श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 7
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 7
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
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अब श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि एक व्यक्ति के लिए कर्मयोगी बनने के लिए उसके अंदर कौन से गुण होने चाहिए। ये बात श्रीकृष्ण पूर्व में भी समझा चुके है, लेकिन हमारी समझ को और साफ करने के लिए फिर से कर्मयोगी के गुणों को बताते हैं। उद्देश्य है कि हम सीख सकें कि हमें किस तरह से अपने कर्मों को करना है ताकि हम कर्म करते हुए कर्म से मुक्त भी हो जाएं और समाज के लिए उपयोगी भी बने रहें और ज्ञान की उस सीमा तक पहुँच सकें जँहा से हम गिर नहीं सकें
कर्मयोगी के गुणों को समझाते हुए श्रीकृष्ण हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम
1.अपने मन को वश में रखें।
2.इन्द्रियों पर नियंत्रण हो।
3.हमारा अंतःकरण पूरी तरह से स्वक्ष हो।
अब आइये हम देखते हैं, कि इनका अर्थ क्या हुआ।
जब हम कर्मयोग का आचरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से कर्मसंन्यास का ही मार्ग चुने होते हैं, लगाव से, ममत्व से राग विहीन यानी वैरागी हुए होते हैं। कर्मयोग का फल ही वैराग्य है। इस अवस्था में हमें आंतरिक रूप से वैराग्य मिलता है और बाहरी तौर पर सम्पन्नता प्राप्त होती है। कर्मयोग की भावना के साथ कर्म करने से एक ओर कर्म होने के कारण बाहरी संसार में सम्पन्नता की बहुलता होती है तो दूसरी तरफ अपने कर्मों के फल से लगाव के अभाव के कारण हम कर्मफल से आसक्त नहीं होते हैं, जिसके कारण हमारे मन में उन कर्मफलों के लिए कोई राग या द्वेष नहीं होता सो हम फल का उत्पादन कर्तव्य हुए भी उनके साथ स्वामी भाव नहीं रखते, बल्कि राग द्वेष के अभाव में हम अंतःकरण से वैरागी ही होते हैं। इस प्रकार सब कर्म करते हुए भी कर्मसन्यास की स्थिति में ही रहते हैं। इस अवस्था में हम प्रसन्न और विशुद्ध आत्मा वाले होते हैं, हमारे मन में कोई गंदगी, कोई लोभ लालच नहीं होता है।
मन की विशुद्धता कर्मयोग का मार्ग अपनाने से ही आती है। इसे समझना जरूरी है कि मन की विशुद्धता और कर्मयोग के आचरण में क्या सम्बन्ध है। मन विचारों का भंडार होता है। मन के अंदर तरह तरह के विचार होते हैं और उन विचारों के अनुसार ही मन की अवस्था और कर्मयोग की स्थिति निर्भर करती है। हमने देखा है कि व्यक्ति तीन तरह के गुणों से मिलकर बनता है, तामसिक, राजसी और सात्विक। अब हमें ये स्पष्ट होना चाहिए कि जैसी गुणों की अवस्था होती है, विचार भी उसी के अनुरूप होते हैं और तदनुसार मन भी वैसा ही होता है और कर्मयोग में हमारी स्थिति भी वैसी ही होती है। विचारों की अवस्था अर्थात सात्विकता, उनकी मात्रा, उनका वेग अथवा उनकी गति और उनकी दिशा हमारे कर्मों को निर्धारित करती है। अब देखते हैं कि गुणों का कर्मों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है।
1.तामसिक गुणों की अधिकता होने पर हमारे विचारों में आलस, लगाव, ममत्व, मोह, क्रोध, अवसाद, उदासी, अज्ञानता, भ्रम, आदि के विचार रहते हैं ।ये विचार हमारे मन को भी इन्हीं की दिशा में मोड़ देते हैं, नतीजा ये होता है कि हमारी इन्द्रियाँ हमारे कर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर इन्हीं विचारों के अनुरूप हमसे कर्म कराती हैं।
