धि और विवेक सब कर्मों को करते हुए भी स्वयम की आत्मा के प्रसार को समझने में लगा होता है और यही हमारी योगावस्था या ध्यानावस्था है। इस अवस्था  हम माह से मुक्त हुए होते हैं सो शांत भाव से आत्मचिंतन में लीन होते हैं। इस अवस्था में हम न तो बाहरी संकल्पों से प्रभावित होते हैं न ही अंदर कोई संकल्प उठते हैं। इस अवस्था को प्राप्त किये बिना योग/सन्यास/वैराग्य/ध्यान सम्भव नहीं है। 

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