श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 2
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 2
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥ ।।2।।
हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता। ।।2।।
योग और सन्यास की अवस्था भिन्न नहीं होते हैं । जब हम कर्मयोग के अनुसार नियत कर्म यानी यज्ञ की क्रिया करते हैं जिसमें हम अपने स्वभाव से उतपन्न क्षमता यानी अपने गुणों से उतपन्न क्षमता के अनुसार बिना कर्मफल की चिंता के पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर यानी सेवा भाव से कर्म करते हैं तो उस अवस्था में न तो हम बाहरी कामनाओं से प्रेरित होते हैं और न ही हमारी अंदुरुनी कामनाओं का बाहर कोई प्रभाव पड़ता है। यही संकल्पों का सर्वथा त्याग है। हम कर्म तो करते हैं लेकिन हम कर्म क्यों करते हैं?
1.हमारी इन्द्रियाँ यानी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रियाएँ करती रहती हैं उनको कोई अपेक्षा नहीं होती है।
2.हमारी इन्द्रियाँ वैसे ही व्यवहार करती हैं जैसे हमारे अंदर गुण होते हैं।
3.हम इसलिए कर्म नहीं करते हैं कि हमें कोई फल प्राप्त हो, बल्कि हम कर्म इसलिए करते हैं कि ऐसा करना ही जायज है।
4.जब हम कर्म करते हैं तो फल के लिए तो कुछ नहीं करते बल्कि हमारे कर्म के कुछ उच्च आदर्श होते हैं और हम जो भी करते हैं उस उच्च आदर्श के प्रति सेवा भाव से करते हैं। हमारे अंदर कोई कामना नहीं होती है बल्कि सेवा और उच्च आदर्श के प्रति समर्पण होता है।
5.बदले में जो फल प्राप्त होता है उसे भी हम स्वाभाविक मानकर संतुष्ट होते हैं ।
6.जब कर्म में कामनाओं का अभाव होता है तब हम स्वाभाविक रूप से काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, असत्य, हिंसा से दूर होते हैं। ऐसे अवस्था में हमारे गुण भी उच्च अवस्था में पहुँच जाते हैं यानी तमोगुण से शुरू होकर रजोगुण होते हुए सत्वगुण तक कि यात्रा होती है।
इस अवस्था में "मैं कर्ता हूँ" का भाव समाप्त होता है। हम बाहरी कारको से नहीं अपनी ही आंतरिक अवस्था में लीन होते हैं , अपने सेल्फ , अपनी आत्मा में डूबे होते हैं। तब लगता है कि हम उसी विस्तृत अतित्व के एक भाग हैं जो सब के अंदर समान रूप से मौजूद है। ये अवस्था परम् शांति की होती है जिसमें मन, बुद्धि और विवेक कर्मेन्द्रियों की समस्त क्रियाओं के संचालित होते रहने के बावजूद शांत और प्रसन्नचित्त हुए रहते हैं। स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ का समस्त विस्तार के साथ यह एकीकरण योग की अवस्था होती है, और यही सन्यास की भी अवस्था होतो है। सो दोनों भिन्न न होकर एक ही होते हैं। बिना योगी हुए सन्यास नहीं मिलता। सन्यास जीवन और जीवन सुविधाओं का त्याग नहीं है, न ही यह बाल दाढ़ी बढाकर गेरुआ वस्त्र पहनने का कोई रिचुअल है बल्कि सन्यास कामनाओं का त्याग है, कर्मयोग का कर्म है, ज्ञानयोग का ज्ञान है और ध्यानयोग की एकाग्रता है। यही योग है।
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