श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 की व्याख्या श्लोकरहित (श्लोक 1 से 47 )

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 6 (श्लोक 1 से 47 ) 
                 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय में ध्यान यानी मैडिटेशन की चर्चा है। लेकिन इस अवस्था तक पहुंचने के पूर्व हमें अपनी आध्यात्मिक  यात्रा के कई चरण पूरे करने होते हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवद्गीता के पहले अध्याय से पाँचवे अध्याय तक में क्रमानुसार किया गया है। जब मोह में बढ़ोतरी होती है तो भ्रम भी बढ़ता है और भ्रम के कारण अवसाद और दुख भी बढ़ता है क्योंकि तब विवेक अक्षम हो जाता है निर्णय लेने में। इस अवस्था में मानसिक क्लेश काफी होता है। तब इससे बाहर निकलने के लिए ज्ञान की आवश्यकता महसूस होती है और यह बेचैनी हमें उस ज्ञान की तरफ ले जाती है जँहा हम ये जान पाते हैं कि इस भ्रम और मोह और इनसे उपजे क्लेश से छुटकारा पाने का एक मात्र तरीका है कि हम खुद की खोज पूरी करें, हम जान सकें कि हम कौन हैं और यही खोज हमें हमारे सेल्फ यानी आत्मा तक ले जाता है। जब हम खुद को जान लेते हैं तो हम स्थितप्रज्ञ हो जाते हैं। किंतु यह ज्ञान मिलता कैसे है? तो इस ज्ञान को हम मात्र पोथी बाँच कर नहीं पा सकते हैं, बल्कि निष्काम भाव से कर्म कर ही हम समझ पाते हैं कि हमारे वास्तविक अस्तित्व का अर्थ क्या है। इस समय जब हमारे कर्म किसी उच्च आदर्श को समर्पित होते हैं और जब हम अपने कर्म के लिए किसी फल विशेष की इक्षा को नहीं पालते बल्कि उस उच्च आदर्श को समर्पित होकर कर्म करते हैं तो हमारे अंदर से "मैं कर्ता हूँ" का अहंकार मिटता है और हमारा विवेक जागृत होता है। लेकिन हमें भ्रम बना रहता है। ज्ञान की समझ तो आने लगती है लेकिन मन की स्थिरता पूरी नहीं होती है सो फल से पूर्ण वैराग्य नहीं होता है । तब आवश्यकता होती है कि हम एकाग्र होकर  चिंतन में लगे अर्थात ध्यान में लगे ताकि हमारे अंदर के अहंकार का समापन हो सके और हम समझ सकें , आत्मसात  कर सकें खुद को उस विस्तृत सत्ता के साथ जिसके हम अंश हैं। अध्याय 6 हमें इसी ध्यान के मार्ग पर प्रशस्त करता है।
 श्लोक 1
ध्यान (मैडिटेशन) का अर्थ है स्वयं पर ध्यान देना।  हम बहुत सी बातों पर ध्यान दे सकते हैं लेकिन सभी ध्यान नहीं हैं।  वे सबसे अच्छी एकाग्रता में हैं।  लेकिन जब हम स्वयं पर ध्यान देते हैं तो इसे मेडिटेशन कहते हैं।  कर्मयोग का पालन किए बिना हम ध्यान की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते।  कर्मयोग का पालन करने वाला व्यक्ति योगी और सन्यासी दोनों होता है।  एक कर्मयोगी वह है जो परिणाम  की इच्छा के बिना अपने गुणों की स्थिति के अनुसार निश्चित कर्म (क्रियाएं) करना शुरू कर देता है।  कर्मयोग के मार्ग पर चलने से कर्मों में आसक्त न होकर हम योगी और सन्यासी दोनों हैं।  यह स्थिति इच्छाओं के त्याग की स्थिति है।  इच्छाओं का त्याग मन को शांत करता है।  शांति योगी और सन्यासी की निशानी है।  इस प्रकार कर्मयोग का पालन ध्यान की पूर्व शर्त है।  कर्मयोग में हम अपने कर्मों के फल के प्रति आसक्ति की भावना के बिना किसी उच्च वेदी की सेवा के उद्देश्य से अपने कर्म करते हैं।  ऐसे कार्य और कुछ नहीं बल्कि हमारे कर्तव्य हैं। क्रियाओं का त्याग कर्मयोग नहीं कहलाता है बल्कि यज्ञ भाव से नियत कर्मों का निष्पादन कर्मयोग है।

 श्लोक 2
योग और सन्यास की अवस्था भिन्न नहीं होते हैं । जब हम कर्मयोग के अनुसार नियत कर्म यानी यज्ञ की क्रिया करते हैं जिसमें हम अपने स्वभाव से उतपन्न क्षमता यानी अपने गुणों से उतपन्न क्षमता के अनुसार बिना कर्मफल की चिंता के पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर यानी सेवा भाव से कर्म करते हैं तो उस अवस्था में न तो हम बाहरी कामनाओं से प्रेरित होते हैं और न ही हमारी अंदुरुनी कामनाओं का बाहर कोई प्रभाव पड़ता है। यही संकल्पों का सर्वथा त्याग है। हम कर्म तो करते हैं लेकिन हम कर्म क्यों करते हैं?
1.हमारी इन्द्रियाँ यानी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रियाएँ करती रहती हैं उनको कोई अपेक्षा नहीं होती है।
2.हमारी इन्द्रियाँ वैसे ही व्यवहार करती हैं जैसे हमारे अंदर गुण होते हैं।
3.हम इसलिए कर्म नहीं करते हैं कि हमें कोई फल प्राप्त हो, बल्कि हम कर्म इसलिए करते हैं कि ऐसा करना ही जायज है।
4.जब हम कर्म करते हैं तो फल के लिए तो कुछ नहीं करते बल्कि हमारे कर्म के कुछ उच्च आदर्श होते हैं और हम जो भी करते हैं उस उच्च आदर्श के प्रति सेवा भाव से करते हैं।  हमारे अंदर कोई कामना नहीं होती है बल्कि सेवा और उच्च आदर्श के प्रति समर्पण होता है।
5.बदले में जो फल प्राप्त होता है उसे भी हम स्वाभाविक मानकर संतुष्ट होते हैं ।
6.जब कर्म में कामनाओं का अभाव होता है तब हम स्वाभाविक रूप से काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, असत्य, हिंसा से दूर होते हैं। ऐसे अवस्था में हमारे गुण भी उच्च अवस्था में पहुँच जाते हैं यानी तमोगुण से शुरू होकर रजोगुण होते हुए सत्वगुण तक कि यात्रा होती है।
          इस अवस्था में "मैं कर्ता हूँ" का भाव समाप्त होता है। हम बाहरी कारको से नहीं अपनी ही आंतरिक अवस्था में लीन होते हैं , अपने सेल्फ , अपनी आत्मा में डूबे होते हैं। तब लगता है कि हम उसी विस्तृत अतित्व के एक भाग हैं जो सब के अंदर समान रूप से मौजूद है। ये अवस्था परम् शांति की होती है जिसमें मन, बुद्धि और विवेक कर्मेन्द्रियों की समस्त क्रियाओं के संचालित होते रहने के बावजूद शांत और प्रसन्नचित्त हुए रहते हैं। स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ का समस्त विस्तार के साथ यह एकीकरण योग की अवस्था होती है, और यही सन्यास की भी अवस्था होतो है। सो दोनों भिन्न न  होकर एक ही होते हैं। बिना योगी हुए सन्यास नहीं मिलता। सन्यास जीवन और जीवन सुविधाओं का त्याग नहीं है, न ही यह बाल दाढ़ी बढाकर गेरुआ वस्त्र पहनने का कोई रिचुअल है बल्कि सन्यास कामनाओं का त्याग है, कर्मयोग का कर्म है, ज्ञानयोग का ज्ञान है और ध्यानयोग की एकाग्रता है। यही योग है।
 श्लोक 3
योग में प्रवृत्त होने के लिए यानी ध्यान निष्ठ होने के लिए पूर्व शर्त क्या है? हम ध्यान/योग/सन्यास के मार्ग पर तभी चल सकते हैं जब हमने कर्मयोग के मार्ग से यात्रा की हो यानी योग/ध्यान/सन्यास की पूर्वशर्त है कार्योग के अनुसार कर्मों का सम्पादन। और एकमात्र साधना मन की शांति है। यह शांति कैसे आती है? मन की शांति  आती है कामनाओं के परित्याग से और कामनाओं का यही परित्याग वैराग्य है। सारे कर्मों को करते हुए भी मन से कर्मफल से /कामनाओं से मुक्ति पा लेना ही वैराग्य है जिसके कारण मन में कोई उथल पुथल नहीं रह जाता है, मन शांत होता है, साधना में लीन होता है और तब हम योग/ध्यान/सन्यास में डूबे हुए होते हैं। इस मन की शांति अवस्था में हम खुद की आत्मा को समझ पाने की स्थिति में रहते हैं। मन की इस शांति अवस्था में आत्मा के करीब रहकर हम खुद के अंदर देख पाते हैं और इस अवस्था में जिज्ञासा उतपन्न होती है जिससे हम ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं। हम खुद का अन्वेषण करते हैं। बाहरी तत्वों से निर्लेप मन, बुद्धि और विवेक सब कर्मों को करते हुए भी स्वयम की आत्मा के प्रसार को समझने में लगा होता है और यही हमारी योगावस्था या ध्यानावस्था है। इस अवस्था  हम माह से मुक्त हुए होते हैं सो शांत भाव से आत्मचिंतन में लीन होते हैं। इस अवस्था में हम न तो बाहरी संकल्पों से प्रभावित होते हैं न ही अंदर कोई संकल्प उठते हैं। इस अवस्था को प्राप्त किये बिना योग/सन्यास/वैराग्य/ध्यान सम्भव नहीं है। 
 श्लोक 4
ध्यान की अवस्था प्राप्त करने के पूर्व हममें दो अनिवार्य योग्यताएँ होनी ही चाहिये, जिनके बिना हम योग/सन्यास/ध्यान में प्रवृत्त भी नहीं हो सकते हैं। ये दो अनिवार्य योग्यताएँ हैं
1.हमारे मन में इन्द्रियों के विषयों यानी "शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध" के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए अर्थात हमें मोह और लगाव से मुक्त होना चाहिए।
2. अपने कर्मों के प्रति और उन कर्मो के फल के प्रति कोई लगाव नहीं होना चाहिए। अर्थात हमें समस्त कामनाओं से मुक्त होना चाहिए क्योंकि कामनाओं की उपस्थिति में हम फिर से उनकी पूर्ति में भटकने लगते हैं।
 ये दोनों अवस्थाएँ इसलिए जरूरी हैं क्योंकि इनके बिना हमारे मन में शांति नहीं होती और चंचल मन से हम खुद पर , अपनी आत्मा पर , अपने सेल्फ पर केंद्रित नहीं हो सकते हैं। इन दोनों योग्यताओं को पूरा किये हम कितना भी बैठें, कितना भी आँख बंद कर लें, हम ध्यान नहीं लगा सकते हैं। और ये जबरदस्ती नहीं हो सकता है बल्कि ये अवस्था निरन्तर प्रयास से , अभ्यास से मिल पाती है।
   कामनाओं के अभाव और इन्द्रियों के विषयों से विरक्ति का अर्थ ये नहीं है कि हम कामनाओं और इन्द्रियों के विषयों से कोई घृणा करते हैं। घृणा का भाव आते ही स्पष्ट है कि हम उनसे जुड़ें हुए हैं। वस्तुतः इसका अर्थ ये है कि हमें कामनाएँ और इन्द्रियों के विषय यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध अपनी तरफ नहीं खींच पाती हैं, हमारे अंदर उनको पाने की कोई लालसा नहीं होती है। कामनाओं के कारक और इन्द्रियों के विषय तो बने ही रहेंगे लेकिन हमारे अंदर इतनी क्षमता होनी चाहिए कि हम इनकी तरफ खिंचे नहीं क्योंकि यदि ऐसा होता है तो फिर हम उनकी पूर्ति में ही लग जाते हैं और फिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा जैसी चीजों में लग जाते हैं जिसका नतीजा ये निकलता है कि हम स्वयम के सेल्फ पर केंद्रित नहीं हो सकते हैं और ध्यान की अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकते हैं।
 श्लोक 5
ध्यान देने वाली बात है कि व्यक्ति विशेष का उत्थान और पतन उस व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का  उत्थान तभी सम्भव हो पाता है जब वह व्यक्ति खुद इसकी इक्षा करता है और इसके लिए प्रयास करता है। किसी व्यक्ति विशेष का उत्थान कोई अन्य नहीं कर सकता है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि यदि भूख हमें लगी है तो यह भूख तभी मिटेगी जब हम खाएंगे। किसी अन्य के खाने से हमारी भूख नहीं मिटने वाली है। 
  अपने उत्थान के लिए हमें गुरु की शरण में तो जाना होता है जिनकी मदद से हमारा उत्थान होता है किंतु यदि हम खुद नहीं चाहें तो गुरु भी हमारा उत्थान नहीं कर सकते। यँहा पर श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के खुद के प्रयास को महत्व दिया है और स्पष्ट कर दिया है कि हमारे बदले कोई और प्रयास कर हमें नहीं उठा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम ही अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी हैं। यदि हम अच्छा करेंगे तो अच्छा होगा हमारे साथ और यदि हम बुरा करेंगे तो बुरा होगा हमारे साथ। कोई अन्य मित्र न तो हमारा अच्छा कर सकता है और न ही कोई अन्य शत्रु हमारा बुरा ही कर सकता है जब तक हम खुद के साथ अच्छा या बुरा न करें और इस प्रकार हम ही अपने सबसे अच्छे मित्र और शत्रु दोनों हैं। ये हमपर निर्भर करता है कि हम खुद के मित्र बनना चाहते हैं कि शत्रु। यदि हम चाहते है कि हम उद्धार के मार्ग पर बढ़ सकें तो ये हमारा दायित्व है कि हम कर्मयोग के मार्ग पर चलें और उसपर चलकर हम खुद के अंदर अच्छे दैवी गुणों की वृद्धि करें, उनके बल पर हम अपने अवगुणों को खत्म कर सकें और खुद का कल्याण कर सकें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 6

कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति के लिए  यह आवश्यक है कि वह समझे कि व्यक्ति खुद ही अपना मित्र है और शत्रु भी। ये हम पर निर्भर करता है कि हम खुद के मित्र बने या शत्रु। खुद के मित्र होने का सामान्य अर्थ इतना भर है कि हमारी इन्द्रियाँ, मन , शरीर और विवेक एक दूसरे के साथ सामंजन में रहें और हमारी इन्द्रियाँ, मन और शरीर हमारे विवेक के अधीन रहे। विवेक के अधीन होने का तातपर्य ये नहीं है कि हम जबरन अपनी इंद्रियों और मन  और शरीर  को हाँके बल्कि इनका परस्पर सामंजन इस प्रकार से हो कि ये एक इकाई के रूप में हमारे निष्काम कर्म की यात्रा को सुगम बनाएँ। यदि विवेक, मन इन्द्रियाँ और शरीर सामंजन में नहीं होते हैं,  इन्द्रियाँ बार बार अपने सुख की तरफ भागेंगी, तो शरीर भी वही कर्म करेगा जिससे उसकी इंद्रियों को सुख मील सके। इस अवस्था में हमारे कर्म वाह्य संसार की तरफ , उसके आकर्षण की तरफ अधिक झुकेंगे, कर्मों में और उनके परिणामों में हमारी अभिरुचि बढ़ती जाएगी जिसका नतीजा ये होता है कि हम मन की शांति गँवा कर उन्हीं में रमे होते हैं। ऐसी स्थिति में  हम आगे नहीं बढ़ पाते हैं।
 श्लोक 7
जब व्यक्ति कर्मयोग का साधन अपनाए जीवन पथ पर चलता है तब उसके मन से कर्म और कर्मफल के प्रति अनुराग और लिप्सा समाप्त हो जाती है, । ऐसा तब ही हो सकता है जब हमारी वाह्य वृत्तियाँ पूर्णतः हमारे नियंत्रण में हों। ये वाह्य वृत्तियाँ क्या हैं? ये हमारी इंद्रियों की चेष्टाएँ हैं जो हमें बाहरी संसार की तरफ खींचती हैं, उनमें रमने के लिए उकसाती हैं। इस अवस्था में हमारे अंदर दैवी गुणों का अभाव होता है और आसुरी गुणों की बहुलता होती जाती है। हमारे कर्म इंद्रियों से निर्धारित होने लगते है क्योंकि इन्द्रियाँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम ये समझें कि हमारे सुख इंद्रियों के सुख को भोगने में हैं। किंतु इस स्थिति में में मन इंद्रियों से नियंत्रित होकर भटकता है , इधर उधर भागता है जिसका नतीजा निकलता है कि हमें शांति नहीं मिलती है और हम खुद के स्वरूप यानी अपने सेल्फ /अपनी आत्मा पर केंद्रित नहीं होते हैं।
     किंतु इसके विपरीत जब हम कर्मयोग का आचरण करते हैं , योग में प्रवृत्त होते हैं तो हमारा मन, इन्द्रिय और शरीर हमारे विवेक के अधीन होते हैं। मन, इन्द्रिय और शरीर पर बलात नियंत्रण नहीं हो सकता है क्योंकि वह नियंत्रण इन्द्रिय के सुखों के साधन पा कर खत्म हो जाता है, लेकिन यदि विवेक का नियंत्रण इन्द्रिय पर हो तो इन्द्रियाँ बाह्य संसार यानी कर्म और कर्म फल से उत्तेजित नहीं होती हैं और मन चंचल होकर भटकता नहीं है। तब हमारे अंदर दैवी गुणों की बहुलता होती है और ये अवस्था हमें अनायास ही नहीं मिलती है बल्कि इसके लिए प्रयास करना होता है, खुद को अंदर से जागृत रखना होता है, समझना होता है कि हमें फल में नहीं अनुरक्त होना चाहिए। जब कामना, लगाव, मोह, और माया का नाश कर पाने हम सक्षम हो पाते हैं तब हम स्वयं के साथ मित्रता निभा पाते हैं क्योंकि तब हमारे अंदर से आसुरी वृत्तियाँ यथा कामना और  मोह जनित सुख, दुख, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध आदि का नाश हो पाता है, हमारे अंदर से मान और अपमान की छद्म प्रवृत्तियों का विनाश हो पाता है और हम तब वास्तविक रूप से स्वतंत्र हो पाते हैं। सामान्य तौर पर हम अपनी इंद्रियों यानी अपने सेंस के अधीन होते हैं और वही स्थिति में स्वाभाविक लगती है जो हमारा भ्रम है। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। आप एक गाय को रस्सी से बाँधें कँही ले जा रहें हैं कि सहसा रस्सी छूट या टूट जाती है। अब आप देखिए कि आप क्या कर रहें हैं और गाय क्या कर रही है। गाय इधर उधर भागने लगती है और आप उसको पकड़ने के लिए उसके पीछे भागते हैं। गाय आपके पीछे नहीं भाग रही है बल्कि आप उसके पीछे भाग रहें हैं। अब सोचिए कि कौन किसके अधीन है। इसी प्रकार जब तक मन में लगाव और कामनाएँ हैं हम कामनाओं के पीछे भाग रहें होते हैं , हम बेचैन हुए रहते हैं सो जब हम खुद को अपने मन से कामनाओं की अधीनता से आजाद कर लेते हैं तो हम शांत चित्त हो पाते हैं जो योग की अवस्था में ले जाता हमको। इस समय हम समझ पाने की स्थिति में होते है कि हमारे अंदर जो सेल्फ है, आत्मा है वही तो दूसरे में भी है, हम तो वृहत्तर अस्तित्व के एक अंश हैं, ठीक वैसे ही जैसे अन्य हैं और तब हम परम् का सामीप्य महसूस कर पाने की स्थिति में होते हैं। हमारे मन से , हमारी कामना से, हमारी चेष्टाओं से अन्य सभी चीज लुप्त हो जाते हैं और हम खुद को वृहत्तर अस्तित्व में स्थित हुआ पाते है।
 श्लोक 8
श्रीकृष्ण ने पूर्व में भी ज्ञान प्राप्त स्थित प्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बता चुके हैं, विशेषकर द्वितीय अध्याय में। एक बार फिर हमारी नासमझी को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसी बात को दूसरे ढंग से कहा है। योगयुक्त व्यक्ति कौन होता है, योगी कौन है, ये प्रश्न तो बार बार मन में आता ही है न। 
          तो हम देखते हैं कि योगारूढ़ व्यक्ति की निम्न विशेषताएँ होती हैं।
1. यह व्यक्ति ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण उन्हीं में और उन्हीं से संतुष्ट हुआ रहता है। यँहा ज्ञान का अर्थ सांसारिक और भौतिक ज्ञान से नहीं है। संसार में रहने के लिए सांसारिक और भौतिक ज्ञान तो जरूरी है ही लेकिन इस जीवन को अर्थपूर्ण ढंग से जीने के लिए इंसांन को आत्मिक ज्ञान की जरूरत होती है। हम सांसारिक और भौतिक ज्ञान में पारंगत हो सकते हैं लेकिन इसके बावजूद हम एक इंसान भी अच्छे हों ये कतई जरूरी नहीं है।  इसके लिए तो हमें आत्मिक ज्ञान की शरण में ही जाना होता है। इसके बिना तो हम भौतिक ज्ञान का भी सदुपयोग नहीं कर पाते हैं। 
       सो यँहा ज्ञान का अर्थ विवेक, मन और शरीर से परे आत्मा यानी अपने कॉन्सियसनेस को समझने जानने से है। हम यह आत्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं अपनी बुद्धि, म और शरीर का उपयोग कर्मयोग के अनुसार उपयोग कर के । हम समझ पाते हैं कि हम मात्र शरीर विशेष ही नहीं हैं। ये तो हमारा बाहरी आवरण भर है। शरीर से परे मन है, मन से परे बुद्धि और बुद्धि से परे आत्मा और ये आत्मा अथवा कॉन्सियसनेस्स अथवा सेल्फ सभी में एक ही है यानी हम सभी एक ही कॉन्सियसनेस्स हैं जो विस्तारित सत्य अथवा कॉन्सियसनेस का ही अंश है, सो सभी समान हैं चाहे रूप, स्वरूप, नाम भिन्न हों। जब समझ से आगे इस ज्ञान की अनुभूति प्रत्यक्ष होने लगती है तो यही आत्मा का ज्ञान हमारा विज्ञान हो जाता है। योगी व्यक्ति इसी ज्ञान -विज्ञान का ज्ञाता होता है और इसी में स्वयं को स्थिर भी रखता है।

2.योगी का खुद की इंद्रियों पर पूर्ण अधिपत्य होता है, उसके सेंस उसकी अनुमति के कुछ नहीं करते हैं।  इस तरह से योगी के सारे कर्म उसके अधीन ही सम्पादित होते हैं। यह व्यक्ति बाहरी तत्वों से प्रभावित नहीं होता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ उन बाहरी कारकों से नहीं बल्कि योगयुक्त व्यक्ति के अनुसार ही क्रिया प्रतिक्रिया करती हैं। ऐसा होने से व्यक्ति सम और शांत होता है, उसके अंदर कोई भी अकुलाहट, उत्तेजना, कामना, क्रोध, लोभ , इक्षा, ईर्ष्या, मान, अपमान, आश्चर्य आदि नहीं होता है बल्कि वह तो प्रत्येक कारक एक भाव से देखता है।

