श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 21
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥
बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है। ।।21।।
6.
हम बार बार देखे हैं, समझे हैं कि व्यक्ति अपनी पराकाष्ठा पर उस समय पहुँच पाता है जब उसे वो सुख मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता है। चूँकि व्यक्ति अपने ही आत्मा, यानी अपने ही सेल्फ अथवा कॉन्सियसनेस में स्थिर हो चुका होता है सो उसे जो भी सुख मिलता है वह उसे खुद से प्राप्त होता है क्योंकि वह खुद को शरीर मात्र नहीं समझ कर सम्पूर्ण विस्तार का अंश समझता है। जब व्यक्ति अपने सेंसेस यानी इन्द्रियों पर निर्भर होता है तो इंसान को अपने सुख के लिए खुद से बाहर की तरफ देखना होता है जो उसे अपनी इन्द्रियों के द्वारा मिल पाता है लेकिन वह सुख स्थाई नहीं होता है क्योंकि बाहरी संसार तो नित परिवर्तनशील है और उस परिवर्तन से उसे उसकी इन्द्रियों को कभी सुख की अनुभूति होती है तो कभी दुख और सन्ताप की। किन्तु जब व्यक्ति परम् ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो उसे इस सत्य का ज्ञान होता है कि जो कुछ उसके बाहर है वो नित परिवर्तनीय और क्षय होने वाला है। इसके विपरीत उसका खुद का सेल्फ तो उस परम परमात्मा यानी कॉन्सियसनेस का अंश है जो सभी में समान है , जो सदा अपरिवर्तनशील है और जो बाहरी सन्ताप से अछूता है। इस अवस्था में व्यक्ति व्यापक सत्य का ही एक अंश होता है, उसी का एक सम्पूर्ण प्रतिनिधि होता है सो उसका सुख अक्षय यानी नहीं समाप्त होने वाला होता है।
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