2.राजसी गुणों की अधिकता होने पर हमारे मन में जो विचार आते हैं उनका सम्बंध कामनाओं, इक्षाओं, उद्देश्यों, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या आदि के विचार होते हैं तो हमारी इन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के समस्त प्रयास ,सभी कर्म भी इन विचारों की पूर्ति में लग जाते हैं।
3.सात्विक गुणों की अधिकता होने पर हमारे विचारों में प्रेम, भाईचारा, सत्य, अहिंसा,शांति, ज्ञान-विज्ञान , विवेक, दया, क्षमा आदि की प्रचुरता होती है और हमारी इन्द्रियाँ भी उसी के अनुरूप हमारे कर्मेन्द्रियों को भी प्रभावित करती हैं।
कर्मयोग का अनुसरण करने से हमारे गुण तामसी से सात्विक की तरफ बढ़ते हैं या इस प्रकार समझें कि जब हम दैवी गुणों की वृद्धि अपने अंदर करते हैं तो हम कर्मयोग के मार्ग पर चलने लगते हैं।
कर्मयोग का एक परिणाम ये निकलता है कि हम अपने इन्द्रियों पर विवेक के अनुरूप नियंत्रण कर पाते हैं। इन्द्रियाँ अपनी इक्षा से हमें नहीं हाँक पाती हैं बल्कि हम अपने विवेक के अनुसार इन इन्द्रियों से इनके विनिर्दिष्ट कार्य करने का कमान दे पाते हैं, जिसका नतीजा ये निकलता है कि अपने कर्मों को तामसी से सात्विक की तरफ ले जा पाते हैं और गुणों की उन्नत अवस्था हमें सद्कर्मों के मार्ग पर ले जाती हैं। ये नियंत्रण जबरन नहीं होता है बल्कि अभ्यास से और ज्ञान से ये स्वाभाविक नियंत्रण हो जाता है।
इस प्रकार के व्यक्ति को इस बात की समझ हो पाती है कि जो वो है, वही दूसरे भी हैं, उसका सेल्फ और दूसरे का सेल्फ भिन्न नहीं है, वह दूसरे का विस्तार है, दूसरा उसका विस्तार हैं। किसी में कोई भेद भाव नहीं रह जाता है। सभी में एक ही सेल्फ, एक ही कॉन्सियसनेस , एक ही आत्मा है। ये सम्भव है कि हमारे बाहरी रूप भिन्न हों, हमारा मन-मस्तिष्क भिन्नं हो, हमारा विवेक भिन्न हो लेकिन हमारे विवेक को, मन मस्तिष्क को प्रकाशित करने वाला कॉन्सियसनेस या सेल्फ या आत्मा एक ही है।।जैसे एक ही बिजली को अपनी क्षमता(गुणों) के अनुसार अलग अलग मात्रा में प्राप्त कर अलग अलग बल्ब अलग अलग प्रकाश देते हैं उसी प्रकार हम सभी भी अपनी गुणों की अवस्था (क्षमता) के अनुसार अपने एक ही सेल्फ से अलग अलग प्रकाशित हो पाते हैं। यदि गुणों की अवस्था उन्नत होगी, जो कि कर्मयोग के आचरण को अपनाने से होती है तो हमारा सेल्फ हमें अधिक प्रकाशित कर पाता है। अपने विचारों को हम कितना साफ रख पाते हैं ये हमारे कर्मयोग की अवस्था पर निर्भर करता है। इस प्रकार से व्यक्ति कर्मयोग के उच्चतर स्तर पर पहुँच कर उच्च ज्ञान प्राप्त कर पाता है जो कर्म सन्यास के लिए अनिवार्य होता है। ये ज्ञान विषयों की जानकारी और उनके भंडारण से नही आता बल्कि कर्मयोग के आचरण से आता है।
जब हम इस अवस्था में आते हैं तो कर्मबन्धन से मुक्त होते है, परिणामों के मोह में नहीं फंसे होते हैं सो जो कर्म करते हैं वो खुद की संतुष्टि के लिए नहीं करते बल्कि मात्र ये भाव होता है कि कर्म करना है, इन्द्रियों को उनकी स्वाभाविक गति से कर्म में प्रवृत्त होना है जिससे लोग बाग का भला हो सके। इस प्रकार के व्यक्ति का कर्म सेवा की चरम अवस्था का कर्म हो जाता है। वो जो कुछ करता है उससे दूसरों का भला होता है। उसके अंदर फल को लेकर कोई उत्तेजना नहीं होती सो वह खुद के अंदर एकदम शांत होता है और चुँकि उसके कर्म दूसरों की भलाई के लिए होते हैं सो बाहरी दुनिया में उसके कर्मों से समृद्धि बढ़ती है।
इस प्रकार कर्मयोग के मार्ग से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और व्यक्ति कर्मसन्यासी हो पाता है। सो अर्जुन को सम्बोधित करते हुए श्रीकृष्ण हम सभी को कर्मयोग का मार्ग अवनाने का आह्वान करते हैं।
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