3.आत्मज्ञान में स्थित जितेंद्रिय योगी के लिए संसार में कुछ भी भेद करने लायक नहीं होता है।  हमें सोना महँगा और कीचड़ सस्ती लगती है। क्यों? क्योंकि हमने अपनी कल्पना की दुनिया से कुछ चीजों और भावों को अधिक मूल्यवान और कुछ को कम मूल्यवान बना कर रखा है। ये सब हमारी इंद्रियों की परख है जो हमारी कामनाओं और इक्षाओं से नियमत्रित होती हैं। जब तक हम इनके प्रभाव में रहते हैं इनके अनुसार ही चीजों को और मूल्यों को देखते समझते हैं। ये समझ बाहरी संसार के प्रति हमारी इंद्रियों को प्रतिक्रिया मात्र हैं, विवेक का इनसे कोई लेना देना नहीं हैं। लेकिन जब व्यक्ति को आत्मा की समझ हो जाती है, उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष होने लगती है, इंद्रियों पर नियंत्रण हो जाता है तो व्यक्तो सम अवस्था में आ जाता है। तब उसे सभी कुछ एक समान और अपने समान ही प्रतीत होता है।
    इन तीनों अवस्था को प्राप्त व्यक्ति ही योगी है और यह योगी उसी परम् का अंश है , जिसके अंश हम सभी हैं। यदि हम भी इस तथ्य को समझ कर , क्रिया के स्तर पर आत्मसात कर अपना लें तो हम भी वही योगी हैं जो परम् है।
 श्लोक 9
इस प्रकार हमने देखा है कि जो योगी है वह आत्मा अथवा सेल्फ की सभी में समानता जानकर समत्व में स्थित होता है। किंतु ये भी सत्य है कि संसार में एक व्यक्ति के बहुत तरह के सम्पर्क भी होते हैं , जिनमें से कोई मित्र, कोई शत्रु, कोई उदासीन, कोई बीच बचाव करने वाला,  कोई सम्बन्धी, कोई अनिष्ट चाहने वाला तो कोई भला चाहने वाला भी होता है। कोई दूसरा व्यक्ति अत्यंत उच्च कोटि का हो सकता है तो कोई दुष्ट और पापी भी। हमें इस संसार में इन सभी से मिलना जुलना और व्यवहार करना होता है। तो भिन्न व्यक्तियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?
       एक सामान्य व्यक्ति जिसे कर्मयोग का ज्ञान नहीं होता है, जिसे योग का अभ्यास नहीं होता है वह व्यक्ति इन भिन्न भिन्न सम्बंधों के साथ अपनी पसंद और नापसन्द के अनुसार ही व्यवहार करता है क्योंकि वह इन सभी को भिन्न भिन्न  मानता है। उसे मित्र से प्रेम और शत्रु से घृणा होती है, उसके व्यवहार में अहंकार निर्देशक होता है। लेकिन जो व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता हुआ योग युक्त हुआ है उसे इस बात की समझ होती है कि ये भिन्न भिन्न व्यक्तियो में मूल रूप में आपस में  कोई असमानता नहीं है बल्कि वे सभी भी उसी सम्पूर्ण सेल्फ के अंश हैं जिसका अंश वो खुद है। सो इस स्थिति में योगयुक्त व्यक्ति ऐसे मित्र और शत्रु आदि से अपने संव्यवहार में किसी पसन्द अथवा नापसन्द से नियंत्रित नहीं होता है बल्कि उन सभी से सांसारिक रिश्ते के अनुसार व्यवहार करता हुआ भी उनसे प्रेम या द्वेष नहीं करता है, उनसे अहंकार नहीं पालता है, उनसे क्रोध या ईर्ष्या नहीं करता है बल्कि उनको भी अपने ही सेल्फ का विस्तार मानकर  उनसे सत्य आधारित व्यवहार करता है जैसे यदि सामने वाला शत्रु है तो फिर वह भी शत्रुवत तो उससे व्यवहार करता है किंतु वह उस शत्रु विशेष के प्रति कोई अनादर नहीं रखता है। राम रावण में बड़ी भारी शत्रुता प्रतीत होता है। लेकिन फर्क है राम और रावण में। रावण को राम से द्वेष था किंतु राम ने रावण से कोई शत्रुता नहीं रखी थी बल्कि उनका संघर्ष रावण की बुराई से था। जो योगी है उसका भी चरित्र ऐसा ही होता है , वह व्यक्ति विशेष से प्रेम या द्वेष नहीं रखता है बल्कि उसके गुणों के अनुसार उससे व्यवहार बरतता है।
 श्लोक 10
योगयुक्त कौन है ये तो हमने अबतक समझा है। व्यक्ति और समाज के उत्थान का मार्ग कर्मयोग के अनुपालन से शुरू होता है। फिर ज्ञान की प्राप्ति होती है और तब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर पाता है। जो व्यक्ति बिना इस क्रमिक यात्रा के ध्यान यानी मैडिटेशन करने का प्रयास करता है वह वास्तव में मैडिटेशन या ध्यान नहीं कर रहा होता है बल्कि वह एकाग्र होने का अभ्यास कर रहा हो सकता है या फिर उपासना कर रहा होता है।
    ध्यान की विधि तो वही शुरू कर सकता है जो कर्मयोग और ज्ञान योग की यात्रा पूरी कर चुका होता है। अब देखिए कि ध्यान किया कैसे जाता है। इसे हम क्रमवार समझते हैं।
(1) एकांत स्थल और शांत मन
(I) योगयुक्त व्यक्ति को एकांत स्थल का चुनाव करना चाहिए। यह स्थल।ऐसा हो कि योगी के ध्यान को भटकाने वाला कोई भी कारक मौजूद नहीं हो। योगी को बाहरी किसी कारक से व्यवधान नहीं हो , स्थल ऐसा होना चाहिए।
(ii) मन, इन्द्रियाँ और शरीर पर नियंत्रण होना अनिवार्य है अर्थात मन और इन्द्रियाँ निश्चेष्ट होने चाहिए जिससे भी निश्चेष्ट बना रहेगा। मन में कोई भाव न हो , इन्द्रियाँ कोई क्रिया न करें और शरीर एकदम गतिहीन हो। 
(iii) योगी के मन में न उसका अतीत हो , न भविष्य हो। भविष्य आशा का संचार करता है तो अतीत संस्मरणों की पोटली खोलता है। योगी जो ध्यान में प्रवृत्त होने जा रहा है उसका सारा ध्यान वर्तमान अवस्था पर होना चाहिए।  ये तभी सम्भव है जब इन्द्रियाँ और मन कुछ नहीं कर रहें हों।
(iv) योगी को ध्यान का अभ्यास नितांत अकेले होकर करना होता है, न कि किसी समूह में। ध्यान की क्रिया एक नितांत व्यक्तिगत अभ्यास की क्रिया है।
(v) योगी का ध्यान अवनी आत्मा पर हो, अपने सेल्फ पर हो। किसी भी अन्य की कल्पना, किसी भी अन्य का ध्यान योग की ध्यानावस्था नहीं है। जैसे ही योगी स्वयम के सेल्फ से अलग होकर किसी अन्य सत्ता का ध्यान करता है वह उपासना की अवस्था में चला जाता है। उसी प्रकार यदि किसी चीज पर केंद्रित होता है वह एकाग्रता का अभ्यास करने लगता है। उपासना और एकाग्रता अनुकरणीय तो हैं किंतु वे ध्यान की अवस्था नहीं हैं। योगी को मन, इन्द्रिय, शरीर, अतीत, और भविष्य से विलग होकर सिर्फ वर्तमान में अपने सेल्फ, अपनी आत्मा, अपने कॉन्सियसनेस पर टिकना होता है।
         इस तरह से कर्मयोग और ज्ञानयोग से परिपूर्ण योगी ध्यान की शुरुआत करता है।
 श्लोक11

(2)स्वक्ष एवं पवित्र स्थल
जब हम ध्यान प्रारम्भ करते हैं तो हमें ध्यान के लिए ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जँहा का वातावरण साफ सुथरा हो, जँहा भूमि गन्दी न हो, और जँहा बैठने में मन को अच्छा लगे, कोई कोलाहल न हो, और बाहरी वातावरण से मन और शरीर का विचलन न होता हो।

(3)आसन
ध्यान के लिए स्थल चयन के उपरांत आसन का चयन भी एक महत्वपूर्ण अंग है। आसन की तीन निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए
    *आसन ऊष्मा का कुचालक हो ताकि शरीर से पृथ्वी की गर्मी या नमी न मिले जिससे ध्यान में व्यवधान पड़ सकता है।
     * आसन न तो बहुत मुलायम हो और न ही बहुत कठोर।
     *आसन की ऊँचाई इतनी ही हो कि बैठने में कष्ट या असुविधा न हो।
        बैठने के तरीके को भी आसन कहते हैं। हमारे बैठने का आसन ऐसा होना चाहिए कि हमें कोई शारीरिक असुविधा न हो और हमारा ध्यान भटके नहीं ताकि हम शरीर से स्वतंत्र होकर ध्यान कर सकें।

