श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 6

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म 
नचिरेणाधिगच्छति॥

परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। ।।6।।

कर्मसंन्यास के मार्ग में कर्तापन का बोध नहीं रह जाता। व्यक्ति अपने मन ,इन्द्रिय और शरीर से कर्ता होने का बोध गँवा देता है। इस स्थिति में ममत्व और लगाव का अभाव हो जाता है और परिणाम में अहंकार भी नहीं रह जाता है। लेकिन ये स्थिति इस सिद्धान्त को रट कर, याद कर नहीं आती है। ये अभ्यास का परिणाम है। तो किस चीज का अभ्यास कीजियेगा कि लगाव, ममत्व, अहंकार, और कर्तापन के बोध से मुक्ति मिल सकता है? ये भाव हम एक ही तरीके सकते हैं, पा सकते हैं और वह तरीका है कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण जिसमें हम स्वधर्म के अनुसार , परिणाम के लगाव से मुक्त होकर, यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं। सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति के अंदर ढेरों ऐसे गुण होते हैं जो उसके अंदर तरह तरह की इक्षाओं और कामनाओं को जन्म देते रहते हैं। इस स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया दो तरह से हो सकती है।
एक कि  हम इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहें और परिणाम से ही सुलह और दुख पाते रहें तो हम निरन्तर उन कामनाओं की पूर्ति में ही लगे रह जाते हैं, एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और ये अनवरत चलता रहता है। दूसरा कि हम बलात अपनी सारी इक्षाओं का दमन कर दें, उनसे भागने लगे, लेकिन तब संसार के आकर्षण बार बार हमें उन इक्षाओं की पूर्ति की तरफ खीचेंगे और जब भी मौका मिलेंगे हम उनकी पूर्ति में लग जाएंगे। इस प्रकार इन दोनों मार्गों में  हमारे अंदर ऐसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं जो हमें कर्म और कामनाओं की ओर आकर्षित करती रहती हैं। 
     किंतु यदि हम हम तीसरे विकल्प के रूप में कर्मयोग का रास्ता चुनते हैं तो हम कर्म भी करते हैं, कर्म के परिणाम से बढ़ते भी नहीं हैं और अंत में उससे मुक्त भी हो जाते हैं। तब हमारे अंदर उन दैवी सम्पदाओं की वृद्धि होती रहती है जिनकी मदद से हम लगाव और ममत्व, और अहंकार की प्रवृत्तियों से मुक्त हो पाते हैं। इसी लिए श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि बिना कर्मयोग के आचरण को अपनाए  हम कर्मसंन्यास के मार्ग पर नही। चल सकते। ये एक क्रमिक विकास यात्रा है जिसमें सबसे पहले हम अपने कमियों को समझ कर अपने से श्रेष्ठ की शरण में जाते हैं, तब खुद के अंदर दैवी सम्पदाओं की यानी कर्मयोग के अनुरूप के गुणों को विकसित करते हैं, उसके पश्चात खुद की इन्द्रियों पर नियंत्रण कर पाते हैं और तब यज्ञ की भावना से नियत कर्म करते हैं तो हमारे अंदर के अहंकार, लोभ, लालच, ममत्व, मोह, भ्रम, ईर्ष्या इत्यादि हमारे कर्मों को प्रभावित नहीं कर पाते, तब हम सेवा की भावना से कर्म कर पाते हैं। उस अवस्था में विवेक मन की इक्षाओं पर नियंत्रण रखता है और इन्द्रियाँ मन के अनुरूप ही स्वच्छंद आचरण नहीं कर विवेक के अधीन अपना कर्म निष्पादित करती हैं। ये अवस्था सिद्धान्त को रट कर नहीं आ सकती, इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है सो बिना कर्मयोग के कर्म सन्यास की स्थिति जिसमें परिणाम से और अहंकार से मुक्त आचरण हो सके नही प्राप्त हो सकता है।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय