श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। ।।16।।
यह तो हमें ज्ञात हो ही गया है कि खुद के लिए कर्तापन का बोध होना और यह समझना कि प्रभु करते कराते हैं, वे हमारे कर्मों के फलों के दाता हैं, रचियता हैं समझना अज्ञानता है। लेकिन इसका बोध मात्र होने से यह अज्ञानता दूर नहीं होती है जब तक हम खुद के अभ्यास से ये न समझ लें। आपको ये सिद्धान्त तो याद हो गया लेकिन कर्मफल से आपकी सम्बद्धता गई नहीं हो, उससे लगाव बना हुआ हो, इन्द्रियाँ उस लगाव के अनुसार आचरण कर रहीं हो तो अपने कर्मों को करते हुए हमें यही लगता है कि ये हम हीं कर रहें हैं, या फिर ईश्वर हमसे करा रहे हैं और फल भी उन्हीं के हाथों में है। इसी भाव से प्रेरित होकर मन में कई कामनाओं को पाले उनकी पूर्ति के लिए हम तरह तरह के जतन करते रहते हैं, और इसी क्रम में विभिन्न इक्षाओं की पूर्ति हेतु कई जगह माथा भी टेकते हैं, कई तरह के देवी देवताओं के शरण में जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हम अच्छा भला भी कर्म करते हों तो भी कर्म से अधिक हम इस बात से जुड़े होते हैं कि हमें मन वांछित फल मिल जाये। कर्मफल से इतनी गहरी सम्बद्धता उसमें आसक्ति प्रदान करती है। फिर चाहे हम जितना भी सिद्धान्त रटे हुए हों वो हमारे काम नहीं आता है।
तो फिर ये सिद्धान्त आत्मसात कैसे होता है? तो इसके लिए कर्मयोग के आचरण का अभ्यास अनिवार्य है। श्रीमद्भागवद्गीता के पूर्व के अध्यायों में और पुनः इस अध्याय में भी हमने सीखा था कि जो खुद के सेल्फ यानी कॉन्सियसनेस अथवा आत्मा की समझ रखता है वह तत्व ज्ञानी माना जाता है यानी उसे इस मूल बात का व्यवहारिक ज्ञान होता है कि वह विस्तृत परमात्मा का ही एक भाग है । इसी अध्याय में थोड़ा सा पीछे जाने पर हम देखते हैं कि हमें यह शिक्षा मिलती है कि "सामान्यतः जब हम कोई क्रिया करते हैं तो हम यह समझते हैं कि ये अमुक क्रिया या कर्म हम कर रहें हैं। ये समझना बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति खुद को अपने "मैं" से पहचानता है। उसे लगता है कि जो कुछ कर रहा है उसका "मैं" कर रहा है। यह "मैं" अर्थात अहम के करने का भाव यानी ""अहंकार"" ही उसके साथ होता है जो उसे बताता है कि जो कुछ हो रहा है वह उसका "मैं" कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के ईगो से बंधा होता है।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता है तो उसे कुछ विशेष तरह से कर्म करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे कि उसे अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करने हैं, कर्म करने में परिणाम से असंगत रहना है, जो कर्म कर रहें हैं उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित करना है, कर्म के जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनको प्रसाद भाव से ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखना है। जब व्यक्ति असंगत भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है तो वह अपनी इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए कर्म नहीं करता है बल्कि वह कर्तव्य भाव से कर्म करता है जिसमें उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रिया करती हैं , उनकी क्रियाओं में कोई अपेक्षा, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि के कोई भाव नहीं होते। इस प्रकार जब व्यक्ति कर्म करने में प्रशिक्षित होता है तो उसे पता होता है कि वस्तुतः उसके अहंकार की वजह से कोई कर्म नहीं हो रहा है। अहंकारमुक्त स्थिति में व्यक्ति "मैं कर्ता हूँ" के मोह से मुक्त हो गया रहता है और उसे पता होता है कि जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है उसमें उसका अपना कोई निमित्त नहीं है, उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि उसके कर्म उसकी इन्द्रियों के स्वाभाविक क्रियाओं की परिणति हैं जिनमें उसका अपना कुछ भी नही है। जो व्यक्ति इस स्थिति में होता है वही तत्व ज्ञानी होता है। तत्वज्ञानी अर्थात जो आत्म तत्व को जानता है, जिसे ज्ञात है कि उसका वास्तविक रूप उसके अहंकार से निर्धारित नहीं होता है, बल्कि वह तो मात्र पूर्ण का एक भाग है, उसी का प्रतीक है, जो दूसरे हैं वही वो है, जो वो है, वही दूसरे हैं अर्थात जो कुछ उसके कर्म हैं वे उसके गुणों से निर्धारित उसके स्वधर्म के अनुसार हैं। " इसी के अभ्यास से प्राप्त ज्ञान तत्व ज्ञान है जो हमारे अंदर के अज्ञानता को समाप्त करता है। जैसे जैसे हमारे अंदर इस ज्ञान का फैलते जाता है खुद के अहंकार और अदृश्य शक्ति से फल प्राप्ति का अज्ञान, ईश्वर के द्वारा कुछ करने , कराने का अज्ञान समाप्त होते जाता है। तब होता क्या है? तब हम इस सत्य से प्रकाशित खुद के अंदर ही परमात्मा में अवस्थित शांत मन से आनंदित रहे हैं यानी हम स्वयं ही सचिदानंद की अवस्था में आ जाते हैं। यहॉ अवस्था तो देवत्व की प्राप्ति का अंतिम सोपान होरी है।
Comments
Post a Comment