 श्लोक 12
(4) मन, इन्द्रिय, चित्त की एकाग्रता

   उचित आसन पर स्थिर होकर  बैठकरयोगी को योग्याभ्यास करना चाहिए। आसन पर स्थिर होने के उपरांत 
*इंद्रियों की सारी संवेदनाओं और सूचनाओं के प्रवाह को रोक देना है ताकि इन्द्रियाँ बाहरी संसार की अनुभूतियों को अंदर न आने दें।
*मन को निरुद्ध कर लेना है ताकि मन के अंदर से कोई प्रवाह न उठे।
*चित्त स्थिर हो अर्थात न कोई स्मरण हवन ही कोई भविष्य की योजना हो।
*इस प्रकार सभी वाह्य और अंदुरुनी संकल्पों से मन, बुद्धि, चित्त, और इंद्रियों को मुक्त कर मात्र श्वास की गति पर ध्यान केंद्रित करें।
(5)अभ्यास
इस अवस्था मेंआने के बाद व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं की आत्मा यानी सेल्फ पर ध्यान केंद्रित करें। यँहा दो मानसिक क्रियाओं का अंतर समझना जरूरी है। जब जब हम किसी चीज के बारे में ध्यान केंद्रित करते हैं तो उसके बारे में ध्यान पूर्वक सोचते हैं। यह अवस्था एकाग्रता की नहीं होती क्योंकिं तब हमारा ध्यान उस चीज के बारे में तरह तरह के ज्ञान और कल्पनाओं के सम्बंध में सोचता है। लेकिन यदि हम किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करते हैं तो उस चीज के प्रति जागरूक होते हैं और उसी पर टिके होते हैं , उस चीज के बारे में मन के अंदर कोई उथल पुथल नहीं होता बल्कि ध्यान एकाग्र होकर उसीपर लगा होता है। हमें अपनी आत्मा यानी सेल्फ पर इसी दूसरे भाव से एकाग्र होकर रहना होता है।
       इस अवस्था में हमारा ध्यान निरन्तर अपनी आत्मा के बारे में  जागरूक होकर उसी पर केंद्रित रहे। आत्मा यानी सेल्फ पर निरन्तर एकाग्र होने का परिणाम होता है कि हमारा अस्तित्व हमारे सेल्फ में विलीन होने लगता है। ध्यान अथवा मैडिटेशन की यही तो प्रक्रिया होती है जब व्यक्ति का अस्तित्व उसके सेल्फ में लीन हो जाता है।
 श्लोक 13
(6) शरीर की अवस्था
आसन पर बैठे ध्यान का अभ्यास करते व्यक्ति का पूरा शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो और उसकी दृष्टि नाक के अग्र भाग यानी दोनों नाकों के बीच जँहा से नाक की शुरुआत होती है वँहा टिकी हो।
      जब शरीर स्थिर होता है और एक सीध में होता है , कोई गति नहीं होती तो मन शांत हो पाता है। इसी प्रकार जब आँखें भृकुटि पर टिकी हों इधर उधर नहीं भटकती हो तब मन भी स्थिर हो पाता है अन्यथा आँखें मन को बार बार चलायमान कर देती हैं।
 श्लोक 14
(7) मन की अवस्था
जब हम ध्यान करते हैं तो उस समय मन एकदम शांत अवस्था में हो। ये कैसे सम्भव है? इसके लिए हमें भूत, भविष्य और वर्तमान से अपने मन को अलग करना होता है। यह तभी सम्भव है जब हमें हमारी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण हो और हमारी इन्द्रियाँ हमारे निर्देशों को मानकर भूत की स्मृतियों , भविष्य की आकांक्षाओं और वर्तमान के उत्प्रेरकों से मुक्त हो। जब इस तरह मन भूत, भविष्य और वर्तमान से मुक्त हो जाता है तो  मन शांत होता है। यह शांति ध्यान की अनिवार्य शर्त होती है। कोई बाहरी संकल्प मन में प्रवेश नहीं करता, अंदर  कोई संकल्प नहीं उठता।
     इस तरह से शांत मन भय रहित हो ,ये भी अनिवार्य है। भय हमारे ईगो का, हमारे छद्म पहचान का अविभाज्य अंग होता है। जब हम खुद को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं तो उसके साथ कई अपेक्षाएँ जुड़ जाती हैं जिनके खोने का भय हमेशा बना रहता है। यह भय मन को अशांत करते रहता है। तो इससे कैसे निजात पाएं? तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने ईगो से मुक्त हों। ईगो की समाप्ति से ही भय खत्म होता है। कोई अन्य रास्ता नहीं है भय को मारने का। ये  भय अस्तित्व पर संकट की आशंका है, सो अस्तित्व से मुक्ति ही भय से मुक्ति का मार्ग है। कल कोई महत्वपूर्ण घटना आपके साथ होने वाली है तो आप बराबर उसी कि अपेक्षा और आशंका में डूबते उतराते रह जाते हैं, या कुछ हो चुका है तो आप उससे भि उत्साहित या आशंकित होते रहते हैं। बस तब आप वर्तमान में इन सब से आतंकित होकर जीते हैं, शांत नहीं होते । सो ईगो से मुक्ति ही भय से मुक्ति दिलाता है। भय क्यों होता है?भय द्वैत(duality) के कारण होता  है। जब हमारा ईगो हमारे सेल्फ से भिन्न होता है तो खोने का भय होता है लेकिन जब ईगो नष्ट हो जाता है  तो मात्र सेल्फ बचत है जो अपरिवर्तनीय और नाश रहित है। ईगो का सम्बंध हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य कि कामनाओं और आकांक्षाओं से होता है। इन कामनाओं को वश में करें, कामनाओं के स्रोत इंद्रियों को वश में करें तो ईगो को जीवन मिलना बंद हो जाता है और द्वैत से मुक्ति मिलने लगती है और हम ईगो से धीरे धीरे मुक्त होकर सेल्फ में ही घुलने मिलने लगते हैं । तब भय भी समाप्त हो जाता है। यह ध्यान के लिए अनिवार्य शर्त है।
  इसके अलावे हमें ब्रह्मचारी होना चाहिए तभी हम ध्यान कर सकते हैं। ब्रह्मचारी का लोकप्रिय अर्थ लोग सेक्स से मुक्ति का लगाते हैं, वासनाओं से दूरी, स्त्री से दूरी को ब्रह्मचारी पथ मानते हैं। परंतु ब्रह्मचारी का अर्थ है ब्रह्म के मार्ग पर चलना जिससे अंतिम सत्य यानी ब्रह्म की प्राप्ति हो। इसका सम्बन्ध हमारे समग्र आचरण से है न कि मात्र सेक्स या वासना से। जब हम ये तय करते हैं कि हमको परम् सत्य को प्राप्त करना है तो हम उस मार्ग पर चलते हैं। यदि ये व्रत न लें, ये निश्चय न करें तो फिर सेक्स, और वासना से दूर हैं कि नजदीक कोई अर्थ नहीं रखता।
   इस तरह से शांत मन से हमें अपनी आत्मा में, अपने सेल्फ में लीन होना ही ध्यान है। आत्मा ही कॉन्सियसनेस्स है। जब  हम सिर्फ अपने प्रति जागरूक होते हैं तो हम जीव के प्रति कॉन्सियसनेस्स रखते हैं लेकिन जैसे ही ये समझते हैं कि आत्मा या सेल्फ समस्त से जुड़ा हुआ है यह कॉन्सिउओसनेस ही ईश्वर हो जाता है, जीव से ईश्वर की यह यात्रा conciousness की यात्रा होती है। किंतु यदि इसे समझने में दिक्कत है तो आप परम् पिता परमेश्वर में लीन हों, आपको धीरे धीरे अपनी आत्मा का बोध होने लगता है। जब तक हम अपने प्रति जागरूक होते हैं तब तक इसका भान नहीं होता है लेकिन जैसे जैसे हम अपने दायरे से बाहर निकल कर ये समझने लगते हैं कि यही आत्मा, यही सेल्फ सभी में समान है हम जीव से ईश्वर की तरफ प्रस्थान करने लगते हैं। इसी ईश्वर , इसी व्यापक, इसी आत्मा में लीन होकर इसी को लक्ष्य बनाकर ध्यान करें तो ध्यान सम्भव बन पड़ता है।
 श्लोक 15
(8)मोक्ष की प्राप्ति
       जब व्यक्ति ध्यान (मैडिटेशन) की ऊपर वर्णित विधि को अपना कर ध्यान करता है तब वह जिस अवस्था में होता है उस अवस्था में वह अपने सेल्फ/आत्मा के सम्बंध में सोचता(थिंकिंग) नहीं है बल्कि उस आत्मा अथवा सेल्फ के प्रति उसका एकाग्र ध्यान(अटेंशन) लगा होता है। किसी चीज के सम्बन्ध में एकटक होकर सोचना और उस चीज पर एकटक होकर ध्यान लगाना दोनों दो भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। सोचने की अवस्था में व्यक्ति की इन्द्रियाँ जागृत हो कर उसके मन को भटकाने लगती हैं भले व्यक्ति बाहर से शांत दिखता हो, किंतु एकाग्र ध्यान की अवस्था में व्यक्ति उस चीज से अलग किसी भी अन्य के प्रति जागरूक नहीं रह जाता है और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उसी एक में विलीन होने लगता है। किसी चीज के अस्तित्व के सम्बंध में सोचना और उसी चीज के प्रति बिना सोचते हुए मात्र जागरूक (अवेयर) होना ,दो भिन्न अवस्था हैं और ध्यान की अवस्था में मात्र अवेर्नेस यानी उस चीज के प्रति मात्र जागरूकता रह जाती है। मन और इन्द्रियाँ इस अवस्था में एकदम निष्क्रिय हो जाते हैं। इस अवस्था में ही व्यक्ति अपनी आत्मा को महसूस कर पाता है। तब  व्यक्ति सारे बन्धनों से मुक्त होकर एकदम शांत हो जाता है, परम् शांति को प्राप्त करता है और इसी  शांति की प्राप्ति को परमात्मा की प्राप्ति कहा जाता है और सभी द्वैत (दुआलिटी) समाप्त हो जाता है। यही कैवल्य या मोक्ष की अवस्था होती है जब जीव अपना अस्तित्व भूलकर अपनी ही  आत्मा में विलीन हो जाता है और परम् शांति को प्राप्त करता है बिना किसी अन्य विचलन के।
श्लोक 16
(9) आहार-विहार
    ध्यान योग के लिए आवश्यक है कि योगी अपने शरीर और मन से मुक्त रहे , उसे अपने शरीर और मन के स्तर पर किसी विचलन का सामना नहीं करना पड़े। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति जो ध्यान योग में लगना चाहता है न तो ज्यादा खाये न कम ही, न ज्यादा सोये , न  कम ही क्योंकि ये दोनों अति की अवस्थाएँ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर उसकी एकाग्रता को भंग कर ध्यान से विचलित कर देती हैं।
 श्लोक 17
(9) आहार -विहार

सफलता पूर्वक ध्यान योग में प्रवृत्त होने हेतु आवश्यक है कि व्यक्ति का शरीर और मन स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे और इसके लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति युक्तायुक्त संयमित जीवन जिये, निम्न चीजें शामिल हों उसके जीवन में
1.संयमित और आवश्यक मात्रा में भोजन करे,
2.उसके जीवन में विहार यानी मनोरंजन का संयमित समावेश हो,
3.वह नियमित संयमित ढंग से कर्म करे, तथा
4.बहुत अधिक या बहुत कम न सोये।
        ये क्रियाएँ व्यक्ति विशेष की शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए, सभी के लिए एक तरह की मात्रा का निर्धारण नहीं हो सकता है, लेकिन खान-पान, नींद, मनोरंजन और कर्मों में व्यक्ति की अपनी निजी क्षमता के अनुसार एक संयमित अनुशासन का होना अनिवार्य है, तभी व्यक्ति बाहरी विचलनों से मुक्त होकर ध्यान योग में प्रवृत्त हो सकता है।
 श्लोक 18
(10)योग अवस्था

ध्यान योग की विधि को अपना कर व्यक्ति योगयुक्त हो जाता है।  इस अवस्था में व्यक्ति का मन उसके पूर्ण नियंत्रण में होता है, इधर उधर भटकते नहीं रहता है। इन्द्रियाँ पूर्ण वश में होती हैं जिस कारण मन का भटकाव बंद हो जाता है और मन पूर्णतः अपनी ही आत्मा में लीन होता  है। कोई अन्य भाव में में नहीं रह जाता है। अन्य सभी जुड़ाव से मन मुक्त रहता है, कोई अन्य आकर्षण नहीं रह जाता है। व्यक्ति स्वयं की आत्मा में ही अवस्थित हो जाता है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति इंद्रियों की गतिविधियों से मुक्त, शांत मन से आत्मा/सेल्फ में ही विलीन हो चुका होता है। कोई अन्य इक्षा, भाव, कामना नहीं रह जाती, बस व्यक्ति खुद की सत्यता में विलीन हो जाता है।
 श्लोक 19

 जब व्यक्ति ध्यानयोग की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि उसका सारा ध्यान अपनी आत्मा यानी अपने सेल्फ पर लगा होता है उस समय होता क्या है, इसे समझना आवश्यक है। आत्म में ध्यानरत योगी की समस्त बाहरी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं और उसकी इन्द्रियाँ सम्पूर्ण रूप से उनके वश में हुई निश्चेष्ट हुई होती हैं। ऐसी अवस्था में योगी मन की समस्त इक्षाओं से मुक्त हुआ रहता है, उसकी कोई कामना शेष नहीं होती है। मन हमेशा कामनाओं की पूर्ति के लिए ही भटकता है और जब जब उसकी कोई कामना पूरी होती है उसे प्रसन्नता का अनुभव होता है। लेकिन ध्यानरत योगी की तो कोई कामना शेष ही नहीं रह गई है तो उसका मन चिर प्रसन्न्ता में डूबा हुआ होता है। आत्मा -परमात्मा में लीन योगी को इंद्रियों से कोई सुख चाहिए ही नहीं, उसकी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी हैं सो उसे परम् शांति परम् सुख मिल चुका होता है, सो उसका मन कँही भटकता नहीं बल्कि एक सीध में एकाUग्र हुआ होता है, इधर उधर भटकता नहीं है। मन तो उसका भटकता है जिसका ध्यान अपनी आत्मा और परमात्मा पर नहीं टिका होता है बल्कि कामनाओं की पूर्ति के लिए मारे मारे फिरता है।
 श्लोक 20

