श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 20

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥ 

जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है।
।।20।।

5. 
अब आगे हम देखते हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो इस ज्ञान को आत्मसात कर चुका है वो व्यक्ति सारे संसार को अपने से बाहर नहीं देखता समझता है। सम्पूर्ण विस्तार के सेल्फ के साथ स्वयम का एकीकरण सापेक्षता को समाप्त कर देता है है। उसके लिए उसकी बुद्धि इस एक  सेल्फ के ज्ञान में स्थिर होती है जिसके कारण वह परम सत्य के साथ एकीकृत हुआ रहता है। ऐसी अवस्था में जो कुछ घट रहा होता है वह उस व्यक्ति के लिए उस सम्पूर्ण विस्तार का ही स्वरूप होता है, जिसके कारण उसे प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति भी एक सी प्रतीत होती है, वह न तो प्रिय को प्राप्त कर प्रसन्नता महसूस करता है न ही अप्रिय उसे उद्विग्न कर पाते हैं। क्योंकि 
     (क) उस व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती है,
     (ख) उस व्यक्ति के लिए प्रत्येक परिणाम समान होता है,
     (ग) उसके लिए उसकी इन्द्रियों की क्रिया उन इन्द्रियों की अपनी गति से घट रही क्रिया मात्र होती है।
     जब व्यक्ति सभी में खुद के विस्तार को ही समझने का आदि हो चुका होता है तो उसके लिए भला क्या प्रिय और क्या अप्रिय। ऐसे इंसान के लिए तो हर परिणाम ही मात्र एक ऐसी घटना मात्र है जो अपनी प्रकृति से सामने आती है और फिर चली जाती है। इस व्यक्ति की प्रसन्नताआ किसी अन्य पर निर्भर नहीं होती है। 
    जब तक व्यक्ति की बुद्धि इस एकात्मकता में स्थिर नहीं होती है तब तक उसे लगता है कि फलाना उसका है, फलाना वैरी है , ये अपना है, वो पराया है, जो अपना है उससे उसकी भावनाएँ जुड़ जाती हैं और तब उसे खुशी और दुख, प्रसन्नता और उद्विग्नता का अनुभव होता है। लेकिन जब उसे सब कुछ एक ही सेल्फ का विस्तार का ज्ञान होता है तो उसके लिए कुछ भी सापेक्ष नहीं रह जाता, सभी मात्र प्रकृति के विभिन्न क्रियाओं की तरह उसके सामने घटते रहते हैं और वह उनसे प्रभावित नहीं होता है। लेकिन ये तब होता है जब उसकी बुद्धि इस परम् ज्ञान में स्थिर हो, वो इस सत्य को आत्मसात कर चुका हो। यह तब होता है जब कर्मयोग से प्राप्त अनुभव स्मरण से आगे व्यक्ति की समझदारी से जुड़ी होती है। जब ज्ञान समझदारी में अवस्थित होता है तब उसे याद नहीं रखना होता है, बल्कि तब 

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