ध्यान और योग की प्रक्रिया मात्र इनके सम्बन्ध में सैद्धान्तिक  ज्ञान प्राप्त कर लेने से पूरी नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि कामनाओं के त्याग और इंद्रियों के वश में रहने से ही हमारा ध्यान अपनी आत्मा, अपने स्व पर टिक पाता है और यही परम् सुख की अवस्था दिला पाता है लेकिन इस जानकारी के बावजूद हम अंतिम सत्य यानी परम् सुख को छोड़कर खुद के बाहर अवस्थित वस्तुओं और कारणों कों ढूँढते रहते हैं और कभी सन्तुष्ट और खुश नहीं हो पाते हैं चिर काल तक के लिए। तो फिर उपाय क्या है। उपाय है इस सैद्धान्तिक ज्ञान के अनुरुप आचरण और इस आचरण का अनवरत लम्बे समय तक अभ्यास करना। ज्ञान के निरन्तर प्रायोगिक अभ्यास से ही यह ज्ञान आत्मसात हो पाता है और हम खुद को कामनाओं और अपनी इंद्रियों के लालच के प्रभाव से मुक्त कर अपनी आत्मा पर खुद को एकाग्र कर पाते हैं जिससे हमें अनंत काल तक का सुख मिल पाता है। आत्मा को, अपने सेल्फ को इस परम् सुख की प्राप्ति अपनी आत्मा में लीन होने से ही मिलता है लेकिन इस सुख की अनुभूति के लिए आवश्यक है कि हम कामनाओं और इंद्रियों की चेष्टाओं को त्याग कर स्वयम को अपनी आत्मा में ही केंद्रित करने का निरन्तर अभ्यास करें, बिना इस  अभ्यास के हम कभी चिर सुखी हो ही नहीं सकते।श्लोक 21
योगयुक्त ध्यान की अवस्था में व्यक्ति को अंतहीन सुख की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति ध्यान के लिए सभी आवश्यक अवस्थाओं को प्राप्त कर अपने आत्मा /अपने सेल्फ यानी स्व में केंद्रित होकर उसी में लीन हो जाता है तो उस समय व्यक्ति को जो सुख मिलता है वह सुख इंद्रियों पर निर्भर सुख नहीं होता है। जब हमारे सुख इंद्रियों पर निर्भर होते हैं तब हम इंद्रियों के माध्यम से बाहरी कारकों से सुख प्राप्त करते हैं। यह सुख हमेशा युग्म में होता है, हमेशा इसके साथ दुख भी लगा होता है। यह सुख हम पर नहीं हमारी कामना और कामना की पूर्ति करने वाले बाहरी कारक और उसकी अनुभूति देने वाली हमारी इंद्रियों पर आधारित होता है। लेकिन जब व्यक्ति इंद्रियों से मुक्त अपनी ही आत्मा में लीन ध्यान में रहने लगता है तो उसके सुख इंद्रियों से परे उसकी बुद्धि के ,उसकी चेतना के अंग बन जाते हैं जिसके कारण उसे सुख चाहिए नहीं होता है बल्कि वो खुद सुख बन जाता है। यह सुख अंतहीन होता है क्योंकि इसकी पूर्ति के लिए किसी कामना का पूरा होना जरूरी नहीं होता है और न ही उसकी अनुभूति इंद्रियों से होनी जरूरी होती है। व्यक्ति खुद ही सुख है। उसका कोई दुख शेष नहीं रह जाता है। इस अवस्था में उसकी बुद्धि इसी अवस्था में विलीन हो जाती है , वह विचलित नहीं होता है। सो जब व्यक्ति अपने ईगो से मुक्त अपने स्व में लीन होता है , उसके गुण समाप्त हो जाते हैं और वह अंतहीन सुख बन सुखी रहता हुआ दूसरों को भी आनंदमयी करते रहता है, उसके सानिध्य में दूसरे भी सुख पाते हैं।
 श्लोक 22
आत्मा में लीन, अपने सेल्फ को पहचानने वाले ध्यान योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार से बड़ा कोई सत्य नहीं रह जाता क्योंकि यही व्यक्ति जिसे अपने सेल्फ का ज्ञान हो चुका है वही आत्मा और परमात्मा को समझ जान पाता है। ध्यान रहे हम किसी चीज को उतना ही समझ पाते हैं जितना हम अपने सेल्फ को समझ पाते हैं। तथ्य/वस्तु की समझ सिर्फ उस तथ्य या वस्तु पर निर्भर नहीं करती बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारा ज्ञान कितना है। अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारी समझ के स्तर से ही निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि में जो है, उसे हम कितना समझ पाते हैं। संसार में इक्षाओं की कमी नहीं होती है। हम एक इक्षा की पूर्ति करने में लगे होते हैं कि उसी रास्ते में और नई इक्षाएँ पाल लेते हैं। नतीजा होता है कि हम निरन्तर व्याकुल होते हैं। लेकिन जब हमें अपने सेल्फ का ज्ञान होता है तो हमारी इक्षाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं। ध्यान रहे कि इसका तात्पर्य निष्क्रियता से नहीं है। आत्मज्ञान युक्त व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है। वह  विचारों और कर्मों से निरन्तर चलायमान तो होता है किंतु उसकी गति कामनाओं के वश में नहीं होती है। इसी कारण इस तरह से ज्ञान अर्जित ध्यानमग्न व्यक्ति संसार की गतिविधियों से ,संसार द्वारा, संसार द्वारा उतपन्न भारी से भारी दुखों से भी अछूता ही होता है।
 श्लोक 23
जब व्यक्ति  ऊपर वर्णित तरीके से ध्यान करता है तो वह अपने भ्रम से मुक्त होते जाता है। अभ्यास से व्यक्ति अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े उस आवरण को हटा पाने में सक्षम हो पाता है जिस आवरण के कारण वह स्वयं से बाहर के सुख-दुख और कामनाओं के संसार को ही अपना वास्तविक संसार समझने की भूल करते रहता है और इन्द्रिय और इन्द्रिय जनित सुख और दुख, कामनाओं में लीन होता है, उसी में अपनी बुद्धि, अपना विवेक और अपने शरीर को लगाए रखता है। इस भ्रम से मुक्ति ही योग है और योग की इस अवस्था में व्यक्ति द्वारा अपना परिचय अपने सेल्फ में , अपनी आत्मा में मिलता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह बिना अधीर हुए, बिना अकुताये, अभ्यास पूर्वक  अपने भ्रम को काट कर अपनी आत्मा को प्राप्त करे यानी योग को प्राप्त करे।

 श्लोक 24, 25
ध्यान के द्वारा व्यक्ति अपने सेल्फ/आत्मा को प्राप्त कर पाता है। किंतु ध्यान की इस अवस्था को पाने के लिए ये आवश्यक है कि
1.व्यक्ति अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करे
2.उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में हों
3.मन को और शांत करे,  और ऐसा धैर्य से करे, बुद्धि और विवेक से करे,
4.ध्यान में सिर्फ अपनी आत्मा हो, अपना सेल्फ हो, और कुछ भी न हो।
    यह प्रक्रिया धीरे धीरे होती है और बारम्बार अभ्यास से होती है। ध्यान की यह अवस्था उपासना से भिन्न होती है, पूर्णतः वर्तमान में टिकी होती है, किसी का कोई स्वरूप, कोई शब्द, कोई कामना, कोई स्वर, कोई अनुभूति नहीं होती है मन में, मन पूरी तरह से अपने प्रति सजग, अपने में , अपनी वर्तमान अवस्था(यानी ध्यान की अवस्था के प्रति ) पूरी तरह से जागरूक होता है। अपनी साँसों पर टिके रहें, उनकी गति में अपनी गति मिलाए रखें, और सजग रहें कि सजगता के साथ आप अपनी आत्मा से जुड़ रहें हैं।
   यह क्षमता एक दिन में नहीं आती है सो अधीर न हो, रोज के अभ्यास से ये सम्भव हो पाता है । आप सभी कामनाओं का त्याग कर, इंद्रियों को अपने मन और बुद्धि के अधीन कर अपने, भूत, वर्तमान, अतीत से मुक्त होकर, अपनी आत्मा को पाते हैं और इसके लिए निरन्तर अभ्यास की जरूरत होती है, धैर्य की जरूरत होती है।
श्लोक 26

ध्यान की विधि जान लेने के बाद भी व्यक्ति इस विधि से ध्यान में लग नहीं पता है। इसका कारण होता है मन की चंचलता और विषयों से हमारी अनुरक्ति।
   मन काफी चंचल होता है जिस कारण मन किसी एक स्थान पर  लम्बे समय तक के लिए एकाग्र नहीं हो पाता है। जब व्यक्ति ध्यान में लीन होता तो अचानक मन व्यक्ति के सेल्फ से हट कर अन्य चीजों की तरफ चल देता है। मन जाता किधर है? मन जाता है उस ओर जिधर के विषयों में हमारी अनुरक्ति राग या द्वेष के कारण अधिक होती है।
    तो इससे बचने का क्या उपाय है? व्यस्तुतः ध्यान की गुणवत्ता इसपर निर्भर करती है कि हमने अपनी इंद्रियों से कितना विराग पाया है; अपनी कामनाओं से कितनी मुक्ति पाई है। यह विराग एक झटके में नहीं आता है। धीरे धीरे अभ्यास करते करते हम अपनी कामनाओं और इंद्रियों के प्रभाव से मुक्त होते हैं। जब तक पूर्णतः मुक्त नहीं होते मन की चंचलता बनी रहती है जो हमारी एकाग्रता को अपने रुचि और अरुचि के अनुसार भटकाती ही रहती है। सो हमारा दायित्व होता है कि हम खुद को अपने कामनाओं और रागों से, इन्द्रिय के विषयों से मुक्त करें और मन के भटकाव के प्रति जागरूक रहें। ध्यान रखें कि मन भागेगा, और जैसे मन आत्मा से /अपने सेल्फ से भागता है उसे पकड़ें, पकड़ कर वापस लाएँ। 
   विचारों का जन्म मन के धरातल पर होता है। जब तक मन पर नियंत्रण नहीं होगा विचार जन्म लेते ही रहेंगे और वे विचार मन को भटकाते ही रहेंगे। मन में ये विचार तब आते हैं जब मन में कामनाएँ बसी होती हैं और इन्द्रियाँ मन के ऊपर हावी हुई रहती हैं, बुद्धि पीछे रह गई होती है। 
   सो मन की एकाग्रता को अपने सेल्फ पर बनाये रखकर ध्यान करने के लिए जरूरी है कि-
      मन से कामनाओं का परित्याग करें,
     मन पर इंद्रियों के वश को समाप्त करें,
    मन की चंचलता के प्रति सावधान बने रहें, और
     मन को बार बार अभ्यास कर
स्वयम के सेल्फ पर लाते रहें।
तभी हम ध्यान यानी मैडिटेशन की अवस्था को पा सकते हैं।
 श्लोक 27

ध्यान कब करना चाहिए, ध्यान करने की अहर्ताएँ क्या हैं, ध्यान करने की आवश्यक विधि क्या है इन सब को समझने के पश्चात हम देखते हैं कि ध्यान करने से होता क्या है।
         जब व्यक्ति सारे बाहरी तत्वों और अंदुरुनी इक्षाओं से मुक्त होकर अपने सेल्फ पर टिक जाता है तो उस समय उसे ज्ञान हो पाता है कि वह मात्र शरीर नहीं है बल्कि शरीर से बहुत आगे सम्पूर्ण ब्रह्मांडीय अस्तित्व का वह भी एक भाग है, वह स्वयम भी वही अस्तित्व है जिसे लोग परमात्मा कहते हैं। इक्षाओं और कामनाओं से मुक्त व्यक्ति की तमोगुण और रजोगुण से मुक्ति मिल चुकी होती है। और गुणों से मुक्त होते इंसान के अंदर मात्र और मात्र आनंद ही शेष रह जाता है।
    इसे अगर हम अपने जीवन में व्यवहारिक रूप से समझना चाहें तो समझें कि कामनाओं का त्याग और इंद्रियों के विषयों से मुक्ति के बाद हमारे पास दो ही चीज रहते हैं, एक कि हम अपने शरीर की परिधि से निकल कर खुद को विस्तृत अस्तित्व का एक भाग के रूप में देख समझ पाते हैं, हमारा विस्तार शारीरिक सीमाओं के परे ब्रह्मांडीय हो जाता है और दूसरा इक्षा विहीन आनंद । ऐसी स्थिति होती है कि हमारे सुख का स्रोत हमारी इक्षाएँ नहीं होती बल्कि ये अनुभूति होती है कि हम शरीर नहीं हैं बल्कि उससे बहुत आगे हम स्वयम में पूर्णता के प्रतीक हैं। लेकिन इस अवस्था को पाने की विधि मात्र और कर्मयोग के मार्ग पर है जिसपर चलकर हम ध्यान यानी मैडिटेशन कर सकते हैं।
 श्लोक 28

जब व्यक्ति कर्मयोग के अनुसार क आचरण को करता हुआ अपनी आत्मा यानी सेल्फ पर अपना ध्यान केंद्रित और एकाग्रचित्त होकर रखता है यानी जिस अवस्था में व्यक्ति की चेतना से कामनाओं और इंद्रियों के आकर्षण समाप्त हो गए होते हैं और उसका ध्यान सभी अंदुरुनी इक्षाओं और बाहरी कारकों से मुक्त हो तब व्यक्ति की समस्त चेतना का प्रसार उसके अपने सेल्फ पर होता है। इस समय वह व्यक्ति अपनी ही सेल्फ की चेतना में समस्त अस्तित्व का विस्तार देखता है और उसे समस्त दृश्य और अदृश्य बह्मांड में अपना ही विस्तार महसूस होता है और समस्त ब्रह्मांडीय विस्तार को अपने अंदर पाता है। इस अवस्था में व्यक्ति के अंदर सभी चर-अचर से भेद भाव समाप्त हो जाता है और पूर्ण विस्तार में अपना अस्तित्व पाता है । इस समय व्यक्ति के पास सुख और आनंद के सिवा कुछ दुख और क्लेश शेष नहीं होता क्योंकि अन्य सभी कारक से तो उसकी मुक्ति हो मिल चुकी होती है। चूँकि यह सुख इंद्रियों की अनुभूति पर नहीं निर्भर करती सो इसका कोई अंत नहीं होता है।
   सो हमें चाहिए कि हम अपने आचरण की शुचिता पर ध्यान दें, सेवा और समर्पण के साथ रहें, कामनाओं को कमतर करते करते उनसे मुक्त हों, इंद्रियों के प्रभाव को समाप्त करें और स्वयम पर अपना ध्यान केंद्रित करें।
श्लोक 29

जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलकर यज्ञ भावना से कर्म करता हुआ अपनी ही आत्मा पर ध्यान एकाग्र करने में सक्षम हो जाता है तो उस अवस्था में उस योगी व्यक्ति को ये भान होता है कि समस्त ब्रह्मांड तक में उसके आत्मा यानी उसके सेल्फ का प्रसार है और समस्त ब्रह्मांड उसी की आत्मा अथवा सेल्फ में है। अति सरल शब्दों में समझे तो यह योगी व्यक्ति समस्त  चर-अचर में भेद भाव नहीं करता हुआ सबको अपना ही स्वरूप समझता है और सबमें खुद को और खुद में सबको देखता है। उसके लिए कोई दूसरा अन्य नहीं होता है।
     इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि इस तरह के योगी के लिए शरीर कोई सीमा नहीं होता है। एक शरीर में रहता हुआ वह योगी समस्त ब्रह्मांड में स्वयम को ही देखता पाता है और समस्त ब्रह्मांड को अपने ही आत्मा में रहता है पाता है। जब श्रीकृष्ण श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षा देने के क्रम में कहते हैं कि मैं समस्त ब्रह्माण्डवमें सर्वत्र व्याप्त हूँ और सब मुझमें हैं, और जब अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाते हैं तो हमें उनकी बातों पर विस्मय होता है। लेकिन सत्य ये है कि जब  व्यक्ति योग युक्त हो जाता है तो फिर उसकी शारीरिक सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और वह श्रीकृष्ण की तरह ही सर्वव्यापी हो जाता है। ऐसा व्यक्ति भेद भाव से परे सब में और सब उसी में समाहित होते हैं।
 श्लोक 30

यह योगी व्यक्ति सभी चर और अचर में किसे देखता है? वह सभी में अपने ही सेल्फ का , अपनी ही आत्मा का प्रसार देखता, समझता है। उसकी आत्मा, उसका सेल्फ कुछ और नहीं बल्कि विस्तृत अस्तित्व यानी आत्मा के विस्तृत स्वरूप परमात्मा का ही स्वरूप है सो योगी व्यक्ति सभी में अपनी ही आत्मा का प्रसार देखता हुआ सभी में ईश्वर को ही महसूस करता है। व्यस्तुतः ईश्वर कोई अदृश्य सत्ता नहीं है। ईश्वर अदृश्य है उसके लिए जिसके लिए उसका अपना शरीर मात्र ही उसका अस्तित्व है। लेकिन जो कर्मयोग के रास्ते चलकर ज्ञान और ध्यान अर्जित कर लेता है वह यह सत्य समझ लेता है कि शरीर तो मात्र एक बाहरी आवरण है, सत्य तो यह है कि उसका सेल्फ उसके शरीर से बहुत आगे जाकर  सभी में वैसे है जैसे उसमें है। यानी वही सभी में है और सभी उसमें है, कोई भेद नहीं है। इस समझ के कारण उस  व्यक्ति को तो सभी चर और अचर में उसे अपनी ही आत्मा दिखती है, उसे उस परमात्मा का बोध होता है। यानी इस अवस्था में वही ब्रह्म है।
 श्लोक 31

जब व्यक्ति कर्मयोग से परिपूर्ण होकर ज्ञान और ध्यान को अपना लेता है तब वह योगी अपना प्रसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में पाता है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को अपने में पाता है। इसका तात्पर्य है कि एक योगी सभी में स्वयम की आत्मा का विस्तार देखता है और सभी की आत्मा को स्वयम में पाता है। अर्थात इस योगी के लिए भेद भाव का कोई स्थान नहीं होता है, बल्कि वह तो यह देख पाने में सक्षम हो जाता है कि वह और दूसरा कुछ भी भिन्न नहीं हैं, बल्कि वह तो वही है जो अन्य हैं और जो अन्य हैं वह वह है। यानी कि योगी अपने ही सेल्फ को सब में देख पाता है और समझ पाता है कि दूसरे का सेल्फ , दूसरे की आत्मा कुछ भी अलग नहीं है बल्कि सभी एक ही विस्तृत अस्तित्व के रूप भर हैं, कोई भेद भाव नहीं है। 
   इस स्थिति में यह योगी सभी चर-अचर की निरन्तर सेवा में लगा होता है। उसके लिए ईश्वर कुछ अन्य इकाई नहीं है बल्कि सभी उसी ईश्वर के रूप हैं और वह सभी की सेवा करता हुआ सभी से प्रेम करता हुआ ईश्वर को भजता है। परमात्मा की आराधना यही है कि परमात्मा के स्वरूप जो भिन्न भिन्न चर-अचर से अभिव्यक्त होते हैं उसके समक्ष उनकी सेवा करता हुआ आनंद प्राप्त करता है।
    ऐसा योगी व्यक्ति जितने भी सांसारिक कार्य करता है उन कार्यों को करता हुआ भी उनके मूल में सभी के प्रति सेवा, प्रेम और समर्पण जैसे भाव होते हैं। उसके लिए कुछ भी और कोई भी उसके सेल्फ से, उसकी आत्मा से भिन्न नहीं है सो वह निरन्तर उन सभी में रमा परमात्मा में रमा होता है।
श्लोक 32
योग की सर्वश्रेष्ठ अवस्था वो है जिसमें योगी व्यक्ति अपने की सेल्फ और आत्मा का विस्तार सभी चर और अचर में समान रूप से देखता समझता है यानी वह प्राणियों के बीच किसी तरह का भेद भाव नहीं करता। साथ ही वह जीवन में मिलने वाले सुख और दुख की भावनाओं के साथ भी अलग अलग नहीं होता है बल्कि दोनों की स्थिति में उसकी स्थिति नहीं बदलती बल्कि वह सुख और दुख को भी समान भाव से ग्रहण करता है। समता का ये भाव ही योग की चरम अवस्था को दिलाता है।
 श्लोक 33

कर्मयोग से कर्म करते हुए हम।किस तरह स्वयम को समझ पाते हैं इसकी विधि को श्रीकृष्ण ने ध्यानयोग करने की विधि से समझाया है । इस विधि से हम अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं और समझ पाते हैं कि हम किंस प्रकार से अनंत विस्तार से जुड़े हुए हैं। इस अवस्था को प्राप्त करने की एक आवश्यक शर्त है कि हमारा मन एकदम शांत हो। लेकिन मन की चंचलता के मद्देनजर क्या यह सम्भव है कि हम जीवित अवस्था में अपने पूरी चेतन अवस्था में मन के अनियंत्रित गति पर पूर्ण नियंत्रण लगा पाएं। जब भी कोई योग के इस विधि को सीखने चलता है तो उसके लिए ये प्रश्न बहुत ही स्वाभाविक है और अर्जुन भी स्वाभाविक रूप से इस प्रश्न को उठाता है।
     इस श्लोक में अर्जुन ने श्रीकृष्ण को मधुसूदन नाम से सम्बोधित किया है । मधुसूदन वो है जिसने मधु नामक दैत्य का संहार किया, जिसने अहंकार का नाश किया। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अर्जुन को कृष्ण की शिक्षा पर भरोसा हो चला है और उसे इस बात पर पूरा भरोसा है कि श्रीकृष्ण उसे उसकी चंचलता को मारने, बाँधने का मार्ग दिखा देंगे। 
  इसी प्रकार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के बताए योग को समत्व योग का नाम दिया है अर्थात जिस अवस्था में व्यक्ति समता की स्थिति को प्राप्त कर चुका होता है, अच्छा -बुरा, सुख-दुख, हर्ष-विषाद, मान-अपमान, जीवन-मृत्यु जैसे द्वंदात्मक युग्म उसे परेशान नहीं कर पाते। यही योग का परिणाम होता है। 

 श्लोक 34

योग की अवस्था को प्राप्त करने के लिए मन को स्थिर करना अनिवार्य है लेकिन अर्जुन मानता है कि मन को बाँधना लगभग असंभव है। यही हम सभी को भी लगता है क्योंकि
1.मन अति चंचल होता है, किसी एक स्थान, विषय पर टिकता नहीं है, एक से दूसरे पर भटकता रहता है। किसी भी एक चीज पर ध्यान केंद्रित होने की अवधि अत्यल्प होती है।
2.मन हमेशा उद्वेलित अवस्था में होता है, अतिशीघ्र उत्तेजित हो उठता है तो दूसरे ही पल इसकी दशा और दिशा दोनों बदल जाती है।
3.मन बलवान भी होता है जिधर लग जाता है उधर से हटने का नाम नहीं लेता है, बलात ध्यान भटकाने से भी मन भटकता नही है।
4.मन के अंदर एक दृढ़ता भी होती है जो उसके स्टैमिना को बढ़ाती है।
   एके व्यक्ति का मन इतनी चीजों से एक साथ प्रभावित होते रहता है कि उसको एक दिशा और दशा में बनाये रखना उतना ही कठिन है जितना वायु के वेग को बाँधना, नियंत्रित करना। ऐसी स्थिति में योग और ध्यान कैसे हो,मन कैसे एकाग्र हो ये समझना जरूरी है अन्यथा योग और ध्यान सम्भव ही नहीं हैं।
 श्लोक 35

अर्जुन का प्रश्न है कि मन तो बहुत चंचल, हठी, दृढ़ है तो फिर इसे कैसे नियंत्रित किया जाए ताकि योग की अवस्था प्राप्त की जा सके। इस प्रश्न पर श्रीकृष्ण का मत है कि प्रश्न तो सही है, ये समस्या तो है। किसी समस्या का समाधान तभी होता है जब हम समस्या की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। यदि हम माने ही नहीं कि समस्या है तो फिर समाधान कैसे खोजेंगे। समाधान खोजने का प्रथम  चरण समस्या की उपस्थिति की सत्यता को स्वीकारना होता है और ये बात श्रीकृष्ण यँहा स्पष्ट कर देते हैं अर्जुन के कथन से सहमति व्यक्त कर के।
   अब जब हम समस्या को पहचान चुके हैं तो इसके समाधान के क्या तरीके होंगे इसकी भी पहचान करनी होगी। इसके निम्न चरण होते हैं।
    पहला तो ये है कि समाधान प्राप्त करने की अपनी क्षमता पर हमें भरोसा होना चाहिए। यदि समस्या पहचान कर हम समस्या से भागते हैं तो फिर तय है कि हमारे पास समाधान नहीं आने वाला है। सो श्रीकृष्ण अर्जुन को सबसे पहले तो यह याद दिलाते हैं कि तुम सामर्थवान हो इस समस्या का समाधान खोजने के लिए और इसके लिए वे अर्जुन को महाबाहु नाम से सम्बोधित करते हैं अर्थात जो भीषण योद्धा हो, जिसमें महान बल हो, लड़ने की अद्भुत क्षमता और महारथ हो वही तो महाबाहु हुआ। सो जब  हमारा सामना समस्या से हो तो सबसे पहले हमें उस समस्या की उपस्थिति को स्वीकार कर उससे सामना करने और उसका समाधान पाने की अपनी क्षमता पर भरोसा करना  आना चाहिए। विशालकाय हाथी को उसका पीलवान छोटे से अंकुश से साध लेता है, विशाल और बहुत तेज गति से दौड़ती ट्रेन को उसका चालक एक छोटे से ब्रेक से रोक लेता है। यानी हमें समस्या की विकरालता  पर नहीं जाना चाहिए बल्कि अपनी क्षमता और अपने कौशल को देखना चाहिए जिसकी बदौलत हम समस्या का समाधान खोज सकते हैं। क्षमता के बाद यह कौशल ही वह दूसरा मार्ग है जिससे समस्या का समाधान आता है।
      तो मन को नियंत्रित करने के कौशल कौन से हैं? पहला कौशल है निरन्तर अभ्यास। अभ्यास का मतलब होता है किसी एक कार्य विशेष को विशेष तरीके से बार बार दुहराना। ऐसा करने से उस विधि विशेष में हम पारंगत हो जाते हैं।
      दूसरा है वैराग्य यानी असंगत होना अर्थात नॉन अटैचमेंट। 
       मन विचारों और आदतों का संग्रह होता है। प्रतेक व्यक्ति के मन में कुछ खास तरह के विचार ही बार बार आते हैं । उसी प्रकार कुछ खास तरह की आदतें होती हैं जिनको प्रतेक व्यक्ति विशेष बार बार दुहराता है। व्यक्ति विशेष के विचार और उसकी आदतें उसके परवरिश और उसके माहौल की उपज होते हैं।  
    जब मन को बाँधना है तो व्यक्ति के विचार और आदतें भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। इसके लिए जिन विचारों और आदतों का हम चयन करते हैं वे अचानक से हमारी नहीं हो जाती हैं, ऐसा नहीं कि किसी से सुना या कँही पढ़ा और तुरत अपना लिया। इसके लिए उन विचारों और आदतों को बारम्बार अपने व्यव्हार में दुहराते होना होता है , जिससे धीरे धीरे वे विचार और आदतें हमारे पुराने विचारों और आदतों जिनके कारण हम मन को बाँधने में खुद को  असमर्थ पा रहे थे उनको हटा कर खुद को हमारे मन में स्थापित कर लेती हैं और तब हमारा व्यवहार और आचरण मन को बाँधने योग्य बन पाता है।
    और ये अभ्यास एक विशेष प्रतिबद्धता यानी कन्विक्शन के साथ होनी चाहिए ताकि मन को भरोसा हो कि वह जो कर रहा है, जो सीख रहा है, जो अपना रहा है उसका एक विशेष उद्देश्य है। हमारी प्रतिबद्धता उन सांसारिक चीजों से दूर होती जाती है जिनसे मोह उतपन्न होता है , जो हमें क्षणिक सुखों से बाँधती हैं और हम धीरे धीरे उनसे दूर होते जाते हैं और हमारा मन अपनी आत्मा में रमता जाता है, हम अपने सद्गुणों को माँजने और उनको धार देने में रम जाने लगते हैं और धीरे धीरे उन चीजों से दूर होने लगते हैं जिनसे हम कुछ समय मात्र के लिए सुख या दुख मिला करता था। हमें लगने लगता है कि परम् सुख और समत्व की प्राप्ति के लिए हमें तो अपने सेल्फ की तरफ जाना है। हम सुख और दुख की अनुभूति के लिए  अपने सेंसेस यानी इंद्रियों के वाह्य स्पंदनों पर निर्भर न कर अपने आंतरिक गुणों की तरफ मुड़ने लगते हैं। यह वैराग्य धीरे धीरे अभ्यास से आता है। सनद रहे कि यह वैराग्य संसार से घृणा करना नहीं है, बल्कि संसार से अपेक्षाओं का त्याग करना है, अपने सुख और दुख की अनुभूति अपने से बाहर के कारकों पर निर्भरता से मुक्ति है। संसार के साथ संव्यवहार करते हुए भी संसार के मोह से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन वैराग्य है। अपने पसन्द और नापसन्द से मुक्ति वैराग्य है।
    और यह वैराग्य आता है विवेक से। यह विवेक सत्य और असत्य में भेद करना सिखाता है। सही और गलत में भेद करना सिखाता है। जब विवेक मन के अभ्यास में उतर आता है तो वैराग्य का रूप ले लेता है। दरअसल वैराग्य मन का ज्ञान है जिसे अभ्यास रूपी प्रशिक्षण से मन प्राप्त करता है। पहले जो मन दिन रात वासना पूर्ति में लगा रहता था वह विवेक और वैराग्य के ज्ञान के प्रशिक्षण से लोगों की भलाई में लग कर मन को सुख देने लगता है। वैराग्य आदत बन जाता है।
    इन दोनों तकनीक यानी अभ्यास और वैराग्य से मन को नियंत्रित किया जाता है। और ये दोनों जीवन के प्रत्येक चरण में सत्य हैं। सत्य, अहिंसा, सन्तोष, जैसे मूल्यों के निरन्तर अभ्यास से मन के ऊपर परे मोह से मुक्ति मिलती है। अति संक्षेप में समझें तो मोह(अटैचमेंट) से विरक्ति ही वैराग्य है। इन मूल्यों को जीवन के व्यवहार में उतारना ही अभ्यास है। ये तभी होता है जब इन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता होती है तभी मूल्य जीवन के अभ्यास में उतरता है। अन्यथा प्रतिबद्धता विहीन अभ्यास मात्र एक रूटीन होता है जिसका कोई फलाफल नहीं निकलता है और यह हमारे जीवन में हाइपोक्रेसी को यानी पाखण्ड को जन्म देता है।

श्लोक 36

ये बात सत्य है कि जिसका मन वश में नहीं है वह व्यक्ति ध्यान नहीं कर सकता है। जिस व्यक्ति में ज्ञान नहीं है और जो अभ्यास करने की दृढ़ता नहीं रखता है उसके लिए ध्यान नहीं है। इसके विपरीत जो अभ्यास और ज्ञान-विवेक मन को नियंत्रित कर पाता है वह ध्यान करने योग्य होता है । 
  इससे स्पष्ट है कर्मयोग के मार्ग पर चलकर कर्म कर ज्ञान को प्राप्त करने वाला ही ध्यान करने में सक्षम हो सकता है, अन्य नहीं।
श्लोक 37, 38, 39

अब एक प्रश्न उठता है कि व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ध्यान की तरफ अग्रसर है कि इसी बीच किसी कारणवश अपने उद्देश्य से भटक जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है तो इसका उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। हम ऐसे भी लोगों को देखते हैं जो जीवन की यात्रा तो सही ढंग से शुरू करते हैं किंतु जीवन के किसी मोड़ पर पहुंच कर पथभ्रष्ट हो जाते हैं तो ऐसे लोगों का क्या होता है? अर्जुन के मन में भी यही जानने की उत्कंठा है। दरअसल अर्जुन छात्र की भूमिका में आ चुका है जिसके मन में एक जिज्ञासु की भाँति हर तरह के प्रश्न उठ रहे हैं और यह तभी होता है जब व्यक्ति  की ज्ञान पिपासा बढ़ती है। खुलकर सवाल करना और जो उत्तरदायी व्यक्ति है उसका खुलकर तथ्यों को समझाना , यही वह परम्परा है जिससे समाज सही मार्ग पर बढ़ पाता है। जिस समाज में व्यक्ति प्रश नहीं करता, वह समाज  अंधभक्त होकर रूढ़िवादी और एकाधिकारवादी हो जाता है और परिणामतः गति खोकर अंततः पतनोन्मुखी हो जाता है। उसी प्रकार जब उत्तरदायी व्यक्ति प्रश्नों का उत्तर न देकर अपनी बात मनवाने की जिद्द पर उतर आता है तो फिर समाज रूढ़िवादी, आततायी, एकाधिकारवादी और अंततः पतनोन्मुखी हो जाता है। लेकिन श्रीकृष्ण समाज को उसके हर प्रश्न का उत्तर देते नजर आते हैं ताकि धर्म आधारित एक स्वस्थ समाज विकसित हो सके।
श्लोक 40
योग के मार्ग के पथिक को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि योग का मार्ग कभी निरर्थक नहीं जाता, इस मार्ग में हर घड़ी एक मंजिल मिलती ही है जिसे कृष्ण ने अर्जुन के संशय को दूर करते हुए समझाया है। जब कोई व्यक्ति कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है तो वह व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता हुआ आगे बढ़ता है। इस रास्ते में हो सकता है कि व्यक्ति को कई दुरूह स्थितितियों का सामना करना पड़े। हो सकता है कि उसे अवसाद हो, दुख हो, पीड़ा पहुँचे। लेकिन ध्यान रहे कि उसका आचरण यदि कर्मयोग का बना हुआ है तो फिर उसका पतन नहीं हो पाता है क्योंकि ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व में परिमार्जन किसी बाहरी तत्व पर निर्भर नहीं होता है क्योंकि वह व्यक्ति तो आत्मशोधन करता हुआ चल रहा है। मान लीजिए कि आप किसी पहाड़ी क्षेत्र में जा रहें हैं तो कई बार ऊपर जाने के बाद आप फिर नीचे की तरफ जाते हैं तो इसका ये कतई तात्पर्य नहीं कि आप आगे ऊपर नहीं जा रहें हैं बल्कि सत्य तो ये है कि आपके आगे का मार्ग फिर ऊँचाई की तरफ का है। इसी प्रकार योग के मार्ग में यदि कोई कष्ट , परेशानी, आदि आता है तो इसका तात्पर्य मात्र इतना ही है कि आगे आपके व्यक्तित्व में और ऊँचाई आने वाली है क्योंकि योग मार्ग का पथिक अपने प्रगति के लिए किन्ही बाहरी तत्वों पर निर्भर होता ही नहीं है। योगाचरण में रत व्यक्ति के अंदर जो सद्गुण होते हैं वे उसे बराबर एक नई ऊँचाई प्रदान करते हैं सो इस व्यक्ति की अवस्था कभी खराब हो ही नहीं सकती है।
 श्लोक 41, 42
हम देखते हैं कि जब व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता हुआ यज्ञकर्म करता हुआ ज्ञान कोप्राप्त करता है तो उसके पश्चात व्यक्ति ध्यान की तरफ अग्रसर होता है। ध्यान हेतु मन का पूरी तरह से शांत होना अनिवार्य है । ध्यान के लिए दो अनिवार्य पूर्वशर्त होते हैं। पहली शर्त है कि व्यक्ति  अपने इंद्रियों के वश से बाहर आकर पूरी तरह से विवेक आधारित हो जाये ताकि उसे सही गलत, अच्छे बुरे आदि की समझ हो और उसे लग सके कि आत्मबोध के लिए जरूरी है कि वह बाहरी संसार के प्रभाव से मुक्त होकर खुद पर ध्यान केंद्रित कर सके। लेकिन यह विवेक व्यक्ति की स्वाभाविक लगने वाली आदतों के विपरीत होती हैं सो दूसरी शर्त है कि व्यक्ति शांत मन से विवेक आधारित व्यवहार को आत्मसात करने हेतु इनका अभ्यास करें।।अभ्यास और विवेक के माध्यम से व्यक्ति ध्यान में प्रवृत्त होता है और आत्मबोध करने का प्रयास कर सके। जब व्यक्ति इस ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा को ,अपने सेल्फ को समझ पाता है तो उसे बोध होता है कि व्यक्ति के रूप में भले ही वह एक इकाई है लेकिन वास्तविक रूप से वह तो सम्पूर्ण विस्तार का ही एक अंग है। वह वही है जिसकी प्राप्ति उसे करनी है। उसकी आत्मा ही उसका परमात्मा है।
  किंतु ये आवश्यक नहीं कि ध्यानमें रत होने का प्रयास करने वाला हर व्यक्ति इस ध्यान को प्राप्त कर उसके फलाफल को जिसे श्रीमद्भागवद्गीता की भाषा में मोक्ष कहा जाता है उसे प्राप्त कर ही ले। मोक्ष का अर्थ है कि व्यक्ति को जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल गई हो।  लेकिन ये हमेशा नहीं हो पाता है। कई बार व्यक्ति बीच अवस्था में किसी कारण वश योग के मार्ग से भटक सकता है या फिर उसकी मृत्यु हो सकती है। तब क्या होता है?
         पुनर्जन्म के सिद्धांत में यह माना जाता है कि जब व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसका पुनर्जन्म भी होता है और पुनर्जन्म में पूर्व के जन्म के संस्कारों के अनुसार ही फल मिलता है। इस दृष्टिकोण से देखें तो समझते हैं कि जिस व्यक्ति ने योग का मार्ग तो अपनाया किंतु योग के अंतिम अवस्था को प्राप्त करने के पूर्व वह या तो योग के मार्ग से भटक गया या उसकी मृत्यु हो गई तो पुनर्जन्म में वह अपनी यात्रा वंही से शुरू करता है जँहा पर पूर्वजन्म में उसकी यात्रा समाप्त हुई थी। इस स्थिति में पूर्वजन्म के उसके संचित संस्कारों का फल इस नए जन्म में अपना परिणाम देते हैं जिसके अनुसार उसे इस जन्म में ऐशवर्य की प्राप्ति होती है। संचित संस्कारों के फल की अवधि समाप्त हो जाने पर उसका पुनर्जन्म होता है लेकिन उसका पुनर्जन्म संचित संस्कारों के परिणाम स्वरूप एक ऐसे कूल में होता है जँहा उसकी भौतिक सुख सुविधाएँ पूरी हो पाती हैं। यदि पूर्वजन्म में व्यक्ति ने पर्याप्त वैराग्य की प्राप्ति की थी किंतु अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाया था तो उसका जन्म ज्ञानी योगी के परिवार में होता है। चूँकि इस प्रकार के ज्ञानी योगी परिवार दुर्लभ होते हैं और पूर्वजन्म में पर्याप्त वैराग्य प्राप्त लेकिन अंत में योगभ्रष्ट हुआ व्यक्ति भी दुर्लभ होता है अतः इस प्रकार का जन्म भी दुर्लभ होता है।
यँहा पर श्रीकृष्ण ने पुनर्जन्म के सिद्धांत के अनुसार अर्जुन को शिक्षा दी है लेकिन यह शिक्षा मात्र पुनर्जन्म के सिद्धांत तक सीमित हो ऐसी बात भी नहीं है। दरअसल श्रीकृष्ण अर्जुन को योग की महत्ता और विशेषता को समझा रहें होते हैं। मूल बात जिसे हमें समझनी है वो है अर्जुन के प्रश्न को समझना कि यदि योगमार्ग पर अग्रसर व्यक्ति किसी कारणवश योगभ्रष्ट हो ही जाता है तो वह व्यक्ति योग मार्ग पर कुछ दूर तक चलने का फलाफल प्राप्त कर पाता है या नहीं।
 श्लोक 43
सत्य का कभी विनाश नहीं होता है और योग के मार्ग पर चलने वाला अंततः अपने लक्ष्य यानी मोक्ष को निश्चित ही प्राप्त करता है भले इसके लिए उसे एकाधिक जन्म लेने पड़ते हैं।  योग मार्ग में चलने पर व्यक्ति जो कुछ हासिल करता है वह उसके संस्कारों में संचित हो जाता है। और जब वह योगी के घर में जन्म लेता है तो उसे वे संस्कार पुनः प्राप्त हो जाते हैं और उन संस्कारों को फिर से शीघ्र अर्जित कर पहले से अधिक वेग से अपना प्रयास करता हुआ योग के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है। यदि उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है तो ठीक है और अगर वह इस जन्म में भी अधूरा रह जाता है तो मोक्ष प्राप्ति हेतु योग से प्राप्त ऐश्वर्य के संस्कारों के साथ वह पुनः जन्म लेता है। यह प्रक्रिया तब  तक चलती है जब तक योगमार्ग से चलकर उसे मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती है। 
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 44

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ 44।।

श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है। ।।44।।

जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है जब जीव जन्म और मरण के चक्र से मुक्त होकर अनंत सम्पूर्णता में मिल जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति योग के अंतिम परिणाम के रूप में आती है। किंतु जब योग के मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति अभ्यास करता हुआ बिना वैराग्य प्राप्त किये मृत्यु को प्राप्त हो गया होता है तो वह पुनः एक सम्पन्न परिवार में जन्म लेता है। इस जन्म में उसके पूर्व के संचित अभ्यास के फल उसे शीघ्र ही वैराग्य के मार्ग पर ले चलते हैं। उसके अंदर ज्ञान की जिज्ञासा उतपन्न हो उठती है और इस जिज्ञासा को शांत करने हेतु अभ्यास रत वह व्यक्ति वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर हो कर मोक्ष की दिशा में बढ़ता है। उसकी अधूरी कामनाओं के परिणाम में उसे ऐश्वर्य भी मिलता है लेकिन जल्द ही वह संचित अभ्यास के कारण जिज्ञासा वश ज्ञान प्राप्ति हेतु वैराग्य के पथ पर अग्रसर हो जाता है।
श्लोक 45

जो व्यक्ति निरंतर वैराग्य भाव से अभ्यासरत रहता है एक समय वह मोक्ष को प्राप्त हो ही जाता है। यह प्रक्रिया एक जन्म में भी पूरी हो सकती है अथवा एकाधिक जन्म भी लग सकते हैं क्योंकी अभ्यास और वैराग्य से संचित संस्कार जब तक व्यक्ति को मोक्ष नहीं दिला देते तब तक ठहरते नहीं है। योग का परिणाम निकलना ही होता है, व्यक्ति का दायित्व इतना भर है कि वह योगमार्ग पर दृढ़ता से चलता रहे क्योंकि योगमार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य कभी समाप्त नहीं होता है।
        मोक्ष की प्राप्ति जीते जी होतो है, न कि मृत्यु के पश्चात। मोक्ष प्राप्त व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने सेल्फ यानी आत्मा को वास्तविक रूप से प्राप्त कर परम् आत्मा से मिल जाता है और तब उसके कर्म मात्र और मात्र  दूसरों के कल्याणार्थ रह जाते हैं। 
 श्लोक 46, 47

कर्मयोग के मार्ग से ज्ञान प्राप्त व्यक्ति जब ध्यान योग में आरूढ़ हो जाता है, वही सर्वश्रेष्ठ योग मार्गी है यानी योगी है। वह हर तरह की लिप्सा से मुक्त सिर्फ और सिर्फ अपनी आत्मा, अपने सेल्फ पर केंद्रित रहता है और उसका सांसारिक आचरण यज्ञ कर्म का होता है जो मात्र संसार के कल्याण हेतु सेवा भाव से कर्म करता है। ऐसा योगी ही जो शांत मन से सेल्फ  पर अभ्यास सहित केंद्रित होता है वही सर्वक्षेष्ठ योगी है और उसमें भी जो पूरी श्रद्धा के साथ है वह सबसे प्रिय है।
दिलचस्प है कि युद्ध क्षेत्र में कृष्ण अर्जुन को योगी बनने का परामर्श दे रहें हैं। स्पष्ट है कि युद्ध मात्र एक सांसारिक कर्म भर है अर्जुन के लिए, मूल मार्ग तो योग का है, जिसे पूरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया है। श्रीकृष्ण का अर्जुन को युद्धक्षेत्र में , जो अर्जुन का कर्मक्षेत्र है उसमें योगी बनने की सलाह हमारी ढेरों भ्रांतियों को नष्ट कर देता है। यह हम सब के लिए एक सीख है कि हम इस संसार में रहकर जो भी सांसारिक कर्म करें उनमें हम लिप्सा, लोभ रहित हो कर करें, सेवा भाव से करें और जन कल्याणार्थ करें। यानी हम कर्मयोग के आचरण के अनुसार अपने सांसारिक कर्म करें, उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर करें और पूरे मनोयोग से मन को , चित्त को शांत रखकर अभ्यास पूर्वक अपने कर्मों को करते हुए अपनी आत्मा को तलाशें, अपने सेल्फ को प्राप्त करें, तो हम इस संसार में निरन्तर कर्म करते हुए परम् मोक्ष को प्राप्त हो सकते हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः । ।।6।।
      







      














  










































Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय